संयुक्त राष्ट्र में परिवार के पक्ष में आवाज़ उठाने के लिए विदेश मंत्री को बधाई

पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने संबोधन में एक विशेष बात कही जिसकी गहराई को देशी और विदेशी, दोनों समझ नहीं पाए और उनके बयान को वाकपटुता में ले लिया गया।

विदेश मंत्री ने कहा कि “वसुधैव कुटुंबकम् की बुनियाद है परिवार। और परिवार प्यार से चलता है, व्यापार से नहीं। परिवार मोह से चलता है, लोभ से नहीं। परिवार संवेदना से चलता है, ईर्ष्या से नहीं। परिवार सुलह से चलता है, कलह से नहीं। इसीलिए हमें संयुक्त राष्ट्र को परिवार के सिद्धांत पर चलाना होगा। संयुक्त राष्ट्र, मैं, मेरा और मुझको कहकर नहीं चलाया जा सकता। यह मंच, हम — हमारा और सबको के सिद्धांत पर बनाया गया था। उसी आधार पर चलेगा तो जीवित रहेगा।”

याद कीजिये कि कुछ समय से व्यक्ति विशेष के अधिकारों की चौखट पर परिवार – और परिवार से बने समाज – की समग्रता और स्नेह की बलि देने का प्रयास चल रहा है।

किसी परिवार या परिवार के सदस्य को मारने वाले आतंकवादी के मानवाधिकारों के संरक्षण का लेक्चर पिलाया जाता है।

लोकतान्त्रिक सरकार के निर्णयों की वैधता को सिविल सोसाइटी या व्यक्ति विशेष के द्वारा जानबूझकर किये गए कुतर्को और हिंसा के द्वारा चुनौती दी जा रही है।

या फिर, दो पुरुष या दो महिलाओ के संसर्ग का उत्सव मनाया जाता है, यद्यपि मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि हर व्यक्ति को अपना जीवनसाथी चुनने के अधिकार को मैं स्वीकार करता हूँ।

यहाँ तक कि अवैध घुसपैठियों का भी मानवाधिकार के नाम पर समर्थन किया जाता है, जबकि कुछ स्थितियों में अवैध घुसपैठिये राष्ट्र की अवधारणा और नींव को कमजोर कर देते है।

इन्हीं व्यक्तिगत अधिकारों के नाम पर कई बार शिशु और बच्चे परिवारों से अलग कर दिये जाते हैं। इस व्यवस्था की त्रासदी भारतीय परिवारों ने पश्चिमी देशों में झेली हैं।

मैं यह मानता हूं कि अगर किसी व्यक्ति की आवाज़ नहीं सुनी जाती है तो उस व्यक्ति को अकेले ही विरोध करने का अधिकार होना चाहिए। लेकिन क्या यह संभव नहीं है कि उस व्यक्ति की आवाज़ पूर्णतया गलत हो?

समाज की एक प्रमुख इकाई के रूप में परिवार के महत्व पर ज़ोर देने और संयुक्त राष्ट्र महासभा में उसके पक्ष में आवाज़ उठाने के लिए विदेश मंत्री बधाई की पात्र है।

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