मोदिया उनकी जड़ खोद रहा है, अधीर हो कर मोदिया की ही जड़ मत खोद देना

सबरीमला निर्णय और बाहरी विधर्मी आक्रांताओं द्वारा मगरूरी से किया हुआ मूर्तिभंजन इनमें in principle क्या फर्क है, यही समझने में कन्फ़्यूज़न हो रहा है।

हरिजनों के मंदिर प्रवेश के आंदोलन हुए थे, हिन्दू समाज के लोगों ने ही साथ दिया था, और मंदिर खुले हुए। योग्य घटना थी।

इसी तरह अगर हिन्दू महिलाएं खुद यह आंदोलन करतीं तो भी समझ आता। वैसे इस मंदिर में सब से अधिक जानेवाले भक्त कहाँ से आते हैं यह भी देखना चाहिए कि क्या उनकी भी यही मंशा थी या नहीं? उन्होने तो वहाँ Ready To Wait नाम से मूवमेंट चलायी तो इसमें इतनी urgency किसको आ गयी ?

मुकदमा करता है एक विधर्मी! लेकिन उसमें उसका locus standi स्वीकार किया जाता है।

वैसे कुछ और बात को देखते हैं। किसी भी देवस्थान की महिमा अगर है तो उसमें उससे जुड़े सभी रूढ़ि-परम्पराओं का योगदान भी होता है। भक्तों की श्रद्धा जुडने में उन रूढ़ि-परंपरा भूमिका निभाती हैं। वे सही होती हैं या नहीं ये मुद्दा नहीं है लेकिन अपने सामर्थ्य के दम पर बदलाव थोपना, यवनों द्वारा मूर्ति तोड़कर दर्पोक्ति करने से किस कदर भिन्न है यही समझ में नहीं आता।

छिन्न मंदिर खंडहर बन गए, वहाँ से भक्त दूर हो गए और समाज के शक्ति केंद्र शुष्क होते गए और विनष्ट से हुए। कहीं जीर्णोद्धार हुआ, कहीं नहीं हुआ।

Art Of War में कहा गया है कि बिना हिंसा से शत्रु पर पायी जीत सब से बड़ी होती है – यही याद आता है। आज के तारीख में मूर्ति तोड़ना तो संभव नहीं इसलिए बिना वास्तविक हिंसा किए परंपरा की ही हत्या कर दो। ‘यह भगवान है ही नहीं, होता तो मेरे वार से टूटता नहीं!’ – सहमे हुए असहाय भक्तों के सामने उच्चरित पाँच सौ साल पुरानी यावनी दर्पोक्ति आज फिर कहाँ से सुनाई दे रही है?

तृप्ति देसाई के चेहरे पर उत्कट भक्ति छलक रही थी या यावनी सूबेदार का दर्प, जब पुलिस का साथ लेकर उसने अपने मकसद पूरे किए? आज उनको पूछा जाये तो क्या उत्तर देंगी वे? उनकी आँखों के भावों को पढ़ना होगा क्योंकि शब्द तो कुछ और ही कहते होंगे। वैसे हाजी अली दर्गे पर पिटाई की ठोस धमकी मिली तो वहाँ पुलिस लेकर वह भीतर तक नहीं गयी और ना ही उन्होने वहाँ अपनी ज़िद दिखाई।

हिन्दू मंदिरों के साथ ही यह क्यों हो रहा है?

कानून अपने निकषों और नियमों पर चलता है जिसमें सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कोर्ट अपनी इच्छा से केस का शीघ्र संज्ञान भी ले सकता है, ज़रूरी नहीं कि तारीख पे तारीख दे कर सालों तक लटकाए रखे, और इसपर कोई कुछ कह भी नहीं सकता, यह उनका अधिकार होता है।

क्या इसी बात का फायदा लेकर इन मुद्दों को उठाकर, चलाकर, भड़काकर हिंदुओं को आहत किए जा रहा है कि सरकार भले ही हिंदुवादी पक्ष की हो, हम तो अपनी मर्जी में जो आए वो करेंगे? और बॉस के आगे हतबल व्यक्ति जैसे परिवार पर खीझ उतारता है उसी तरह कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए एक न होते हिन्दू सरकार के विरोध में गरियाने को एक हो जाएं।

स्ट्रेटजी यह समझ में आती है। हद दर्जे का कमीनापन है? तो क्या हुआ, हम काँग्रेस और वामियों की ही तो बात कर रहे हैं।

वे पंपिंग तो पूरी ताकत से कर रहे हैं, हम कितने हवा में उछलते हैं यह देखना होगा। जहाज बीच समुंदर में है, स्थिर रहे तो पार भी लगेगा। तूफान में आप न पानी में कूद सकते हैं और ना ही छोटी लाइफ बोट्स आप को बचा सकती हैं। स्थिर रहें तो समय हमारे पास है, काम की बातों पर फोकस करें, केवल भावनात्मक मुद्दों पर भावुक न हों। क्या आप को यह दिखा नहीं कि महज चार सालों में घोर मोदी-विरोधी पत्रकार कितने बूढ़े दिखने लगे हैं? उन्हें आप रोज देख सकते हैं, देख लीजिये।

और हाँ, यह बड़ाई न करें कि हम भी विधर्मियों के लिए ऐसे ही मुकदमे करेंगे। इस केस के लिए जो वकील लड़े वे धर्म योद्धा की हैसियत से लड़े, इसका अर्थ आप समझ ही गए होंगे।

ऐसे ही अगर विधर्मियों के खिलाफ केस लगाने के लिए अकूत धन लगेगा। कोई यह नहीं पूछ रहा कि सबरीमला केस लगाने वाले को कितना खर्चा आया और उसका हिसाब क्या है।

और अगर ऐसा केस लगे भी तो उसके परिणाम रास्ते पर दिखेंगे यह आप भी जानते हैं। और आप यह भी जानते हैं कि आप का क्रोध केवल ऑनलाइन फोकटिया पिटीशन करने तक ही ही है।

मोदिया उनकी जड़ खोद रहा है, अधीर हो कर मोदिया की जड़ मत खोदना। जिसका काम उसे ही करने दीजिये।

आप का क्या होगा जनाबे आली?

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