हल्दीघाटी के द्वारपाल

“हल्दीघाटी” का नाम आते ही, जेहन में क्या कौंधता है?

महाराणा, चेतक, युद्ध,
मानसिंह व शक्तिसिंह का कुलघात
और आखिरी में कहीं अकबर ख्यालों में आते हैं।

“हल्दीघाटी” तथ्यों से ज्यादह जनश्रुतियों में बसती है, घटनाक्रम से अधिक लोकभावनाओं में।

अव्वल तो तथ्य ये है कि “हल्दीघाटी” कोई युद्ध का मैदान नहीं, बल्कि अरावली पर्वत श्रङ्खला में बीच से होकर जाने वाला एक मार्ग है, जिला राजसमंद और जिला पाली को जोड़ने वाला एक मार्ग।

ये मार्ग हिमालय के पहाड़ों में होता तो इसे “दर्रा” कहते!

इसी मार्ग पर होकर मेवाड़ विजय हेतु कूच कर रही अकबर की सेना को, महाराणा ने गोगूंदा और खमणोर पर रोक लिया। यहीं इस प्रसिद्ध युद्ध की पटकथा लिक्खी गयी।

और इस युद्ध में मेवाड़ के द्वारपाल बने महाराणा के हाथी। ये लेख “हल्दीघाटी” के युद्ध में हाथियों की भूमिका पर लिक्खा जा रहा है।

अवश्य ही हाथियों का सृजन युद्ध के लिए हुआ है।

सनातन साहित्य में हाथी को क्रोध का निकष कहा गया है। प्रजापति दक्ष की पुत्री क्रोधा के कई पुत्रियां थीं। उनमें से “मातंगी” से हाथी और “श्वेता” से सफ़ेद हाथी इस सृष्टि में उत्पन्न हुए हैं।

अठारह जून पंद्रह सौ छिहत्तर की भरी दोपहरी में हुए इस युद्ध का परिणाम अघोषित रहा। इसका कारण बने गजसेना की कमज़ोर कड़ी, महावत।

कैसे?

हम इसपर विस्तार से इसपर विमर्श करेंगे।

उनदिनों मेवाड़ के पास सुशिक्षित हाथियों की टोली थी। मेवाड़ के सिसौदियों का गजप्रेम ही था कि उन्होंने गजसेना के गजों का नामकरण किया।

जैसे कि मेवाड़ की गजसेना के यूथपति का नाम था “रामप्रसाद”। ये हाथी व्यक्तिगत तौर पर राणा को प्रिय था।

निस्संदेह, राणा का प्रिय वाहन “चेतक” ही था। किन्तु राणा की गजसेना भी मेवाड़ की शक्ति का प्रबल आधार थी।

उनदिनों गजसेना के अध्यक्ष का भी बड़ा रसूख था। मुग़ल सल्तनत में उसे “हाथियों का दरोगा” कहा जाता था। उसके रसूख का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उसका हाथी सेनापति मानसिंह के हाथी से ठीक पीछे होता था।

उसका नाम था हुसैन खाँ!

युद्ध के मैदान और कागजों का मुआयना करें तो दर्जनों मेवाड़ी इतिहासकारों की तथ्यपूर्ण पुस्तकों के साथ मिलता है “अबुलफज़ल” का “अकबरनामा”, जो “अल बदायूँनी” की मिथ्या पंक्तियों पर लिखा गया।

खैर, इस इतिहास के झोल पर कभी और चर्चा करेंगे। फिलवक्त विषय कुछ और है।

अबुलफजल लिखते हैं : “इस लड़ाई में दोनों तरफ के बहादुरों के लिए ज़िन्दगी साधारण, परंतु उसके यश की कीमत ज्यादह थी। जैसे बहादुरों ने युद्ध किया, वैसे ही हाथियों ने भी।”

कागजों पर बहुत बात हुयी। अब ढेर सारी मिलावट में से कड़ियाँ चुनकर, युद्ध के दृश्यों तक पहुंचेंगे!

ज्यों ही मेवाड़ और मुग़ल सेना का भिड़ंत हुआ, सबसे पहले “लूगा” नामक हाथी को लाया गया, जिसे व्यूह तोड़ने का सुशिक्षण दिया गया था।

उससे लड़ने आया जमाल खाँ फौजदार का हाथी “गजमुक्त”। इसमें “लूगा” ने “गजमुक्त” को लगभग जीवनमुक्त कर ही दिया था।

किन्तु महावत के मारे जाने पर “लूगा” ने वापस अपनी सेना की ओर वापसी का रुख कर लिया!

उसके बाद श्री “रामप्रसाद” आये। और समग्र युद्धभूमि में भयानकता का संचार कर दिया।

मुग़ल सेना की ओर से “रामप्रसाद” का प्रतिकार करने कमाल खाँ ने “राजराज” नामक हाथी को भेजा। जिसने डट कर लोहा लिया किन्तु, मारे गए गुलफाम!

ढेरों हाथी “रामप्रसाद” का मुकाबला करने आये और सब मारे गए। और अंत में “पंजरणमदार”!

ये हाथी भी बुरी तरह घायल होकर भागना चाहता था किंतु सहसा मेवाड़ गजसेना की कमज़ोर कड़ी फिर से टूट गयी।

“रामप्रसाद” के महावत को गोली लगी और हौदे से नीचे भूमि पर!

हौदा खाली होते ही, “पंजरणमदार” के महावत ने अपने घायल हाथी को लावारिस छोड़ दिया और रामप्रसाद पर आ बैठा।

ये घटना मानव के स्वार्थी स्वाभाव को व्यक्त करती है। हाथी मनुष्य को मरते दम तक नहीं छोड़ता किन्तु मनुष्य, मनुष्य के तो कहने ही क्या!

ये स्वार्थी महावत, शायद “अल बदायूँनी” ही था। “शायद” इसलिए, कि युद्ध वर्णन में महावत के नाम का उल्लेख नहीं है, किन्तु युद्ध ख़त्म होने के बाद “अल बदायूँनी” ही “रामप्रसाद” पर सवारी कर दिल्ली आया।

अकबर ने “अल बदायूँनी” को इस विजित हाथी “रामप्रसाद” को भेंट कर दिया और नया नाम दिया : “पीरप्रसाद”।

जिस समय “अल बदायूँनी” ने “रामप्रसाद” के महावत का हौदा कब्जाया, राणा ने दूर से देख लिया। और वे अपने हाथी को सुरक्षित करने मुग़ल सेना में धंसने लगे।

“चेतक” ने मानसिंह के हाथी के मस्तक पर टापें धरीं और राणा ने भाला चला दिया। किन्तु फिर भी मानसिंह बच गया। कैसे?

घोड़े पर सवार होता तो उसकी मृत्यु निश्चित थी। उसके हाथी ने बचा लिया उसे, हाथी के हौदे के पीछे छिप गया कायर!

जब चेतक ने मानसिंह के हाथी के मस्तक पर टापें धरीं, और राणा ने मानसिंह को लक्षित कर भाला चलाया। ठीक उसी समय दो कार्य एक एक साथ हुए, जिन कार्यों ने तत्कालीन मेवाड़ का भविष्य और वर्तमान भारत का इतिहास, दोनों बदल दिए।

पहला ये कि मानसिंह हाथी के हौदे की ओट में छिप गया!

और दूजा ये कि हाथी ने अपने सूँड़ में फंसी तलवार से चेतक के मर्मस्थलों को जख्मी कर दिया!

और उस रोज़ “चेतक” मारे गये। ये केवल एक गज के हाथों अश्व की मृत्यु न थी बल्कि मुगलिया सल्तनत को मिला जीवनदान था।

काश, वो हाथी न होता!
वो हौदा न होता, जिसके पीछे कुलंगार मानसिंह छिप गया तो आज इस देश का इतिहास ही भिन्न होता।

एलेफेन्ट्स आर नॉट फ्रेंड्स ऑलवेज!

इति नमस्कारान्ते।

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