टीवी चैनलों का घटता स्तर : ज़िम्मेदार कौन दर्शक या मीडिया?

अपने देश में हिंदी भाषा के समाचार चैनल तथा स्थानीय भाषाओं के लोकल समाचार चैनलों में अधिकतर बहुत सतही तथा सनसनी खेज़ हैं. (एक दो अपवाद छोड़ कर).

चूँकि सामजिक स्वभाव, ह्युमन साइकोलाजी और उन विषयों पर अध्यन का मेरा पुराना स्वभाव रहा है जिसमें आत्म आलोचना या नए नए समाजिक तथ्य खोजने के व्यापक अवसर हैं.

अतः तमाम कारणों से मुझे यह जानकारी काफी पहले से थी कि ख़ास तौर पर हिंदी भाषी समाचार मीडिया का स्तर बहुत गिरा हुआ क्यों है. लेकिन इस तथ्य की पुष्टि एक बड़े पत्रकार के जरिये तब हुयी जब हम इसी वर्ष मई महीने में दिल्ली में एक सेमीनार में गए थे.

उस सेमीनार में इंडिया टीवी के वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा से कई मित्रों ने यह सवाल पूछा कि मीडिया आखिर सनसनीखेजज़ टुच्चे विषय क्यों दिखाता है?

स्याह काली रात में रहस्यमयी बिल्ली, पांड्वो के कुत्ते की स्वर्ग यात्रा, स्वर्ग की सीढ़ी जैसे प्रोग्राम मीडिया क्यों दिखाता है?

शाम को इन समाचार चैनलों पर अजीबोगरीब किस्म की सतही बहस के कार्यक्रम क्यों दिखाए जाते हैं?

दोपहर के समय ये समाचार चैनल सास-बहू, जीजा-साली, उस देश में निकला होगा चाँद जैसे सस्ते घटिया टुच्चे नकली विषय क्यों दिखाते हैं जबकि इन चैनलों का काम है समाचार दिखाना.

ऐसे तमाम सवालों के उत्तर में रजत शर्मा का जवाब था – औसत आम जनता जो देखना चाहती है, मीडिया वैसा ही दिखाता है. कुछ प्रतिशत जागरूक लोगों से मीडिया ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रह सकता.

क्योंकि मीडिया को चलाना बहुत महंगा काम है, इसमें प्रति माह कारोड़ों रुपये खर्च होते हैं और ये पैसे बैंक लोन या अन्य स्त्रोतों से उधार लिए जाते हैं जिन्हें प्रति माह किश्त के रूप में ब्याज सहित वापस भी करना पड़ता है.

किसी चैनल को जितने अधिक लोग देखेंगे उतनी ही उसकी TRP होगी और उसी TRP के आधार पर चैनल को विज्ञापन मिलते हैं जोकि किसी चैनल की आय का इकलौता साधन होते हैं.

तो प्रारंभिक दिनों में रजत शर्मा ने भी देश तथा समाज के हित के मुद्दों पर, राष्ट्रीय विषयों पर, चरित्र निर्माण पर, स्वास्थ सम्बन्धी विषयों से सम्बंधित कई कार्यक्रम चलाए थे लेकिन आम जनता के एक बड़े हिस्से ने उन कार्यक्रमों के प्रति कोई रूचि नहीं दिखाई और चैनल की TRP गिरने लगी तथा चैनल बड़े घाटे के साथ लोन के तले दबने लगा था.

फिर रजत शर्मा ने बताया कि जैसे ही उन्होंने औसत आम जनता की पसंद वाले कार्यक्रम दिखाना शुरू किया. उनके चैनल के आर्थिक हालात अच्छे होने लगे. इस बात को अगर ज़मीनी स्तर पर चैक करना हो कि आम जनता क्या देखती है, आप अपने मोहल्ले, कॉलोनी, बिल्डिंग में रहने वाले समाज के टीवी देखने के स्वभाव का अध्यन कर डालिए कि समाज क्या देखना अधिक पसंद करता है.

ऐसे विषयों पर मुझे अध्ययन करना बहुत प्रिय है और कल हम एक सार्वजानिक स्थान पर समाज के उस हिस्से के साथ थे जो अपने को उच्च वर्ण और मूर्धन्य विद्वान् समझने के भ्रम का शिकार है. उसी समाज के बीस पच्चीस लोगों से देश और समाज के मुद्दों पर चर्चा करते समय ऐसा महसूस हुआ कि इस समाज में भी प्रचंड जाहिलियत विद्यमान है.

लोग देखेगे फ़िल्मी सीरियल, टुच्चे मनोरजन वाले कार्यक्रम, सनसनी या अपराध वाली मनोहर कहानियां जैसे विषय, पाखंडी टाईप के अर्ध सत्य धार्मिक विषय और देश के मुद्दों पर पढ़ेंगे या समझेंगे सिर्फ समाचारों की हेडिंग और फिर खुद को समझ लेंगे विश्व स्तर का ज्ञानी और उसके बाद उनके पास समस्याओं और जाहिल अति नकारात्मकता का भारी पिटारा होता है.

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