जितने कम प्रतिशत NPA, उतनी अच्छी बैंक की सेहत

हर व्यापार, उद्योग कामयाब नहीं हो सकता, इसलिए NPA हकीकत हैं और रहेंगे ही। उन पर नियंत्रण, कारगर तरीके से डूबा पैसा निकालना, सही समय पर रिपोर्टिंग ही उपाय है

एक आम धारणा रही है कि हम जो पैसे बैंकों में जमा करते हैं वो बैंक आगे लोन के रूप में देते हैं। ज्यादा ब्याज दर पर देते हैं और इस बढ़ी ब्याज दर से कमाई करते हैं।

अक्सर प्रबुद्ध लोग धमकी भी देते हैं कि सरकार जनता के जमा पैसे से बैंकों को बेलआउट कर रही है। विजय माल्या, नीरव मोदी जनता का जमा पैसा लेकर भागे हैं। ये जो अम्बानी-अडानी हैं जनता का जमा पैसा खाकर NPA हो गए हैं।

पीछे सरकार एक ऐसा कानून ला रही थी जिसमें आम जमाधारकों का पैसा बैंक डूबने की स्थिति में ज़ब्त हो सकता था।

बैंक में पैसा केवल आम जनता का ही नहीं होता। कंपनियों का पैसा भी किसी तिजोरी में नहीं होता, बैंकों में ही होता है। और उन्हें इस जमा पर कोई ब्याज नहीं मिलता।

भारत में कुल कॉरपोरेट लोन करीब 75 लाख करोड़ है। ये आम जनता के जमा पैसे से कहीं ज्यादा है। और ये लोन बैंकों द्वारा दिया गया है।

इसके अलावा नॉन बैंकिंग फाइनेंस कम्पनीज़ होती हैं जैसे IL&FS है, जो जनता से पैसा जमा नहीं करवाती, लेकिन कॉरपोरेट को लोन देती हैं। ऐसी तमाम कम्पनीज़ हैं।

माइक्रो फाइनेंस कम्पनीज़ किसानों को लोन देती हैं लेकिन किसान या आम जनता से सेविंग अकाउंट में जमा नहीं स्वीकार करती।

बहुत कम कॉरपोरेट या NBFC आम जनता से फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में पैसा लेते हैं।

फिर…

इन्हें पैसा रिज़र्व बैंक से मिलता है। म्युचुअल फंड से मिलता है। इंश्योरेंस कम्पनीज़ से मिलता है। ये पैसा लोन के रूप में होता है। और अक्सर NBFC की इक्विटी पर निर्भर करता है।

इसी तरह बैंक भी रिज़र्व बैंक से पैसा लेते हैं, बैंक रेट पर और आगे कॉरपोरेट, पर्सनल फाइनेंस करते हैं। कल जब रिज़र्व बैंक मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा तब बैंकों को जिस रेट पर पैसा देता है उसे ऊपर नीचे करेगा। उसी आधार पर बैंक अपना प्राइम लेंडिंग रेट डिसाइड करेंगे।

आम कॉरपोरेट को जो लोन दिया जाता है, उसमें निश्चित ही एक शेयर आम जनता के पैसे का है, लेकिन केवल आम जनता का पैसा ही नहीं है जो बैंक आगे लोन के रूप में देते हैं।

बैंक केवल कॉरपोरेट लोन ही नहीं देते, पर्सनल, कंज्यूमर, मुद्रा, होम लोन, किसान लोन भी देते हैं।

NPA कारपोरेट में ही नहीं, बाकी जगह भी होते हैं। जितना कम NPA की % में दर, उतनी अच्छी बैंक की सेहत। यानी % में NPA कितने हैं ये महत्वपूर्ण है न कि कितने लाख करोड़।

आह अम्बानी-अडानी की सरकार, मिडल क्लास की दुश्मन सरकार

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