दादाजी का श्राद्ध

बात पिछले साल अक्टूबर अंत की होगी। बुधवार का दिन था, पत्नी से पूछा – वैष्णोदेवी चलें, शताब्दी में तत्काल में टिकट है जम्मू तक, आगे बस कर लेंगे कटरा के लिए।

उन्होंने हामी भरी तो हम गुरुवार रात को निकल पड़े और वीकेंड पर दर्शन कर सोमवार सुबह वापस घर भी आ गए। वो कहते हैं ना, माँ का हुक्म हो तभी आना हो पाता है। महीनों से जाना है, जाना है, और जब जाना है तो डेढ़ मिनट में प्रोग्राम बन गया।

खैर, सुबह में हम अच्छा हैवी नाश्ता लेकर ऊपर चढ़ें। लगभग 14 किलोमीटर की चढ़ाई होती है। या तो सीधे सीधे लंबा रास्ता लिए पैदल चलो, या फिर शॉर्टकट के तौर पे अलग अलग हिस्सों में अंदाजन 1,200 सीढ़ियां चढ़ो।

सीढ़ियों में दिक्कत ये है कि आपकी जाँघों और पिंडलियों में गाँठें पड़ने लगती है, अगर आप रोज इतनी मेहनत के आदी नहीं तो। अब हम दोनों पतले दुबले, 10 किलोमीटर के बाद थकने लगे थे। चढ़ना पैरों पे ही था, खच्चर करना कोई ऑप्शन नहीं।

तभी एक आदमी दिखा जो ऐन नीचे शुरुआत से दंडवत करता हुआ आ रहा था। हम चूंकि सीढ़ियों से चढ़े तो हमने पैदल चलने वाले रास्ते में पहले कहीं देखा नहीं था। उस भक्त की उम्र भी कुछ 45 पार होगी, और साथ में 2 साधु जैसे लोग थे।

कहीं पढ़ा था कि काफी सारे बड़े मंदिर बहुत ऊंचाई पर होते हैं क्योंकि मेहनत से, श्रम से जब भक्त ऊपर चढ़ने लगता है तो उसके मन के सारे विकार – लोभ, मोह, अहंकार, वासना छूटने लगती है और वो सच में ईश्वर के और समीप होने लगता है।

मैं उस व्यक्ति के बारे में सोचने लगा कि किस श्रद्धा से वो ऐसे दुर्गम रास्ते से यहाँ तक आया होगा। हम दोनों को उस से जो प्रेरणा मिली, थके चूर कदमों में भी साहस का संचार हो गया।

इससे पहले जब वैष्णोदेवी आये थे तो ठंड से हम दोनों थोड़े ठिठुरने लगे, तब कर्नाटक से आया एक प्रौढ़ युगल मिला जो बस चला जा रहा था। औरत के पैर में लगभग एक इंच अंदर कुछ कांटे जैसा चुभ गया था, खून रोकने के लिए बाँधा लेडीज़ रुमाल लहुलुहान हो चुका था। हमने उन्हें रोक कर क्रीम और कुछ टिश्यू पेपर बांधे, और फिर उनके साथ ही हो चले।

जब भी धर्म पर, श्रद्धा पर, विश्वास पर संदेह होने लगता है, तो मैं उसी दण्डवत चलने वाले भक्त का, सुदूर दक्षिण के कर्नाटक की उस औरत का जो उत्तर की ठंड में रक्तरंजित पैरों से भी सिर्फ देवी के बामुश्किल 1 सेकंड होने वाले दर्शन के लिए इतना प्रयत्न करती है, मन में उसका ध्यान लाता हूँ।

मैं ध्यान लाता हूँ हमारे राजस्थान के रामदेवरा में आने वाले भक्तों का जो पैदल, साईकल पर, यहां तक कि दण्डवत सैकड़ों किलोमीटर दूर के इलाकों से बड़ी मुश्किलों में आते हैं।

आज दादाजी, जिन्हें हम हमारे यहाँ मारवाड़ी में ‘भईसा’ कहते हैं, का श्राद्ध था। आज उनके लिए कौवे के लिए खीर पूड़ी रखते समय मैंने उन्हें मन ही मन याद किया, और याद किया परिवार के पूर्वजों को जिन्होंने 1,200 सालों के खूनी इतिहास में भी अपने धर्म को, अपने मत को नहीं खोया। जिन्होंने मुझे आज भी हिन्दू बनाये रखा।

वैसे मैं ठहरा बनिया, शायद मेरे पड़दादाओं ने कभी तलवारें ना उठाई हो, पर शायद किसी प्रताप के भामाशाह कभी न कभी जरूर बने होंगे।

और अपने दादा, पड़दादा, या अपने वंश के पूर्वजों का ही क्यों, इस बार और हर पितृ पक्ष में हम ध्यान करें छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप जैसे अपने उन पूर्वजों का, जिन्होंने घास की रोटियां खाना और इस किले से उस किले तक संघर्ष करना स्वीकार किया, पर धर्मपथ पर अडिग रहे।

हम आह्वान करें उन गुरु तेग बहादुर जैसे हमारे पूर्वज का जिन्होंने धर्म के लिए अपना शीश कटवाना स्वीकार किया, जिसकी गवाही आज भी गुरुद्वारा शीशगंज साहिब देता है। उन गुरु गोविंद सिंह का, जिनके 2 छोटे बच्चों को उनकी आँखों के सामने दीवारों में चुनवा दिया गया, पर उन्होंने असीम धैर्य रखते हुए धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा, और स्वयं ने भी अपने बाकी 2 पुत्रों के साथ देह न्यौछावर कर दी।

और तो और कई राजाओं को, बाकी राज्य की जनता के जान पर ना आये, इसलिए अपनी बहन बेटी तक सौंपनी पड़ी। और कई तो ऐसे महावीर हैं जिनके त्याग और बलिदान के बारे में हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था के कारण जानने का मौका भी ना मिला हो।

जहां दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका की पगन सभ्यताएं यूरोपीय देशों के खूनखराबे और बाइबिल-जमीन के लेनदेन में खत्म हो गयी या सिर्फ स्मृतिशेष बचे हैं, वहीं यहां काफ़ी जऱ, जोरू और जमीन खोने के बाद भी, कई गुना अधिक हिंसा, बर्बरता के बाद भी सहस्रों वर्षों पुरानी सभ्यता आज भी जीवित है।

इस बार इस श्राद्ध में अपने वंश गौरवों को तर्पण देते समय, छोटे बालकों को भोजन कराते समय हम उन सबको भी बारंबार प्रणाम ज्ञापित करें, जिनके अंतिम तृण तक के त्याग, अदम्य साहस और अडिग धर्मपरायणता के कारण हम आज भी सनातनी है।

हम मन में धैर्य लिए उस दण्डवत करते साधु, लहूलुहान पगों में साहस करती उस सबला जैसे अनेक उदाहरणों को भी ना भूलें जो हर क्षण हमारी आस्था को थामे रखते हैं।

अच्छा हो कि असली आयुर्वेदिक दंतमंजन के बारे में जल्दी समझ लें हिन्दू

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