क्या राहुल ने कभी नेहरू, इंदिरा या राजीव को चोर कहा है?

राहुल जी के कुछ लोग प्रधानमंत्री को लक्ष्य कर के नारा लगा रहे हैं, “गली गली में शोर है, चौकीदार चोर है”।

मुझे ऐसे नारों से घृणा होती है। ऐसे ही कुछ अभद्र लोगों ने कभी इंदिरा जी को लक्ष्य कर के नारा लगाया था, “गली गली में झंडी है, इंदिरा गाँधी…….”।

मैं और मुझ जैसे असंख्य लोग ऐसी मूर्खतापूर्ण और असभ्य भाषा से दुःखी होते हैं। आप भले किसी भी दल के समर्थक हों, यदि आपमें तनिक भी सभ्यता है तो आप ऐसे नारों का समर्थन नहीं कर सकते।

“प्रधानमंत्री चोर है” का नारा राहुल जी ले कर आये हैं। यह नारा यदि तेजस्वी, तेजप्रताप, मायावती, ममता, उद्धव, राज आदि लाये होते तो आश्चर्यजनक नहीं लगता, क्योंकि उनसे अच्छे की आशा ही नहीं की जाती, पर राहुल जी का राजनीति में अपना एक स्थान है। वे देश के सबसे प्राचीन राजनैतिक परिवार से आते हैं, और सबसे प्राचीन दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

देश में असंख्य ऐसे लोग और नेता हैं जो राहुल जी के जन्म के समय से ही उनको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मानते हैं। स्वयं के लिए नहीं तो कम से कम अपने उन असंख्य अंधभक्तों की प्रतिष्ठा के लिए राहुल जी को इतना मर्यादित रहना चाहिए।

वैसे क्या राहुल जी के पास यह अधिकार है भी कि वे किसी को चोर कह सकें? इस देश का पहला घोटाला तब हुआ था जब उनके पूर्वज पण्डित नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे।

रक्षा क्षेत्र का सबसे बड़ा घोटाला तब हुआ जब उनके पिता स्वर्गीय राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे।

और जिस सरकार में इस देश ने घोटालों का विश्व रिकार्ड बनाया उस सरकार की मुखिया उनकी माताजी थीं, और वे स्वयं उपाध्यक्ष थे।

क्या राहुल जी ने कभी स्वर्गीय नेहरू, इंदिरा जी या राजीव जी को चोर कहा है?

राहुल गाँधी विगत बीस वर्षों से उस लालू यादव की पार्टी के साथ गठबंधन में हैं, जिनका पूरा परिवार घोटालों में आकंठ डूबा हुआ है। राहुल जी उस करुणानिधि की पार्टी के साथ गठबंधन में हैं, जिनका पूरा परिवार घोटालों का आरोपी है।

राहुल जी उन वामपंथियों के साथ गठबंधन में रहे हैं जिन्होंने “कभी भारत का बौद्धिक नेतृत्व करने वाले और यूपी बिहार को रोजगार देने वाले” बंगाल को ऑर्केस्ट्रा के लिए लड़की सप्लाई करने वाला बंगाल बना दिया।

क्या राहुल जी कभी अपने इन मित्रों को चोर कहेंगे? क्या लालू जी के साथ खड़ा व्यक्ति इतना नैतिक अधिकार रखता है कि वह किसी को चोर कह सके?

राफेल का पूरा विवाद यही है न कि एक विमान के लिए 2007 में जो मूल्य निर्धारित हुआ था वह 2017 में तीनगुना कैसे हो गया? राहुल जी! किसी साधारण प्रजा से पूछिए, उसने इन दस वर्षों में पेट्रोल डीजल के साथ साथ लगभग प्रत्येक आवश्यक सामग्री का मूल्य तीन गुना से अधिक बढ़ते देखा है। और तो और, इन दस वर्षों में आप सांसदों का वेतन भी लगभग आठगुना बढ़ गया है।

फिर किसको मूर्ख बना रहे हैं आप? कोई वस्तु सन 2018 में सन 2007 के मूल्य में नहीं मिलेगी, इतना व्यवहारिक ज्ञान आपको भले न हो, भारत की प्रजा को है।

अभी राहुल जी का सौभाग्य है कि प्रजा उनकी गर्दन पकड़ कर यह नहीं पूछ रही कि जब अटल जी की सरकार में ही राफेल का क्रय निर्धारित हुआ था तो दस वर्षों में भी आपने यह क्रय किया क्यों नहीं? राफेल के लिए आवश्यक पैसे से अधिक पैसा तो आपकी नाक के नीचे से कनिमोझी या राजा जैसे चोर चुरा ले गए।

राफेल के क्रय में यदि अनियमितता हुई है, तो मोदी सरकार को प्रजा अवश्य दण्ड देगी। जिस इंदिरा के बारे में कभी कांग्रेसी कहते थे कि “आफ्टर इंदिरा हू विल बी इंदिरा?”, उस इंदिरा को भी रायबरेली की प्रजा ने पराजित किया था।

अटल बिहारी वाजपेयी जैसा स्वच्छ छवि का नेता भी “बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले…” गाते हुए ग्वालियर से पराजित हो कर निकल गया था। प्रजा न्याय करना जानती है महाराज! पर वह नौटंकी को भी पहचानती है। उसे ज्ञात है कि चोर कौन है।

राहुल जी को बस इतना स्मरण रखना चाहिए कि “जिसकी पत्नी उसे लात मार कर भाग गई हो, वे दूसरे की पत्नियों को मुस्कुरा कर भउजी नहीं कहते…”

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