भारत की गांधी से मोदी तक की यात्रा

modi gandhi
Modi- Gandhi

भारत में एक बच्चा पहली बार गांधी का नाम पांच से छः वर्ष की उम्र में ही सुन लेता है. और उसके बाद उसके पूरे विद्यालयीन जीवन में उसे लगातार गांधी नाम की घुट्टी पिलाई जाती है.

किसलिए? वामपंथियों द्वारा लिखे इतिहास को एक तरफ रखकर भी विचार करें, तो इसलिए ताकि हमारी नई पीढ़ी अहिंसा का अर्थ समझ सके. उसके कोमल मन पर उसके आसपास से हो रहे लगातार हिंसा के आघात के बावजूद वह कोमल और अहिंसक बना रह सके.

शिक्षक और माता-पिता की डांट और मार के बावजूद वह हिंसा करना न सीखे. वह त्याग का महत्व समझ सके, कि केवल एक धोती पहना हुआ गरीबों के लिए दयाभाव रखता इंसान, अपने हाथों से शौचालय साफ़ करता हरिजनों का शुभचिंतक, राजनीति में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सभी पक्षों को संभालता एक कुशल राजनीतिज्ञ, एक संन्यासी कैसे अपने कार्यों से महात्मा बन जाने की योग्यता हासिल करता है.

बच्चों के कोमल मन को सही दिशा में ढालने के लिए हमेशा से ही ऐसे आदर्शों के बारे में पढ़ाया जाता है ताकि वह सत्य के मार्ग पर चलकर अपनी आत्मिक उन्नति कर सके. इसमें कोई हर्ज़ भी नहीं.

फिर किशोर या वयस्क होने पर एक दिन उसे गांधी के “सत्य के प्रयोग” के बारे में पता चलता है. लेकिन तब तक गांधी एक आदर्श के रूप में इतने गहरे में पैठ चुके होते हैं कि एक टूटी हुई धारणा के साथ भी उन्हें अपने आदर्श के रूप में वे स्वीकार है.

ऐसे कई गांधीवादी राष्ट्रप्रेमियों को मैं देखती हूँ, जिनमें एक तरफ हिंदुत्व को लेकर चिंता भी है और दूसरी तरफ वे इतने अधिक अहिंसक हो चुके हैं कि भगवान् न करे यदि किसी दिन गृहयुद्ध की स्थिति बनी तो वे आत्मरक्षा के लिए तलवार उठाने के बजाय चौराहे पर उपवास करते नज़र आएँगे, तो मुझे आश्चर्य न होगा.

हर व्यक्तित्व की अपनी प्रासंगिकता होती है. जैसे ओशो का जन्म ऐसे समय में हुआ जब उनकी आवश्यकता थी, आज के हिंदुत्व की लहर के बीच ओशो गाली खा रहे हैं, तो अब उद्गम हुआ है सद्गुरु का.

ऐसे ही बदलते समय के साथ नए आदर्श व्यक्तित्व का प्रकटीकरण होता है… बदलते समय के साथ जो खुद को नहीं बदल पाता वह पिछड़ जाता है… गांधी से चिपके सारे लोग जैसे उनके अहिंसा और त्याग के आदर्श को तो अपनाते हैं, लेकिन आवश्यक नहीं कि वे उनके सत्य के प्रयोग वाले विचार को भी अपनाए.

ठीक उसी तरह आज के समय में आप गांधी के कुछ फैसलों को दुत्कारते हैं, लेकिन नोट पर छपी उनकी तस्वीर के साथ उन्हें जेब में लिए भी घूम रहे हैं. यह आपकी मजबूरी है.

एक कुशल राजनीतिज्ञ वही है जो पुराने को नया चोला ओढ़ाकर भी उसका सदुपयोग करना जानता हो.

आज के समय में शास्त्री काम न आते, अटल के सारे प्रयासों के बावजूद उन्हीं दिनों जनता ने उन्हें अस्वीकार कर दिया था, आज के समय में मजबूत इरादों वाली इंदिरा फिर भी टिक सकती थी यदि वह सिर्फ कांग्रेसी न होती.

तो आज के समय में मोदी जी प्रासंगिक है. लेकिन आप यह नहीं समझ पा रहे कि गांधी की तमाम खूबियों के बावजूद उनका महिमामंडन करना मतलब कांग्रेसी नीतियों का पक्षधर होना हो जाता है. जैसे हर समय हर व्यक्ति प्रासंगिक नहीं वैसे ही हर समय हर विचार की पैरवी करना भी ठीक नहीं.

ठीक है हर व्यक्ति में कुछ गुण अवगुण होते हैं, इसलिए गांधी कोई अपवाद नहीं, लेकिन समय की मांग को आप समझ नहीं रहे, यदि ओशो की शिष्या होने के बावजूद यदि मुझे ओशो की बुराई करते हुए हिंदुत्व को बचाना होगा तो उसके लिए ओशो की चेतना स्वयं मदद करने आएगी. वैसे ही गांधी के सारे गुणों के बावजूद यदि नई पीढ़ी को हिंदुत्व की रक्षा के लिए “अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:” में से यदि मुझे उसका पहला हिस्सा गायब करना पड़े जैसे गांधी के महिमा मंडन के लिए दूसरा हिस्सा गायब कर दिया गया, तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी.

गांधी वादी राष्ट्रप्रेमियों, आप समय की नज़ाकत समझिये, गांधी के बारे में आपकी सारी बातें सही हो सकती हैं लेकिन कौन से समय में कौन सी बात प्रस्तुत करना चाहिए यह आप मोदीजी से सीखिए. अभी उनके जैसे कुशल राष्ट्रनीतिज्ञ बनने के लिए बहुत यात्रा बाकी है.

और मोदी जी से बेहतर और कौन समझ सकता है कि आज की राजनीति में गांधी के आदर्श नहीं, गांधी नाम को एक ब्रांड के रूप में प्रचलित करना आवश्यक है.

गांधी नाम के जिस झूले पर सवार होकर आप जिस पेड़ की शाखाओं से झूल रहे थे उसकी शाखाएं अब सूख रही हैं… क्योंकि जो पेड़ फल देना नहीं जानते उनका एक दिन यही हश्र होता है. मान्यता ये भी है कि ऐसे पेड़ों पर प्रेत अपना घर बना लेती है… फिर कोई विवेकशील उस पेड़ के इर्द गिर्द भी नहीं मंडराता….

इसलिए अब तक जो गांधी के नाम का खाद पानी उसे मिल रहा था वो अब स्वच्छता अभियान और खादी के लिए नरेन्द्र मोदी ने निवेश करना प्रारम्भ कर दिया है. ताकि कोई और वृक्ष इससे फले फूलें, फल दें, और देश का उद्धार हो…

आज गांधी केवल एक इंसान नहीं रह गए हैं वो एक प्रतीक हो गए हैं…. भारत की पहचान है, आज हर व्यक्ति चाहे वो गांधी के विचारों से सहमत ना हो तब भी उसे जेब में लेकर घूमना उसकी मजबूरी है…

इसलिए आपने गांधी की जिस छवि को गढ़ा था उसका धुंधला होना समय की मांग है, तभी मोदी का चेहरा स्पष्ट दिखाई देगा…

अब मोदी नाम से नई छवि उभर कर आ रही है… ध्यान देना स्वत: उभर कर आ रही है… उसे गढ़ा नहीं जा रहा… जो गांधी नाम की मजबूरी को भी सकारात्मक रूप देकर देश के उत्थान के लिए अपनाना जानता है वही उस विरासत को संभालने लायक भी है….

खैर गांधीजी हमारी श्रद्धांजलि स्वीकार कीजिये…. लेकिन आपकी आत्मा अब चेहरा बदल रही है….

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