गैरज़रूरी चश्मों को आयुष्मान भवः की ज़रूरत

बीमारी… जाति, धर्म और आर्थिक बिसात देख कर नहीं आती। बीमारी जाति, धर्म देख कर भागती भी नहीं, लेकिन आर्थिक बिसात से दूर ज़रूर होती है।

आयुष्मान भारत योजना इसी सच्चाई के साथ लागू है, जिसमें जाति-धर्म-मज़हब का नहीं 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण का फिल्टर लगा हुआ है।

जानकारी के अभाव और दुर्भावनावश… अखिल भारतीय स्वास्थ्य योजना ‘आयुष्मान भारत’ में भी मज़हबी और जातिगत आरक्षण होने जैसे झूठ पर बात की जा रही है। इसलिए 2014 के बाद सामाजिक योजनाओं में लाभार्थी चयन के बदले चश्मे को ठीक-ठीक देखना ही ज्ञान की धुंधली तस्वीर को साफ कर सकती है।

आइये देखें :

2014 में अस्तित्व में आने के बाद साल 2015 में समाज कल्याण कार्यक्रमों को लागू करने के लिए वर्तमान केंद्र सरकार ने ज्यादा वैज्ञानिक तरीका अपनाने का इरादा किया।

सरकार का मानना था कि इस कदम से इन योजनाओं के लाभार्थियों में से उन लोगों को अलग करने में आसानी होगी, जिन्हें इनकी ज़रूरत नहीं है और फिर गरीबी से जंग बेहतर ढंग से लड़ी जा सकेगी। इसलिए गरीबों के लिए बनाई गई योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान के लिए गरीबी रेखा पर आधारित तरीके के बजाय सरकार सोशियो इकनॉमिक एंड कास्ट सेंसस (SECC) को अपनाएगी।

SECC 2011 में परिवारों की रैंकिंग उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर की गई है ताकि राज्य सरकारों को गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की सूची बनाने में आसानी हो। इससे विभिन्न जातियों और वर्गों के लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और उनके शैक्षिक स्तर के बारे में भी जानकारी मिलती है। ग्रामीण विकास मंत्रालय अपने नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम के लिए भी SECC 2011 के आंकड़ों का उपयोग करना शुरू किया।

इसके तहत SECC 2011 का उपयोग ग्रामीण इलाकों में गरीबों को पेंशन देने में किया गया। इसके अलावा राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में भी इस डेटा का उपयोग हुआ। दोनों ही योजनाओं में इसके पहले तक बीपीएल डेटा के जरिए गरीबों की संख्या का आंकलन किया जाता था।

जबकि यह स्थापित सत्य है कि ‘बीपीएल डेटा से हमें पता चलता है कि कितने लोग गरीब हैं। जबकि SECC बताता है कि कौन लोग गरीब हैं। यह सरकारी योजनाओं का लाभ देने में उचित व्यक्ति की पहचान करने का ज्यादा वैज्ञानिक तरीका है।’

गरीबों की पहचान करने में SECC 2011 डेटा की वैधता और कुशलता पर अध्ययन करने के लिए सुमित बोस कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट देते हुए ग्रामीण विकास योजनाओं में इस जानकारी का इस्तेमाल करने की सिफारिश की। कमेटी ने कुछ खास योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान के लिए एक फॉर्मूला भी बनाया, जिससे यह पता लगाया जा सका कि लोग किन सुविधाओं से वंचित हैं।

“जो जितना ज्यादा वंचित होगा, उस परिवार को सरकारी मदद देने के मामले में उतनी ही ज्यादा वरीयता दी जाएगी।”

सरकार नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत ऐसे ही कामगारों की पहचान करने का काम किया और कर रही है, जिन्होंने SECC पर अध्ययन के दौरान कई सुविधाओं से वंचित होने की जानकारी दी थी।

SECC में उम्र के आधार पर भी वर्गीकरण किया गया है। जिसका इस्तेमाल ग्रामीण इलाकों में पेंशन प्रोग्राम के लिए किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश जारी किया कि वे ग्रामीण योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान के लिए गरीबी रेखा पर आधारित पैमाने के बजाय SECC डेटा का उपयोग करें।

मार्च 2016 में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इंदिरा आवास योजना जिसका नाम अब प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण है, में भी लाभार्थियों के चयन का पैमाना ‘बीपीएल’ से बदलकर SECC 2011 डेटा कर दिया।

लाभार्थी चुनने के मानक अलग :

SECC डेटा में 14 मानकों के आधार पर ऑटोमैटिक तरीके से लाभार्थियों को बाहर करने का तरीका दिया गया है। वहीं पांच मानकों के आधार पर लाभार्थियों को ऑटोमैटिक तरीके से शामिल भी किया गया है। सात मानकों के आधार पर यह देखा गया है कि लोग किस स्तर तक सुविधाओं से वंचित हैं। जिन मामलों में बीपीएल सर्टिफिकेट और SECC डेटा के आधार पर लाभार्थियों की पहचान में मिसमैच होगा, उनमें सरकार सेंसस से मिली जानकारी के आधार पर विसंगति को दूर कर सकती है।

जुलाई 2015 में जारी SECC डेटा के अनुसार, 62% ग्रामीण परिवारों को वंचित माना गया। 17.9 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 13% तब भी एक कमरे के कच्चे मकानों में रह रहे थे। 4 करोड़ से ज्यादा परिवार ऐसे थे, जिनमें 25 साल से ज्यादा उम्र का कोई भी व्यक्ति शिक्षित नहीं है।

इसलिए साल 2010-11 की जनगणना के समय के गुलाबी और पीले रंग की दो अलग-अलग शीटों को याद करिये। गुलाबी ने देश के लोगों की संख्या गिनी, तो पीले ने परिवारों की सामाजिक और आर्थिक हैसियत का सच दर्ज किया।

वर्तमान केंद्र सरकार की हर योजनाओं में “जो असली जरूरतमंद, जरूरतें उसी की पूरी हों” का सच देखने को मिलेगा।

भ्रम, झूठ, पाखंड फैलाने में अपनी जाति न दिखाइए, आयुष्मान भारत जैसी ऐतिहासिक और क्रांतिकारी अखिल भारतीय स्वास्थ्य सेवा योजना से अधिक से अधिक सुपात्र कैसे जुड़ें इस पर ऊर्जा खर्च करिये।

घिसी हुई चप्पल चुराने की सोच से ऊपर उठिये

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY