हम मोदी को तब तक वोट देते रहेंगे जब तक दिए सारे वादे पूरे नहीं करते

राष्ट्रवाद का बुर्क़ा ओढ़कर राष्ट्रहित को पलीता लगानेवाले बुद्धिपिशाच अब वैसे ही बिलबिलाकार सामने आ रहे हैं जैसे अपने बिलों में पानी डाले जाने पर चूहे। कटाई से थोड़ा पहले फसल की बालियों को ये बिलों में छिपा देते हैं। उसके पहले जी भरकर गुलछर्रे उड़ाते है और नाटक ऐसा मानों इनके बिना किसानी संभव ही नहीं।

ये कहते हैं कि हमने मोदी को वोट देकर गलती की। तो लो भई, अब सुधार लो। हमने भी अपनी मित्रसूची में आपको शामिल करने की गलती की, अब सुधार लेंगे क्योंकि हमें वह व्यक्ति एकदम गवारा नहीं जिसकी किसी हरकत से जनेऊधारी कॅथॉलिक ब्राह्मण एकमेव शिवभक्त को ज़रा सा भी लाभ पहुँचता हो।

मित्रो! हम चाहे अनचाहे भीषण वैचारिक ‘युद्ध’ की स्थिति में पहुँच गए हैं। 100 सालों से सत्ता की मलाई चाभ रहे परिवारों के लोग बहुविध रूप में राष्ट्रीय नवजागरण को पंक्चर करने में लगे हैं। सबसे आसान है भगवा ओढ़कर भगवा-भाव की ऐसी-तैसी करना। इसीलिए एक गो-खोर खानदानी एड़ा अपनी कैलाश-यात्रा से लल्लनटॉप पेड़ा की उम्मीद लगा बैठता है।

इस एड़ा के चरणचंपक क्रितदास कमभक्त वैसे ही हैं जैसे ‘साधू वेष में रावण आया’। इनसे सावधान! हम भी मोदी को तब तक वोट देते रहेंगे जबतक हमें दिए सारे वादे पूरे नहीं किये जाते।

इस बीच चाहे आरक्षण को बढ़ाकर 100 फ़ीसदी कर दिया जाए या फिर एससीएसटी कानून को और अँधा बना दिया जाए, हमारा फैसला बदलेगा नहीं क्योंकि हम यह नहीं भूलना चाहते कि यह छुआछूत, जातपात, मूलनिवासी-आर्य-अनार्य ये सब उनकी देन है जो काँग्रेस के कुलदेवता हैं जिन्होंने 15 करोड़ से अधिक भारतीयों के तब नरसंहार किये जब इस देश की आबादी ही 20-22 करोड़ से अधिक नहीं थी; उन्होंने हमारे 30 से अधिक विश्वविद्यालय जला दिए या लूट लिए; हमारी देसी कौशल-आधारित आत्मनिर्भर जनशिक्षा व्यवस्था को मारकर उसे परनिर्भर बना दिया; अर्थव्यवस्था का दम घोंटकर उसे सरकार और कुछ परिवारों की चेरी बना डाला।

उपरोक्त नरपिशाचों की वारिस काँग्रेस ने अपने ही राष्ट्रवादी नेताओं को हाशिये पर डाल दिया। नेताजी-तिलक-लाला लाजपतराय-अरविंद-खान अब्दुल गफ्फार खान -पटेल की जगह नेहरू-गाँधी छा गए; वीरता और रणनीतिक सोच की जगह धूर्तता, कायरता और वोटबैंक-केंद्रित राजनीति ने ले ली; प्रताप-शिवाजी-गुरुगोविंद सिंह-दारा शिकोह की जगह तुग़लक़-औरंगज़ेब ने ले ली; इस्लाम के नाम पर एक अलग मुल्क बनने के बावजूद भविष्य के पाकिस्तानों से भारत को मुक्ति नहीं मिली; बहुसंख्यक हिन्दू अपने ही देश में अल्पमत मानसिकता का शिकार हो गया; और सेकुलरवाद का मतलब हो गया अल्पसंख्यक तुष्टीकरण, हिन्दू-द्वेष और भारत-विरोध।

सैकड़ों सालों में खड़े किये गए झूठ के इस किले को ढहाने के लिए 15 साल भी कम हैं। फिर हम उनके साथ क्यों जाएँ जो इस किले के खानदानी लाभार्थी हैं, इंजीनियर हैं, वास्तुकार हैं! ये उस बूढ़े गिद्ध की तरह हैं जो पक्षी-शावकों की रक्षा के नाम पर हत्या करता था। हर हाल में इनसे मुक्ति में ही असली आज़ादी है।

जय हिंद।

हां, मैं भक्त हूं!

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