असंभव है ‘जय भीम’ और ‘जय मीम’ में साम्य खोजना

पूछिए कि इस्लाम के अनुसार दलित काफ़िर हैं या नहीं? उन पर काफ़िर वाजिबुल क़त्ल (काफ़िर मार डालने के योग्य है) का फ़तवा लागू होता है या नहीं? उनकी बहू-बेटियां माले-ग़नीमत (इस्लामियों द्वारा ग़ैरमुस्लिमों की पवित्र लूट) हैं या नहीं?

धैर्य रखना एक कठिन समय होता है मगर हम सबने 13 दिन तक धैर्य बनाये रखा और प्रतीक्षा की। आवश्यक है कि 18 सितंबर अर्थात 13 दिन पुरानी घटना का स्मरण किया जाये। आज तेरह दिन हो गए हैं (लेख पहली अक्टूबर का है), तो तेरहवीं करने का उपयुक्त समय भी है।

घटना यह है कि चंद्रशेखर उर्फ़ रावण अर्थात सहारनपुर को दंगों की आग में झुलसा देने वाले शख़्स पर से योगी सरकार ने रासुका हटा ली गयी और यह जेल से छूट गया। 17 जून 2017 को इस पर रासुका लगी थी।

संभवतः यह नवबौद्ध है। इसकी वाणी अग्निगर्भा है। इसके और इस विचार शैली के लोगों के हिसाब से भारत की हर समस्या की जड़ में सवर्ण हैं। सवर्णों ने ही भारत में शांति लाने वाले बौद्ध धर्म को नष्ट किया अतः दलितों और मुसलमानों को ‘जय भीम’ और ‘जय मीम’ के नारों की छत्रछाया में इकट्ठा हो जाना चाहिए। इसके क्रियाकलाप परम उत्पाती हैं। ख़ैर ये सब अपनी जगह… मगर रावण छोड़ दिया गया।

उसके अनुयाइयों के लिये यह हर्ष का विषय था, अतः सहारनपुर के ग्राम सरजथल थाना सरसावा में समर्थकों ने ढोल-दमामों के साथ जुलूस निकाला। मार्ग में मस्जिद पड़ी।

बहुत समय से ‘जय भीम’ और ‘जय मीम’ की हवा चलाने की कोशिश चल ही रही है अतः स्वाभाविक रूप से के मस्जिद देख कर जुलूस वाले और उत्साह में भर उठे मगर यह क्या कि जुलूस को रोक लिया गया और ढोल-दमामे बंद कर चुपचाप दफ़ा होने के लिये कहा गया।

जुलूस वाले अड़ गए और उसी उत्साह में मस्जिद के आगे से निकलने लगे कि अचानक मस्जिद के लोगों ने जुलूस पर हमला कर दिया। सभी लोगों की ठुकाई की गयी।

मैं यदि सवर्ण मानसिकता का होता तो स्वाभाविक था कि चंद्रशेखर उर्फ़ रावण के हिमायतियों की पिटाई पर प्रसन्न होता मगर मुझे इस घटना पर गहरा दुःख है।

मैं सरजथल के सवर्ण समाज से पूछना चाहता हूँ कि ‘जय भीम’ वालों पर आक्रमण हुआ तो आप उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर क्यों नहीं जूझे? आपने अपने भाइयों को बचाने में योगदान क्यों नहीं दिया? आपस में हम लड़ें-भिड़ें कुछ भी करें, मगर परकीयों के आक्रमण के समय हमें एक होना चाहिए था।

चंद्रशेखर उर्फ़ रावण के हिमायतियों से भी पूछना चाहता हूँ कि आप सम्राट युधिष्ठिर के ज्ञान ‘वयमेव पंचाधिकं शतं’ (हम बाहर वालों के लिए 5 पांडव और 100 कौरव नहीं अपितु 105 भाई हैं) कब समझेंगे?

आप यह प्रश्न स्वयं से कब पूछेंगे कि सैकड़ों किलोमीटर तक करोड़ों अमुस्लिमों और ‘जय भीम’ से घिरे सरजथल में ‘जय मीम’ वालों का यह हाल है तो करोड़ों ‘जय मीम’ से घिर जाने पर ‘जय भीम’ और अन्य अमुस्लिमों का क्या हाल होगा?

आप ‘भैण जी’ और अन्य दलित नेताओं से यह प्रश्न कब पूछेंगे कि ‘जय मीम’ के हमलावर होने पर आपके मुंह में दही क्यों जम गया? ज़बान बिल्ली ले गयी या राजनैतिक लाभ-हानि देख कर अपने भाइयों को बेसहारा छोड़ देना ठीक लगा?

तार्किक बुद्धि का प्रयोग किया जाये तो ‘जय भीम’ और ‘जय मीम’ में साम्य खोजना असंभव है। दलित चिंतन जड़ता तोड़ कर विकास की अंगड़ाई लेने का प्रयास है जबकि इस्लाम विकासमान वर्तमान को घसीट कर 1400 वर्ष पीछे आदिम गुफा में बंद करने का काम है।

पर्दा, तीन तलाक़, हलाला, बूढ़ों की बच्चियों से शादी, निकाहे-हरीरा जैसे गले-सड़े, आदिम रिवाजों को और कैसे समझा जाये? अपने से भिन्न चिंतन को हिंसक रूप से नष्ट करना जैसी विधि तो सभ्य समाज ने कब की त्याग दी है। इस पर विश्वास करना असभ्य होने का चिह्न है। ऐसी सोच वाले ‘जय मीम’ से ‘जय भीम’ का साम्य कैसे हो सकता है?

फिर भी ‘जय भीम’ के नेताओं आपको विश्वास न हो तो कृपया ‘जय मीम’ वालों से पूछिए कि इस्लाम के अनुसार दलित काफ़िर हैं या नहीं? उन पर काफ़िर वाजिबुल क़त्ल (काफ़िर मार डालने के योग्य है) का फ़तवा लागू होता है या नहीं? उनकी बहू-बेटियां माले-ग़नीमत (इस्लामियों द्वारा ग़ैरमुस्लिमों की पवित्र लूट) हैं या नहीं? आप इक्कीसवीं सदी में अर्थात अब क़िताल फ़ी सबीलिल्लाह (अल्लाह की राह में क़त्ल करो), जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह (अल्लाह की राह में जिहाद करो) पर विश्वास करते हैं या नहीं?

इसके उत्तर में ‘जय मीम’ वाले यदि कन्नी काटने लगें या कहें कि इस्लामी अधिपत्य में यह लागू होंगे तो तुरंत अलग मार्ग पकड़ लीजिये। अपनी माँ से नाराज़गी में पराई लुगाई को अम्मा नहीं कहा जाता।

मुसलमानों की दुखती रग पर ऊँगली रखती मुबारक हैदर की किताबें

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