घाटी की राजनीति में हिन्दुओं की वापसी पर चिंता में ‘चिंतक’!

कश्मीर से सुखद समाचार है… घाटी के अनंतनाग में हिन्दू ने निगम का चुनाव निर्विरोध जीता है। घाटी में हिन्दू वापसी कर रहे हैं और अपना स्थान पा रहे हैं। इसे घाटी की राजनीति में हिन्दुओं की वापसी की शुरुआत माना जा रहा है।

दरअसल समय लगता है किसी भी बिगड़ी हुए चीज़ को बनाने में… बिगाड़ना आसान होता है लेकिन बनाना मुश्किल,.. बनाने के लिए अनेक रास्ते खोजने पड़ते हैं… सुन्दर रास्ते की शुरुआत अनंतनाग से हुई है और ये घाटी में बदलते और आते हुए सुखद वातावरण की आहट है।

जम्मू कश्मीर में कश्मीर घाटी में पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय चुनाव के मतदान से पहले ही बीजेपी ने ज़बरदस्त जीत हासिल की है।

देवसर, अचबल और कुलगाम शहर में बीजेपी के 5 उम्मीदवारों ने निर्विरोध जीत हासिल की है। घाटी में मुस्लिम बहुल क्षेत्र में आतंकवादियों और अलगाववादियों की धमकियों के बावजूद बीजेपी उम्मीदवारों की इस जीत को घाटी की राजनीति में हिन्दुओं की धमक के साथ वापसी के तौर पर देखा जा रहा है।

निर्विरोध जीतने वाले उम्मीदवार-

1 सतीश कुमार ज़ुत्शी – देवसर
2 उर्मिला वाली – अचबल
3 ऋषभ वाली – अचबल
4 ज्योति गोसानी – कुलगाम
5 बबलू गोसानी – कुलगाम

सब काम होंगे धीरे धीरे… You have to maintain trust and faith in your leader

कश्मीर के पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में कई हिन्दू महिलाएँ भी घाटी में जाकर चुनाव में भागीदारी कर रही हैं। वो हिम्मत के साथ डट गई हैं।

प्राप्त चुनाव परिणाम का जो भी कारण हो लेकिन मुझे ख़ुशी है कि हिन्दू लौट रहा है… वो लौट रहा है अपना खोया आधार वापस लेने… वो तैयार हो रहा है मुकाबले को…

लेकिन बहुत सारे फेसबुक के कश्मीरी चिंतक अब इस डर में जी रहे हैं कि ‘उन हिन्दुओं की जान को खतरा है… ये गलत किया सरकार ने, गलत किया भाजपा ने हिन्दुओं को घाटी में भेजकर… अब ये मर जाएँगे!’

अरे भाई उन्होंने मारकर छीना है तो शान्ति से तो वापस मिलेगा नहीं… अपना पाने को लड़ना पड़ेगा और लड़ाई दिल्ली से नहीं घाटी से होगी… कुछ बलिदान भी देना पड़ेगा…

ये कोई 2 फुट कब्जाए खेत की खतौनी के लिए जिला कचहरी का सिविल का मुकदमा नहीं है कि जज साहब तीन पुश्त बाद फैसला देंगे और इस फैसले के बाद आसानी से कब्जेदार छोड़कर चला जाएगा…

ये तथाकथित चिंतक ही पहले कहा करते थे कि सरकार कश्मीरी हिन्दू को उनका हक़ दिलाए…

कश्मीरी विस्थापित लोगों के लिए पिछले 4 वर्षों में 7000 के ऊपर कश्मीर में नौकरी दी गई और वो घाटी में लौटे। 14 जून 2016 को 75 साल बाद कश्मीर के गंदरबल जिले में सिंधु और वितस्ता नदी के संगम पर ‘दशर महाकुम्भ’ आयोजित हुआ। 20 हज़ार से अधिक कश्मीरी हिन्दू शामिल हुए थे। अब हर वर्ष खीर भवानी देवी के पूजन में 40 – 50 हज़ार हिन्दू सम्मिलित हो रहा है। घण्टा-घड़ियाल-करताल-मंजीरा बज रहे हैं, प्रसाद बॅंट रहा है और टीका लगाया जा रहा है।

और आज जब वो लौट के अपने लिए लड़ने को तैयार हो गए और लड़ने लगे हैं तो भी ये चिंतक कह रहे हैं कि ‘गलत हो रहा है… आओ आओ डर के दिल्ली में हमारे आँचल में छिप के बैठ जाओ और यहीं से नारे लगाओ…’

ये लोग उनका समर्थन करने और हिम्मत बढ़ाने की जगह कह रहे हैं कि ‘मत जाओ, खतरा है, मर जाओगे…’

एकमात्र भाजपा है जो घाटी में हिन्दू को चुनाव में उतारती है… बाकी सब क्या करते हैं वो पता ही है… और जो आगे बढ़ के चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं तो हमारे चिंतक महोदय उनको जान का खतरा बता रहे हैं… अरे भागीदारी कैसे मिलेगी आपके दिल्ली के बाथरूम में छिपकर नारे लगाने से?

प्रबुद्ध महोदयों, आप चाहते क्या हैं? आपके पास कोई समाधान है या फिर टन भर आँसू भर रखा है द्वारे द्वारे घूम घूम रोने को…

कश्मीर घाटी को ‘जाफना’ बनाने की हिम्मत तो लाइये

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