ऊँचे कद के शास्त्री जी

घटिया चीज़ों को थर्ड क्लास कहना रेलवे की थर्ड क्लास बोगी की वजह से शुरू हुआ था। बाद में इसी थर्ड क्लास का नाम बदलकर जनरल कर दिया गया।

बीस साल पहले के जनरल कम्पार्टमेंट का सफ़र जिन्हें याद होगा, उन्हें शायद ये भी याद होगा कि ट्रेन में कुछ लोगों के पास बोरे सिलने वाला सुआ हुआ करता था।

लकड़ी के पटरों की बनी थर्ड क्लास की सीट में कई खटमल निवास करते थे। बोरे सिलने वाली इस मोटी सी सुई से उन्हें दरारों से कुरेद कर गिराया और फिर मारा जाता था। ये वो दौर था जब थर्ड क्लास के यात्री को किसी काम का नहीं माना जाता था।

फिरंगी मानसिकता से सरकारी महकमा मुक्त नहीं हुआ था और मानता था कि रेल में घुस जाने और सफ़र करने की इजाजत देकर वो आम भारतीय पर एहसान कर रहा है।

ऐसे ही दौर में एक दिन लाल बहादुर शास्त्री किसी ट्रेन की थर्ड क्लास में घुस आये। ऐसा बिलकुल नहीं है कि पहले उन्होंने कभी थर्ड क्लास में सफ़र नहीं किया था।

उनका बचपन ऐसे हाल में बीता था जब उनका स्कूल गंगा के पार हुआ करता था। पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्होंने कई बार सर पर किताबें बांधकर गंगा वैसे ही तैरकर पार की थी, जैसे आज के मिथिलांचल के कई छात्र हर साल आनेवाली बाढ़ के मौसम में करते हैं।

शास्त्री जी ने जब देखा कि आज़ाद भारत में भी थर्ड क्लास की हालत कुछ ख़ास बदली नहीं है तो जनरल कम्पार्टमेंट में पंखे लगवाने की शुरुआत हुई थी। ट्रेन की पैंट्री कार और यात्रियों के लिए सफ़र के दौरान भोजन का इंतज़ाम भी उन्हीं के फैसले थे। रेल दुर्घटना में नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा देने को भी वही प्रस्तुत हुए थे।

अब नैतिकता कम बची है, इसलिए नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफ़ा देने के फैसले भी सुनाई नहीं देते। अतिक्रमण हटाओ के अभियान शहर में तब होते हैं, जब किसी दिन मी लार्ड की गाड़ी जाम में फंस जाती है। इसके ठीक उलट, प्रधानमंत्री के तौर पर जब उनकी कार उनके घर नहीं जा पायी तो संकरी गलियों को जबरन चौड़ा करवाने का फैसला शास्त्री जी ने रुकवा दिया था।

जहाँ मृत्यु से करीब डेढ़ दशक पहले ही गाँधी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था, वहीँ शास्त्री जी अंत समय तक कांग्रेसी ही रहे। इसके बावजूद कांग्रेसियों के नाम पर ही गाली देना शुरू कर देने वाले लोग भी शास्त्री जी के नाम में ‘जी’ लगाना नहीं भूलते।

नैतिकता और सरलता के उनके मापदंड इतने ऊँचे थे कि उनसे तुलना भी मुश्किल हो जायेगी। ‘बुरी पार्टी में एक अच्छा व्यक्ति’ का जुमला उनके लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

शायद संगती के लोगों से बिलकुल अलग थे, इसलिए उनपर लिखी किताबों ने भी प्रचार नहीं पाया। उनकी जीवनी पर लिखी किताबें, जैसे शास्त्री जी के सेक्रेटरी रहे सी. पी. श्रीवास्तव की लिखी किताब (https://amzn.to/2Ngq46t) आज लगभग लापता है।

उनके रेल मंत्री बनने पर एक बार 1954 में वो मंत्री के तौर पर बनारस आये तो एक चपरासी देवीलाल छुप गए। शास्त्री जी का जैसा ऊँचा कद था, भीड़ में देवीलाल दिखे नहीं। तो मंच पर से उन्होंने देवीलाल को बुलवाया और उन्हें गले लगा लिया!

इसके पीछे का किस्सा बाद में पता चला था। जब शास्त्री जी हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की पढ़ाई कर रहे थे तो उनसे साइंस प्रैक्टिकल में इस्तेमाल होने वाले एक बीकर टूट गया था। स्कूल के चपरासी देवीलाल ने ये देखकर उन्‍हें जोरदार थप्पड़ मार दिया था। शास्त्री जी को मंत्री के तौर पर सामने देख बेचारे देवीलाल छुप रहे थे, जबकि शास्त्री जी ने उन्हें कब का माफ़ कर दिया था।

बाकी भारतीय राजनीति में सिर्फ दो अक्टूबर को उन्हें याद किया जाता है, वो भी कुछ गिने-चुने गैर कांग्रेसी लोगों द्वारा, ये देखकर शास्त्री जी दुखी होते या नहीं, ये एक सवाल हो सकता है। मेरे ख़याल से शास्त्री जी जैसे व्यक्ति थे, उनका इसपर ध्यान नहीं जाता। वो जनरल कम्पार्टमेंट में सीट पर मामूली गद्दा और कवर लगा देखते और खुश हो जाते।

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