धारा 311 यानी भारत दुर्दशा

मीडिया वास्तव में एक माफ़िया है।

माफ़िया वो जो सुपारी ले, फिरौती ले, लोगों को नशे में रखे।

मीडिया भी यही करती है। कैमरे के नोक पर एक पार्टी से सुपारी और दूसरे से फिरौती लेती है।

ये मीडिया का असल चरित्र है।

इसलिए जब भी कोई घटना या दुर्घटना घटित होती है तो उसका असल विश्लेषण होकर किसी समाधान मूलक तथ्य को उजागर कर सरकार पर बजाए सुधार का दबाव बनाने के, मीडिया ये पार्टी बनाम वो पार्टी तक ही बात सीमित रखती है।

आख़िर इनकी कमाई का ज़रिया ही क्या है? ऐसा नहीं करंगे तो रविश कुमार कमाएँगे क्या, खाएँगे क्या?

जनता के इतने ही हितैषी हैं तो संविधान की धारा 311 पर बात करो जो सिविल सर्वेंट को सारे कुकर्मों के बावजूद सेफ करती है।

एक सिविल सर्वेंट के घर में लूट का करोड़ों मिला हो, गबन करे, रेप करे, कुछ भी अनर्थ करे, लेकिन वो पद पर बना रहेगा, कोर्ट में सुनवाई चलती रहेगी।

आपने कभी देखा है पत्रकारों को संविधान की इस धारा पर बात करते हुए? ये अकेली धारा पूरे तंत्र को गैर जवाबदेह (unaccountable) बनाती है। जिससे निरंकुशता आती है।

कुछ मूर्ख इस निरंकुशता को पावर बोलते हैं लेकिन पावर और निरंकुशता में फर्क होता है। इसी निरंकुशता के कारण सीनियर सिविल सर्वेंट अपने अधीनस्थों पर चाह कर भी कार्यवाही नहीं कर पाता।

वो कुछ नहीं कर पाता सिवाय सस्पेंड करने के, और सस्पेंड करना सरकारी रेकॉर्ड में सज़ा नहीं माना जाता। आधी तनख्वाह और छुट्टी दोनों के मज़े होते हैं। तब पता चलता है कि असल में ये पावर नहीं, निरंकुशता है। ये प्रशासन को खुद ही पंगु बनाता है, इससे अनुशासनहीनता आती है।

असल में पुलिस के पास जो पावर होनी चाहिए वो नहीं है। और इसी निरंकुशता के कारण जब भी पावर मिलती है तो दुरुपयोग ऐसा होता है कि जल्द ही मानवाधिकर के दबाव में छिन जाता है।

अपराधी पुलिस के सर चढ़ के मूतते हैं, पुलिस मुकदर्शक? एसएसपी का ट्रांसफर एक इंस्पेक्टर करवा देते है, बेचारा एसएसपी कुछ नहीं कर पाता? तब पता चलता है कि कहाँ है पावर? पावर माने UPCOCA जैसी पावर, लेकिन उसके लिए योग्यता होनी चाहिए।

ऐसी पावर दी भी तभी जा सकती है जब पुलिस पर अंकुश हो, उसके लिए धारा 311 खत्म हो। तब पुलिस स्वतः एक स्वायत्तशासी संस्था बनेगी जिसमें उच्च पदों पर ही राज्यपाल या राष्ट्रपति नियुक्ति करेगा। व्यवस्था में अनुशासन आयेगा।

तब पुलिस को पता होगा कि पावर का दुरुपयोग किया, तो जेल होगी एकदम आम आदमी की तरह। तत्काल होगी। मेरा अफसर ही मुझे नौकरी से निकाल देगा।

मुझे राज्यपाल ने नियुक्त किया है, वही हटा सकता है, मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता, ये अहंकार मेरे में नहीं होगा। मैं सदा औकात में रहूँगा। तब स्वतः ही सिस्टम चेंज होगा।

तब अपने आप एसपी व डीएम रैंक पर अनुभवी लोग बैठेंगे जो सिस्टम हैंडल कर पाएँ, क्योंकि एक गलती से जेल होगी, इसीलिए बैठने से पहले perfection पाना होगा, और ये इम्तहान में निबंध लिख कर पास करने भर से नहीं आयेगा, रियल सिस्टम में कठोर मेहनत से आयेगा।

बिना मेहनत के पद लेने से डर लगेगा, खुद छोड़कर भागेंगे। अभी जो मज़ा है, बाद में सज़ा हो जाएगा। आज कोई accountability नहीं है, तो कोई भी पगलेट इम्तहान निकाल कर खुद को जनता की किस्मत का मसीहा मान लेता है, भले तंत्र संभालने की, perform करने की कूवत हो या न हो। वो जिंदगी भर हरामखोरी कर सकता है, बिना किसी अंकुश के।

[धारा 311 को विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करिए : https://www.india.gov.in/sites/upload_files/npi/files/constitution/PARTXIV.pdf]

कहने का मतलब ये सारी बहस मीडिया में होनी चाहिए और खासकर तथाकथित ‘निष्पक्ष पत्रकारिता’ करने वाले रविश कुमार को तो पक्का करनी चाहिए ऐसी बहस।

ये बहस जरूरी है क्योंकि जनता के जीवन व भविष्य का सवाल है। जनता कोई कीड़ा मकौड़ा नहीं है, उसका जीवन मज़ाक नहीं है जिसे सत्तालोलुप नेता और करियर लोलुप नौकरशाही के महत्वाकांक्षा तले रौंदा जाए।

लेकिन पत्रकार तो योगी की पुलिस व अखिलेश की पुलिस से ऊपर जाते नहीं क्योंकि जो परमानेंट हैं उनसे पत्रकारों की सांठ गांठ होती है, पत्रकार उन्हे नहीं छेड़ते। वो सुपारी लेते हैं, हर घटना में पार्टी से ऊपर बात नहीं करते, इसीलिए नौकरशाही व पुलिस के सारे कुकर्म पार्टी के त्रिया चरित्र के आवरण से ढंक जाते हैं।

धारा 311 जैसे व्यवस्थात्मक रिफॉर्म आज भी नहीं हो सके हैं। इसमें नेता का भी निहित स्वार्थ है, नीचे के अधिकारियों को प्रोटेक्शन देकर मनचाहे काम करा लेते हैं और नौकरशाही का भी भला है। तो वो क्यों करेंगे सुधार? ऐसे में पत्रकार से उम्मीद की जा सकती है, लेकिन पत्रकारिता जगत खुद ही माफिया हैं। तो बचा कौन? यही है भारत दुर्दशा!

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