वो भोली है, व्यभिचार किया पर परिणाम नहीं समझ सकी : सुप्रीम कोर्ट ने ध्वस्त किया ब्रिटिश क़ानून

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। जिन्हें कानून का क, ख, ग भी नहीं पता है वो लोग भी इस पर जोक्स बना रहे हैं।

मैं जब दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ कर रहा था और सामान्य सा विद्यार्थी था, तभी से कानून की कुछ बातें अजीब और अटपटी लगती थीं, उन्हीं में से एक धारा 497 का जारकर्म (एडल्ट्री) का प्रावधान था। पहले इस धारा को समझने की कोशिश करते हैं।

“भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497 के अनुसार यदि कोई पुरूष यह जानते हुये भी कि महिला किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है और उस व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत के बगैर ही महिला के साथ यौनाचार करता है तो वह परस्त्रीगमन के अपराध का दोषी होगा। यह बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा। इस अपराध के लिये पुरूष को पांच साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों की सज़ा का प्रावधान था।”

इसका अर्थ है कि यदि कोई पुरूष किसी विवाहित महिला से उसकी सहमति से यौन संबंध बनाता है तो इसमें अपराधी सिर्फ पुरूष माना जायेगा। इसके पीछे तर्क यह है कि महिलाओं को पब्लिक रिलेशन का कम अनुभव होता है। वो भोली होती हैं और जो जारकर्म (व्यभिचार) उसने किया है उसके परिणाम को नहीं समझ सकी। दूसरे पुरूष ने उसे बरगलाया, फुसलाया और अपने जाल में फँसा लिया। इसलिए हर हाल में पुरूष ही दोषी है।

हो सकता है 158 वर्ष पहले जब भारतीय दण्ड संहिता, 1860 का निर्माण हुआ था तब अधिकांश महिलाओं को शिक्षा और रोज़गार का अवसर आज जैसा उपलब्ध नहीं था। शायद वो सचमुच व्यभिचार के परिणाम को समझ पाने में अक्षम हों, इसलिए पर-पुरूष को दोषी मानकर उसे सज़ा दी जाती थी।

लेकिन आज जब समय इतना बदल गया है, महिलाएं अपने जीवन के सारे फैसले खुद लेने में सक्षम हैं। ऐसे में भी अगर वो किसी से अपनी मर्जी से यौन संबंध बना रही हों और कानून उसे निर्दोष माने और पुरूष को शातिर अपराधी, तो ये गलत है। या तो दोनों के लिए सज़ा का प्रावधान होना चाहिए या दोनों को ही सज़ा नहीं मिलनी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी कानून की उस गलती में सुधार करते हुए उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि अब सिर्फ पुरूष को अपराधी बनाकर पाँच साल के लिए कैद नहीं किया जा सकता है। ये एक अच्छा डेवलपमेंट है, गलत पहले हो रहा था।

न्यायालय ने व्यभिचार को कोई पुण्य कर्म घोषित नहीं किया है, ये आज भी व्यभिचार ही है। आज भी व्यभिचार विवाह-विच्छेद करने के लिए एक सशक्त आधार है। अगर आपका पार्टनर व्यभिचार में लिप्त है तो आप उससे इस ग्राउंड पर आसानी से विवाह-विच्छेद कर सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय अगर आप से ये अधिकार छीनता तो अनर्थ करता और व्यभिचार को प्रोत्साहित करता, पर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया है।

एक बात समझने वाली है। हर देश के अधीनस्थ न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय का अनुगमन करते हैं और सर्वोच्च न्यायालय हेग स्थित अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के फॉर्मेट को यथासंभव अपनाने की कोशिश करता है। इसीलिए किसी भी देश का सर्वोच्च न्यायालय भले ही करप्शन करे, पर मनमानी उच्छृंखलता नहीं कर सकता।

जब अमेरिका जैसे देशों में पत्नी को बुढ़ापे में पता चलता है कि उसके पति ने बीस साल पहले एक बार उसकी नौकरानी से यौन संबंध बनाया था, पत्नी इस व्यभिचार को धोखा मानती है और इस आधार पर डाइवोर्स का केस फाइल करती है और न्यायालय उसकी माँग का अनुमोदन करते हुए उसके पक्ष में फैसला सुनाता है, तब भारत के सर्वोच्च न्यायालय की क्या मजाल है कि ऐसा कानून बनाये जो आपको आपके बेवफा पति या पत्नी के साथ ज़बर्दस्ती रखने के लिए बाध्य करे।

पूजा का भी कहीं कोई शास्त्र है? प्रार्थना की भी कोई विधि है?

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