निरपेक्षता एक भ्रम : जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध

पिछले चार दशकों से भारतीय राजनीति में जो शब्द सबसे अधिक प्रयोग किया गया, या यूँ कहें कि जो शब्द देश में राजनीति शुरू करने और जीवन भर करते रहने के लिए सबसे मुफीद समझा गया…वो शब्द है “निरपेक्षता”।

समभाव, सौहार्द, सहिष्णुता, मानवीयता, जैसे शब्दों को पछाड़ कर एक शब्द का लगातार शीर्ष पर बना रहना, उसकी राजनीतिक उपयोगिता को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। संविधान के बनने और अंगीकृत किए जाने के वर्षों बाद अचानक उसकी प्रस्तावना में अपना स्थान बना लेना कोई आसान काम नहीं है।

बहरहाल अभी हाल ही में विज्ञान भवन में संपन्न हुए संघ के विचार मंथन में पूज्य सरसंघचालक जी ने NOTA के विषय में बात करते हुए महाभारत की एक कथा का ज़िक्र किया।

कथा कुछ यूँ है कि महाभारत के युद्ध की घोषणा होने पर यदुवंशियों की राज्यसभा में यह विमर्श चला कि हमें किस पक्ष की ओर जाना चाहिए? कुछ लोग कौरवों के पक्ष में थे तो कुछ पांडवों के पक्ष में… तब बलराम ने कहा कि हम कितना भी विमर्श क्यों ना कर लें अंत में करेंगे वही जो कृष्ण कहेगा, तब उसी से क्यूँ ना पूछ लिया जाए कि वो क्या चाहता है?

तब कृष्ण ने राज्यसभा में एक भाषण दिया कि ‘ये सत्य है कि अगर कौरव अधर्मी हैं तो पांडव भी कोई दूध के धुले नहीं हैं, अधर्म तो दोनों ही पक्षों से हुआ है, पर जब हमें दो पक्षों में किसी एक पक्ष को चुनना हो तो हमेशा उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ पक्ष को चुनना ही बेहतर विकल्प होता है’ स्मरण रहे कि कृष्ण यहाँ निपेक्षता के सिद्धांत को सिरे से नकार देते हैं, क्योंकि सृष्टि और दृष्टिगत सत्य यही है कि निरपेक्षता संसार में संभव ही नहीं है, कम-अज़-कम मनुष्य के लिए तो नहीं…

यहाँ ध्यातव्य है कि बलराम कृष्ण की इस नीति से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने स्वयं को तटस्थ/निरपेक्ष घोषित कर दिया, पर सिर्फ घोषणा कर देने से ही कोई व्यक्ति निरपेक्ष नहीं हो जाता। युद्ध के अंतिम समय में भीम और दुर्योधन के बीच हुए गदायुद्ध के समय वही बलराम दुर्योधन के पक्ष में खड़े होकर अपना पक्ष प्रकट कर देते हैं…

स्पष्ट है कि सृष्टि पाक्षिकता के सिद्धांत का पालन करती है निरपेक्षता का नहीं… यहाँ दो ही पक्ष हैं नर-मादा, सत्य-असत्य, काला-सफ़ेद, पाप-पुण्य, हाँ-नहीं (आगे जोड़ते जाइए) युधिष्ठिर का “अश्वथामा हतो, नरो व कुंजरो” भी इसी श्रेणी में आता है।

जिसे अर्धसत्य की संज्ञा दी जाती है पर मैं उसे अपूर्ण असत्य की संज्ञा देता हूँ क्योंकि वहां भी युधिष्ठिर का पक्ष स्पष्ट है। हम कितना भी झुठलाने की कोशिश करें, पर हम जानते हैं कि हम सब किसी ना किसी एक पक्ष की ओर झुके होते हैं। आप लड्डू खा सकते हैं या बचा सकते है। खाकर बचाना या बचाकर खाना किसी भी स्थिति में संभव नहीं है।

न्यायालय भी इसी सिद्धांत का पालन करता है। वहां भी दो पक्ष हैं पर निर्णय किसी एक पक्ष को ही सही ठहराता है। वहां दोनों पक्षों की संतुष्टि के लिए कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला जा सकता।

राम मंदिर के मामले में अनिर्णय की स्थिति भी इसी बात को पुष्ट करती है, क्योंकि सब जानते हैं वहां भी किसी एक पक्ष की जीत सुनिश्चित है। (और कोई भी प्रधान न्यायाधीश ये निर्णय देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा, सब अपने सेवानिवृत्त होने की बाट जोह रहे हैं)।

अब बात करते हैं भारत के पूर्व राष्ट्रपतियों की जो आरम्भ में समाज के प्रबुद्ध वर्ग से चुने गए और जिनका किसी राजनीतिक पार्टी से सीधा सम्बन्ध नहीं था। वो कभी चुनावों में अपना मत प्रयोग नहीं करते थे, क्योंकि इससे जनता में ये सन्देश जाता था कि देश के सर्वोच्च्य संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति भी किसी एक पक्ष के ओर झुका हुआ है।

बाद में घोर राजनीतिक व्यक्तियों ने राष्ट्रपति बनकर इस परंपरा को भी बदल दिया और ये बदलाव एक तरह से ठीक ही कहा जा सकता है क्योंकि अब कम-अज़-कम अपने पक्ष को छुपा कर निरपेक्ष बने रहने का ढोंग तो नहीं रचा जा रहा।

इतिहास में जायें तो गांधी भी जीवन भर निरपेक्षता का ढोल पीटते रहे पर ये देश उनके पक्षपात का जीवंत साक्षी है। नेहरू-पटेल, सुभाष-सीतारमैय्या और हिंदुस्तान-पाकिस्तान जैसे असंख्य उदाहरण हैं जहाँ उनका पक्षपात जगजाहिर है पर तब से लेकर आज तक हम उन्हें निरपेक्ष मानते हैं।

दरअसल निरपेक्षता… आदर्श गैस और आदर्श स्थिति की तरह होती है, जिन्हें मानकर हम प्रयोगशाला में बहुत से प्रयोग सिद्ध करते हैं, पर हम सब जानते हैं कि आदर्श गैस और आदर्श स्थिति का ब्रम्हांड में कोई अस्तित्व ही नहीं है।

अब प्रश्न ये है कि ये जानते हुए भी कि हमारा कोई पक्ष है हम स्वयं को निरपेक्ष क्यों सिद्ध करना चाहते हैं? अपने पक्ष को गर्व के साथ सार्वजानिक रूप से स्वीकारने में हम लज्जित क्यों हैं?

दरअसल हमारे मन-मस्तिष्क में ये बात इस तरह से स्थापित कर दी गई कि अगर आप निरपेक्ष नहीं है तो शायद मनुष्य ही नहीं हैं। आज का सत्य यही है कि स्वयं को गर्वित हिन्दू या सनातनी समझने वाले हर मनुष्य को छोड़ कर शेष सभी पक्षपाती… निरपेक्ष घोषित कर दिए गए हैं।

यही समय है इस शब्द के भ्रम और छद्म को तोड़ने का… 2019 नज़दीक है तय कर लीजिए आप किस पक्ष के साथ खड़े हैं, अन्यथा दिनकर तो कह ही गए हैं….

“समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध”

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