किसी के लिए झूठ बोलना असंभव है अगर उसे सच का पता ना हो

आज मैं आप लोगो से बुलशिट (Bullshit) – यानी कि गोबर – के बारे में संवाद करना चाहता हूँ।

यद्यपि गोबर को भारत में ‘उस’ रूप में नहीं देखा जाता है, क्योंकि गावों में सभी समुदाय और धर्म के लोग घरों में गोबर पोतते है, कंडे पर खाना पकाते व भूनते है।

यहाँ तक कि आप 11 तरीके के कंडे ऑनलाइन खरीद सकते है। लेकिन पाश्चात्य सभ्यता में बुलशिट को घिन की निगाह से देखा जाता है, एक तरह की शिट। शुद्ध देशी भाषा में बोले तो टट्टी या गू, वह भी कुत्ते की। आयी न घिन आपको।

लेकिन मैं आपसे कोई हंसी-ठिठोली की बात नहीं कर रहा हूँ और ना ही कोई भद्दी बात। यह मेरे स्वाभाव में है ही नहीं। मैं आपसे अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैरी फ्रैंकफर्ट (Harry Frankfurt) के अकादमिक पेपर ‘On Bullshit’ – यही है इस का शीर्षक – के बारे में विमर्श करूँगा।

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी विश्व की टॉप टेन विश्वविद्यालयों में गिनी जाती है। आप गूगल करके इस पेपर की प्रति निकाल सकते हैं।

फ्रैंकफर्ट लिखते है कि आधुनिक समय की मुख्य विशेषता यह है कि हमारी बात-चीत और रोज़मर्रा की ज़िंदगी बुलशिट से भरी हुई है। उनका पेपर लिखने का उद्देश्य था कि बुलशिट क्या है, उसे कैसे परिभाषित करे और पहचानें।

वह पूछते है कि क्या बुलशिटर स्वभाव से ही नासमझ और मूर्ख है? क्या उनका ‘उत्पाद’ गन्दा या अपरिष्कृत है? मलमूत्र बनाया या तैयार नहीं किया जाता है; यह महज निकाला या फेंक दिया जाता है।

फिर फ्रैंकफर्ट लिखते है कि बुलशिटर या मुंह से हगने वाले और झूठ बोलने वाले के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर होता है। दोनों – बुलशिटर और झूठा – यह जताना चाहते है कि वे सच बोल रहे हैं।

झूठ बोलने वाला सच्चाई छुपाने का प्रयास करता है, वह हमें वास्तविकता से दूर ले जा रहा है। हमें यह नहीं पता होता कि वह हमें किसी ऐसी चीज़ पर विश्वास करने को कह रहा है जिसे वह स्वयं असत्य मानता हो।

इसके विपरीत, बुलशिटर के लिए उसके वक्तव्य की सत्यता का कोई मायने नहीं है; उसका इरादा न तो सच बोलना और न ही सच छिपाना है।

किसी के लिए झूठ बोलना असंभव है अगर उसे सच का पता ना हो। बुलशिट करने के लिए ऐसी किसी सोच की आवश्यकता नहीं है। बुलशिटर ना तो सच, ना ही झूठ के साथ है।

उसकी निगाह तथ्य पर है ही नहीं। उसे परवाह नहीं है कि वह जो कहता है, वह वास्तविकता का वर्णन है। उसे तो बस कोई भी विषय उठा लेना है, या उसका काल्पनिक सृजन कर लेना है, जिस से उसका स्वार्थ पूरा हो सके।

फ्रैंकफर्ट निष्कर्ष में लिखते हैं कि बुलशिट उन लोगों के लिए अपरिहार्य है जिनको बिना यह जाने बोलना ही है कि वह किस बारे में बात कर रहा है। यह विसंगति सार्वजनिक जीवन में आम है जहाँ लोगों को बक-बक करनी है बिना विषय वस्तु को जाने।

अब आप सोच रहे हैं कि मैंने इतना लंबा लेख इस विषय पर क्यों लिखा।

अरे भाई, जब से प्रधानमंत्री ने राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद सीधे-सीधे फ्रेंच राष्ट्रपति से की है, तब से क्लाउन प्रिंस या ‘जोकर शहज़ादे’, तथा इनकी तरह के अन्य छुटभैये नेताओं और पत्रकारों के मुंह से क्या निकल रहा है? बुलशिट…!

हैं ना।

स्वाधीनता उपरांत लगभग लगातार शासन करके काँग्रेसियों ने दी थी यह प्रगति!

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