अभिव्यक्ति डॉ अव्यक्त की : वो आलसी

वो मेरे सामने बैठा था। मेरा एक MD Student उसकी नातिन को देख रहा था। मेडिकल कॉलेज की यह ओपीडी थी।

जी हां वो बैठा था, लेकिन बाजू में रखी कुर्सी पर नहीं, ज़मीन पर उकड़ू।

उसका चेहरा, चमकीला, काला था। चेहरे पर नुकीली मूंछें और बात करते समय मुस्कुराहट थी। खासकर जब जब अपनी नातिन की बात करता।

चेहरे, आंखों के इर्द गिर्द की झुर्रियां जीवन के संघर्ष की गाथा बयान कर रही थीं।

सफ़ेद कुर्ता, पायजामा, 55 साल के ऊपर का शख़्स रहा होगा। लेकिन शरीर से बलिष्ठ, फिट दिखाई देता था।

मुझे लगा कि मेरा स्टूडेंट समझ नहीं पा रहा है कि बच्ची को क्या हुआ है।

मैंने पूछा, ‘आपकी कौन है?’

“नातिन है साब।”

‘क्या हुआ था?…’

“महिना भर से पेट पिरात है, तड़प तड़प जात है।”

उसके बाजू में, मेरे सामने रखी कुर्सी खाली थी लेकिन वो ज़मीन पर ही बैठा था।

‘क्या करते हो आप?’

“जूता पॉलिश करत हूँ साब”

‘कहाँ रहते हो?’

“पाटन में साब”

‘पहले आप कुर्सी पर बैठ जाओ’, मैंने कुर्सी दिखा कर कहा था।

“नहीं साब, यहीं ठीक है”

‘नहीं, पहले वहां बैठो।’

वो सकुचाते हुए बैठ गया था। मैंने अपने स्टूडेंट को बच्ची के संबंध में कुछ सलाह देकर फिर उससे पूछा था…

‘जूते, पॉलिश कहाँ करते हो?’

“जबलपुर राइट टाउन। साब।”

लेकिन रहते तो आप पाटन में हो न?

“हाँ साब, साईकल से आत जात हूँ।” चेहरे पर कोई दुःख या शिकन नहीं था उसके। मेरे चेहरे पर ज़रूर आया था।

उसे तो लगा होगा, मैं ये सब क्यों पूछ रहा हूँ… जिसका बच्ची के इलाज से कोई संबंध नहीं। लेकिन कारण था कि, मैं ये क्यों पूछ रहा था। वह अंत तक आपको पता चल जाएगा।

‘पाटन से साईकल से आना जाना, कितना किलोमीटर हो जाता होगा?’

“27 किलोमीटर आना, 27 जाना।”

इस उम्र में वह, 54 किलोमीटर रोज़ साईकल चला रहा था। जूते पॉलिश करने। मेरी आँखें फटी थीं।

‘तो पाटन में ही कुछ क्यों नहीं करते?’

“साब हम तो बचपन से ही जई कर रये। हमाए बाप भी जई करत थे।”

‘तो उन्होंने ही ये काम आपको सिखाया था।’

“हओ साब। और कौन सिखातो। बिनई ने सिखाओ थो।”

उसके ‘हओ’ में पिता की याद की, स्वाभाविक गौरव अनुभूति थी। कभी उसका पिता साईकल के डंडे पर बिठा कर उसे लाता होगा साथ, भविष्य निर्माण का एक गुर सिखाने। वह जो उसे आता था। लौटते में कभी गुड़ पट्टी, कभी फुग्गे ले दिया करता होगा।

“हमाए तीन भाई और हैं, बे भी जेई करत हैं। मोची परिबार है।”

मैंने फिर पूछा, ’54 किलोमीटर रोज़ साईकल की जगह वहीं गांव में कुछ क्यों नहीं किया?’

“अरे साब बिते, गोबर, कटाई, वटाई घाइं मजूरी मिल जात है। सौ, दो सौ में। हमें नई जमत।”

‘इससे कितना कमा लेते हो?

“200, 300 बन जात है साब।”

‘अच्छा बच्चे क्या कर रहे हैं?’

“सर, बेटियां ब्याह गईं। बच्चे मजूरी कर लेत हैं।”

बच्ची की ओर मुख़ातिब हो मैंने कहा था, ‘कौन सी क्लास में हो?’

तपाक से बोली, “चौथी”

इसकी मूंछों में ताव था। बोला, “बड़ी चंट है साब। सब हिसाब किताब कर लेत है।”

‘अच्छा बताओ, नाती पोतों को पढ़ाओगे कि नहीं?’

मुझे उससे बात करना अच्छा लग रहा था। अच्छा हुआ कि और मरीज़ नहीं थे।

“साब पढ़ाएंगे।”

‘आप तो Sc में आते होगे न?’

“हओ साब।”

मैंने कहा, ‘बच्चियों को फ्री शिक्षा, और आसानी से नौकरी मिल सकती है अच्छे से। आपने अपने बच्चों को क्यों नहीं पढ़ाया, क्यों नौकरी नहीं दिलाई।’

“साब पढ़ा है बच्चा 10वीं तक। नौकरी नई मिलती। सरकार कछु नहीं करती।”

मैंने कहा, ‘अरे नहीं। बच्चों ने अच्छे से अप्लाई ही नहीं किया होगा। कई जगह नौकरी निकलती हैं। सरकार आपको आरक्षण भी देगी। पता है न।’

“हाँ पता है साब।”

‘आपको पता है, आपकी ये बच्ची मेरी तरह डॉक्टर भी बन सकती है वो भी बिना पैसे खर्च किये।’

“नई साब, नाती पोतों को तो पढ़ाएंगे।”

फिर कुछ बातें, और बच्ची के विषय में समझ वह चला गया था। बच्ची और खुद की बाहर उतारी चप्पलें पहन कर।

अपने PG स्टूडेंट से मुख़ातिब हो मैंने कहा था, ‘बताओ वो बाजू में कुर्सी होते हुए भी क्यों नीचे बैठा हुआ था?’

स्टूडेंट को लगा मैं डांटने वाला हूँ। मैंने कहा ‘नहीं, मैं सिर्फ पूछ रहा हूँ। सोचो इस बात को…’

स्टूडेंट को शायद उत्तर सूझा भी हो तो भी वो चुप रहा, न जाने मैं क्या सुनना चाह रहा हूँ।

‘अच्छा बताओ इतनी सरकारी योजना के बावजूद वो अपने बच्चों को पढ़ाना, नौकरी दिलाना क्यों नहीं कर पाया?’

“सर.. आलस… बुद्धि…”

’54 किलोमीटर रोज़ साईकल चला कर घर चलाने वाला आलसी होगा?’

‘देखो… हम किसी की टांग काट दें, फिर बहुत अच्छे ट्रैक बना दें, और कहें दौड़ो। तुम दौड़ नहीं रहे।… चलो पहले पहला प्रश्न…’

‘क्यों कोई शर्ट पेंट वाला शहरी नीचे नहीं बैठता? क्यों कोई ग़रीब आ कर ही नीचे बैठ कर बातें करता है?’

‘वो इसलिए क्योंकि बरसों बरस तक उन्हें यह अहसास दिलाया गया है कि तुम नीचे बैठने लायक हो। तुम्हारे लिबास, रहन सहन ऐसे हैं कि तुम नीचे बैठो।’

‘उन्हें लगता है कि, वो दुत्कार दिया जाएगा। दुत्कार से आत्मसम्मान को लगी ठेस से बेहतर है पहले ही नीचे बैठ जाना। कुर्सी बड़े लोगों के लिए है और वो छोटा है।’

तो मैं इसलिए उससे इतनी देर बात कर रहा था जिससे अपने एक स्टूडेंट को बता सकूं… जिन मरीज़ों को हम मशीन बनकर देखते हैं, उनसे थोड़ी सी बात करने पर कितनी कहानियां मिलती हैं।

क्या किसी जूते में पॉलिश करवाते कभी किसी को पता चला होगा वो कितनी दूर से रोज़ आता है, फिर कितनी दूर उसे जाना होता है? इस मरीज़ को सरकारी अस्पताल की एक व्यर्थ जांच लिख देने का अर्थ है उसका दिनभर लाइनों में खप जाना। दिनभर खपने का अर्थ है उसकी एक दिन की कमाई का न मिलना।

‘देखो बेटा, तुम्हारे सामने कोई नीचे बैठा हो तो ये बात तुम्हें कचोटना चाहिए। डॉक्टर को सिर्फ caregiver होने का भाव भीतर रखना है। न किसी से बड़ा, न छोटा। जो भी सामने हो उसे समानता के स्तर पर पहले खुद महसूस करो, वो न महसूस कर रहा हो तो उसे उस स्तर पर लाओ। और फिर इलाज करो। और यही सिद्धांत किसी जज, नेता, कलेक्टर के प्रति भी रखो। चिकित्सक न इनसे नीचे है, न ही किसी से बड़ा।’

अधिकांश चिकित्सक, साहित्य, संवेदना, दर्शन को हास्यास्पद मानते हैं। किंतु किसी विज्ञान को सर्वाधिक आवश्यकता संवेदना, साहित्य, दर्शन की है तो वह चिकित्सा है। क्योंकि चिकित्सा मात्र शारीरिक व्याधियों को ठीक करने का नाम नहीं… मन और आत्मा को भी आरोग्य देना है।

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