खुद को बदलिए, आपकी परिस्थितियां बदलने कोई नहीं आएगा कहीं से

आज हर नेता किसान किसान चिल्लाता है, पर सोचता कोई नहीं कि आखिर क्या परिस्थितियां हैं जो एक मेहनती आदमी आत्महत्या करने को मज़बूर होता है।

पहली : आमदनी की अनिश्चितता, खेती, जो बहुत ज्यादा मानसून पर निर्भर है और आज़ादी के इतने साल बाद भी हम पानी को भरपूर मात्रा में खेतों तक पहुँचाने की कारगर व्यवस्था नहीं बना पाये हैं और ये तब है जब हर साल 4 महीने बहुत बड़ा क्षेत्र बाढ़ में डूब जाता है।

ये अव्यस्थित है, बारिश के पानी का संरक्षण ज़रुरी है, साथ ही समान वितरण भी।

नदियों को जोड़ना इसका बहुत अच्छा विकल्प है जो अतिवृष्टि और सूखे को संतुलित कर सकता है।

दूसरा : किसानों का नकदी फसलों की ओर मोह। हमने बचपन से पढ़ा है कि भारत में चार मौसम होते हैं, तीन तरह की फसलें होती हैं, रबी-खरीफ-जायद, इसके अलावा मौसमी और इलाके के अनुसार सब्ज़ी भी… पर कहाँ?

कौन कर रहा अब ऐसा? अपना बेसिक ही भूल चुके हैं किसान, जो आलू में लगा है वो साल दर साल वही करता है… साल के 4 महीने… बाकी वक़्त खाली खेत और खाली किसान, महाराष्ट्र में कपास उगा कर आत्महत्या कर रहे, गन्ना वाले करोड़ों बकाये के बावजूद गन्ना ही करेंगे और फिर उसी चीनी मिल के बाहर धरना देंगे।

क्यों भई?

बदल बदल कर फसल उगाओ जैसे दुकानदार समय के साथ वेराइटी न बदले तो आप ही उस दुकान से सामान लेना बंद कर दोगे, तो बदलाव आवश्यक है, ज़रुरत के हिसाब से…

तीसरा : आमदनी के अतिरिक्त स्रोत, आज किसान अपना वक़्त और दिमाग दोनों नहीं लगाता, छोटे खेत का रोना लगातार चलता है, वो वक़्त कहाँ गया जब गाँव की शोभा पशुधन होता था ,

खुद के लिए पौष्टिक दूध दही घी और ज्यादा हो तो बेच कर अतिरिक्त आमदनी, रेगुलर इनकम का स्रोत

साथ ही सब्ज़ी, जो थोड़ी मेहनत मांगती है उसको क्यों छोड़ देते हैं?

खेत में फसलों के साथ ही सब्ज़ियाँ उगाई जा सकती हैं और बिकती भी रेगुलर हैं…

आखिरी : आज किसानो का दिमाग लगा रहता है कि कब उनके इलाके में किसी सरकारी योजना की घोषणा हो और फिर करोड़ों में बेच लो ज़मीन और ऐश करो।

भई, जब ऐसा हो तब बिलकुल पैसे खड़े करो।

पर पैसे का क्या करो?

ये क्यों नहीं सोचते?

अगर 10 बीघा जमीन 1 करोड़ में बेच दी है तो अपने आस पास थोडा अंदर अगर 10 बीघा जमीन 50 लाख में उपलब्ध हो तो क्यों नहीं खरीदते?

सारी रकम को गहने, मोटर साईकिल,शादी, शराब, suv में उड़ाना ज़रुरी तो नहीं!

जितनी ज़मीन बेची उतनी ही ज़मीन भले ही दूर मिले, कम कीमत में ज़रूर खरीदो, बची हुई रकम के आधे को फिक्स्ड डिपॉज़िट (FD) करा दो, बाकी से भले ही ऐश करो…

कभी आत्महत्या की नौबत नहीं आएगी।

और सरकारों को चाहिए कि ज़मीन की दी गई रकम का कुछ हिस्सा अनिवार्य FD या किसी मासिक इनकम जमा योजना में ज़रूर लगा दे।

कुछ तो रहेगा हाथ में…

याद रखिये,

आपकी परिस्थितियां बदलने कोई नहीं आएगा कहीं से…

खुद को बदलो,

देश बदलेगा,

भारत बदल रहा है…

शुक्र है कि एक प्रयोगधर्मी, नई सोच रखने वाला व्यक्ति है हमारा प्रधानमंत्री

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