सिद्धि और जादू : अंतर भारतीय रहस्य और विदेशी विद्या का

डाइनेमो मैजिशियन एक नार्मल मैजिशियन है। पर विशेष ऐसे है कि ईसाई मत मानने वाले और इस्लाम मत को मानने वालों का उसके लिए क्या विचार है। ये अद्भुत बात है। उससे अद्भुत बात है कि भारत का मत कैसे अलग है, ये देखना।

Dynamo के वीडियोज़ आप यूट्यूब पर देख सकते हैं। संक्षेप में, देखने वालों के क्या विचार हैं, ये जान लेते हैं। डाइनेमो करता क्या क्या है, मसलन –

डाइनेमो ने खाली बाल्टी से मछलियां निकाल कर दिखाई हैं!

छोटे कपड़े से पूरी साड़ी बना देता है!

रस्सी उसके शरीर को पीछे से क्रॉस करके आगे निकल जाती है!

पानी में चल लेता है!

हवा में लेविटेट हो जाता है!

क्रिश्चयन मत वाले कहते हैं कि ये एंटी क्राइस्ट बातें करता है। ल्युसिफर, जो कि गॉड का पतित एंजेल है, की ताकत प्राप्त करके जादू करता है। अमेरिकन थ्योरी के हिसाब से इल्युमिनाटी और शैतान से कॉन्ट्रैक्ट साइन करने की बात करता है जिसमें अभी तो शैतान उसकी सहायता कर रहा है, मृत्यु के बाद उसी शैतानी ताकत का गुलाम वो हो जाएगा। तो बहुत चिंता की बात है।

इस्लाम मत वाले कहते हैं कि जिन्न की सहायता से करता है। एक तो मौलाना साहब भी मैदान में उतर आए, बताया कि मिरेकल में, जादू में, क्या क्या अंतर है। मसलन कोई जादूगर चांद को दो टुकड़ों में बांट नहीं सकता, या समुद्र को दो हिस्सों में बांट कर चल नहीं सकता। उनकी चिंता का सबब ये रहा कि डायनेमो को देखकर कई मुस्लिम प्रभावित हो रहे हैं।

मेरे लिए ये सब देखना मज़ेदार था। कुछेक का लिखना इतना तक है कि कुछ दो तीन सौ बरस पहले डायनेमो होता तो या तो उसे गॉड मानते, या उसे विचक्राफ्ट वाला मानकर खत्म कर दिया जाता। मामला यहीं से संगीन बनता है।

भारतीय दृष्टि इन मामलों में बड़ी साफ है। यहां सिद्धि और जादू तक को लोक कल्याण या लोक विद्या के अंदर शुरू से डाल दिया है। कुछ भी करते रहो, फर्क नहीं पड़ता।

विद्या के दो रूप बतलाए गये हैं। परा विद्या, अपरा विद्या। ये एक बहुत महीन रेखा है जिसे साधक जगत के लोग अच्छे से पहचानते हैं। हमारे यहां शैतान का कोई वजूद नहीं है। माया के विभिन्न रूप और शक्तियां हैं, उसी का स्तरभेद से विलास है। उपयोग आधार पर उसी को बांट दिया जाता है।

जो परम स्तर माना जाता है, कुछ हद तक कर्म की गति रहती है, फिर पूर्ण समर्पण, उसके बाद तो समर्पण का भी समर्पण। वो लंबी कथा है। पर ऐसा दर्शन ग्रन्थों में है।

डायनेमो का उदाहरण लिया जाए, तो मैजिशियन के तौर पर उसकी आकांक्षा को देखा जाएगा। वो फेमस होना चाहता था, वो चाहता था कि लोग उसे जानें, ये लोक ऐषणा के अंतर्गत तुरंत आ जाता है। ईश्वरीय इच्छा का विधान या प्रसङ्ग यहां खत्म हो जाता है। बल्कि कोई चांस ही नहीं बचता। एक बार एक इच्छा से जो कैरियर बन गया, वो उसी राह पर चलता है। सबका अपना अपना जीवन है, जो जैसा उसका उपयोग उपभोग करे।

यहीं लोक विद्या में भी दो मार्ग कहे जाते हैं, एक तो लोक कल्याण के लिए, जो इतिहास में दिखता आया है, या विज्ञान रूप में भी दिखता आया है। जैसे पानी से पूड़ी बन जाना, ये सामान्य बात रही है, या विज्ञान रूप जैसे काशी के गंध बाबा दिखला गए, मृत तक को जीवित कर देना। या आसाम वाले सर्वानंद जी की बात, जहां अमावस्या को ही पूर्णमासी का चंद्र निकल आया था। कुल मिलाकर अनंत कथाएं हैं। वहीं डीमटेरियलाइज़ कर देना, टेलीपोर्ट कर देना वगैरह।

लोककल्याण वाले में हो जाते हैं, स्वयं कल्याण वाले में, लोक प्रसिद्धि हेतु या धन प्राप्ति हेतु सहायता या संकल्प से कर दिए जाते हैं।

पर भारत के बाहर वाले मत की तरह उसके खिलाफ ही खड़ा हो जाने वाली बात नहीं रहती। बस अचरज से सामान्य मनुष्य देखता है। सबकुछ बना एक ईश्वर से है, ऐसा मानकर।

परम अवस्था वाले विधान में इन सब बातों की कोई कीमत नहीं रहती, और न ही उपयोग, वहां सब नॉर्मल रहता है, सामने वाले को चमत्कार दिखे, तो वो जाने, नहीं दिखे तो विचार ही करता रहे, इससे परम अवस्था में विद्यमान को लेशमात्र भी फर्क नहीं पड़ता, या कह सकते हैं कि घटना से उत्पन्न फायदे या नुकसान वाली बातों से निरपेक्ष रहता है। रहता क्या है, बहुत बहुत दूर रहता है।

इस पर बहुत लंबा लिखा जा सकता है, और कई बातें भी हैं। पोस्ट केवल इतनी बात पर है कि हम भारत के, सही में, बाहर वालों से प्रामाणिक रूप से बहुत अलग मत रखते हैं। जन सामान्य में भी किसी घटना को देखने का हमारा नज़रिया बहुत अलग होता है।

एक सामान्य से सामान्य जन भी, सम्भव है कि दार्शनिक रूप नहीं बतला पायेगा। पर घटना पर उसका वैचारिक रिफ्लेक्स का अति साधारण रूप उसी दर्शन की उंगली पकड़ कर ही होगा। गर्व कर सकते हैं कि उसी भारत देश से हैं। आधार तो हमारा बहुत अच्छा है जिस पर पुरखे ऑलरेडी काम कर गए हैं। प्रसन्न होने वाली बात है।

जय भारत

रक्त की खुशबू और धूप की गंध, जिसे दोनों प्रिय नहीं, वो कुछ न समझा

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