जय जवान : आप हैं तो हमारा अस्तिव कायम है

तस्वीर रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल सुमीत बक्शी की है और उनके बगल में प्रिया जवागले बैठी हैं जो पेशे से एक स्कूल टीचर हैं।

इनका दोनों का रिश्ता आज का नहीं करीबन 25 साल पुराना है और 25 साल पहले मिले यह दोनों शख्स आज करीबन ढाई दशक के बाद पुनः मिले हैं।

जब लेफ्टीनेंट कर्नल सुमीत प्रिया से पहली बार मिले थे तो वह केवल 18 महीने की थी।

बात 1993 की है जब महाराष्ट्र के लातूर जिले में एक भयंकर भूकंप आया था। रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 6.2 मापी गयी थी।

करीबन 10,000 लोगों की मृत्यु हो गयी थी और करीबन 30,000 लोग घायल हुये थे।

सरकार को जब स्थिति काबू से बाहर होती दिखी तो हमेशा की तरह हालात काबू करने के लिये इंडियन आर्मी का सहारा लिया गया। लेफ्टिनेंट कर्नल सुमीत बक्शी और उनकी टीम तो तुरंत लातूर पहुंचने के निर्देश दिये गये।

बक्शी जब वहां पहुंचे तो सारा लातूर कब्रिस्तान में तब्दील हो चुका था। चारों ओर मौत तांडव कर रही थी। हर ओर लाशें दिखाई दे रही थी। मकान दुकान तहस नहस हो चुके थे।

बक्शी अपनी टीम के साथ रेस्कयू ऑपरेशन में जुट गये। इतने में एक दम्पति बक्शी की ओर दौड़ते हुऐ आये और हाथ जोड़ कर उनके सामने खड़े हो गये।

“हमारी बिटिया मलबे में फँसी हुई है। उसे बचा लीजिये!” इतना कहते ही वह व्यक्ति बक्शी के चरणों मे गिर गया। बच्ची की मां का भी रो रो कर बुरा हाल था।

बक्शी ने पिता से पूछा के उसका घर कहाँ है। पिता ने एक खण्डर की ओर इशारा कर दिया। कर्नल ने अपनी टीम को आवाज़ दी तो अगले कुछ क्षणों में जवान कर्नल के आगे सावधान अवस्था में खड़े थे। खण्डर हो चुके घर की ओर ईशारा किया गया और कर्नल ने कहा के इस मलबे में एक नन्ही सी जान कैद है जिसे हमने सुराक्षित बाहर निकालना है।

ऑपरेशन शुरू हो चुका था। बक्शी स्वयं एक ओर से मलबे में घुस चुके थे। भारी से भारी मलबे को सैनिकों के बलिष्ठ बाजू हटा रहे थे।

इतने में सुमीत का हाथ किसी ठोस पदार्थ पर लगा।

सुमित ने ध्यान से देखा तो वह एक झूला था। वही झूला जिसमे बच्ची सो रही थी। परन्तु मलबे में झूले का वह कोना ही दिखाई दे रहा था।

आशा जाग उठी।

शायद बच्ची जीवित थी।

सुमित ने खुद को बमुश्किल मलबे से बाहर निकाला और आस पास खड़े निवासियों से मदद मांगी। वहां मौजूद लगभग 100 से अधिक व्यक्ति मलबा हटाने लगे। झूले के आस पास का मलबा जब हटाया गया तो मौत को धोखा दे चुकी 18 माह की अबोध बच्ची का धूल धूसरित चेहरा दिखाई दिया।

सुमित बताते हैं के यह उनके जीवन के सबसे बेहतरीन लम्हों में से एक था। उन्होंने बच्ची की नन्ही उंगलियों को छुआ। एक कपड़े में उसे बड़ी ही सावधानी पूर्वक लपेटा और मलबे से बाहर ले आये।

माता पिता के लिये अपनी खोई हुई बिटिया को जीवित देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था। सुमीत बताते हैं के माँ बच्ची को अपने सीने से लगा रोती रही। पिता नतमस्तक थे। हाथ जोड़ कर कर्नल और उनकी टीम को धन्यवाद दे रहे थे और इतने भावुक थे के शुक्रिया कहने के लिये जुबां में शब्द नहीं थे।

बच्ची बेहोशी की हालत में थी। उसी समय उसे साथ के रिलीफ केम्प ले जाया गया जहां प्राथमिक उपचार के बाद वह ठीक हो गयी।

मलबे में अपनी जान की बाज़ी लगा कर बच्ची को ढूंढते समय सुमीत के शरीर पर जगह जगह चोट आई। एक सरिया तो उनकी बाजू को काटता हुआ निकल गया। परन्तु घायल सुमित को अपने घाव नहीं अबोध बच्ची की मुस्कान दिख रही थी।

लातूर हादसे को अब 25 साल बीत चुके थे। नवजीवन पा चुकी प्रिया अब एक स्कूल टीचर बन चुकी थी। सुमित को किसी व्यक्ति से प्रिया के विषय में पता चला। वह सपरिवार प्रिया को मिलने गये।

ढाई दशक के बाद सुमित उस अबोध बच्ची को देख पा रहे थे जिसे उनके शौर्य से जीवनदान मिला था और ढाई दशक के बाद प्रिया उस व्यक्ति के समक्ष खड़ी थी जिसने उसे जीवनदान दिया था। प्रिया ने सुमित के चरणस्पर्श किये तो एक बार पुनः एक जीवनदाता के श्रीमुख से निकल पड़ा

“जीती रहो” !

जब मैं यह लेख लिख रहा हूँ शायद उसी समय बॉर्डर पर खड़ा एक जवान एक गोली अपनी छाती पर झेल रहा है जिसपर वास्तव में मेरा नाम लिखा है। कभी बाढ़ के उफनते पानी से तो कभी भूकंप की तबाही से….

ना जाने कितनी बार कितने लोगों को आर्म्ड फोर्सेज़ के जवानों ने जीवनदान दिया है…

लेफ्टिनेंट कर्नल सुमित बक्शी को ही नहीं हर उस जवान को नमन जो हमारे जीवनरक्षक हैं।

“आप हैं तो हमारा अस्तिव कायम है”

VIDEO : ले. कर्नल पुरोहित को षडयंत्रपूर्वक फंसाने की साज़िश का खुलासा

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY