राफेल पर राहुल का रोगात्मक रवैय्या

अमरीकी लेखिका वेरोनिका रोथ ने कहा था कि मिथ्या-वाचन यानि झूठ बोलने के लिए प्रतिबद्धता चाहिए l कोंग्रेस-अध्यक्ष राहुल गांधी में इस प्रतिबद्धता की तीव्रता इस सीमा तक होगी कि वे संसद में भी तथ्यात्मक रूप से असत्य या झूठे बयान देने से नहीं झिझकेंगे – यह अकल्पनीय था l

राहुल ने लेकिन अकल्पनीय को यथार्थ में बदल डाला l राफेल लड़ाकू विमान की खरीद के मामले पर राहुल के इस बयान – कि एन.डी.ए. सरकार ने ये विमान वर्षों पूर्व यूपीए सरकार द्वारा तय किये गए मूल्यों से अधिक मूल्य पर खरीदा है – की अ-सत्यता अब सामने आने से कोंग्रेस शर्मसार हो रही है या नहीं , ये तो पता नहीं लेकिन लोकतंत्र, संसद, और संसदीय गरिमा शर्मसार अवश्य हो रही है l

कुछ दस्तावेजों के मीडिया में सार्वजनिक होने के बाद इस बात की पुष्टि होती है कि एन.डी.ए सरकार ने यूपीए के द्वारा तय किये गए मूल्यों की तुलना में प्रति विमान (एन्हांसमेंट के साथ) 59 करोड़ रुपये कम में ही यह विमान खरीदा है और एन्हांसमेंट के साथ प्रति विमान एन.डी.ए ने 255 करोड़ रुपये कम में खरीदा है l

अगर सौदे के कुल मूल्य की बात करें तो यूपीए इस के लिए 1,72,185 करोड़ रुपये देने को तैयार थी जबकि वर्तमान एन.डी.ए सरकार ने इसे मात्र 59,262 करोड़ रुपये में खरीदा है – यानि 1,12,963 करोड़ रुपये कम में l

राहुल इसके पहले भी एकाध मुद्दे पर संसद में इस तरह तथ्यात्मक रूप से मिथ्या-वाचन कर चुके हैं l सत्ता पाने की होड़ में संसद को इस तरह गुमराह करना देश के लिए चिंतनीय तो है ही पर कोंग्रेस के लिए लाख टके का प्रश्न यह है कि क्या कोंग्रेस का नेतृत्व एक ऐसे नादान बच्चे के हाथ में चला गया है जो संसद में कभी फूहड़ हरकतें कर बैठता है तो कभी आँखों से भद्दे इशारे करता हुआ पाया जाता है और कभी तथ्यात्मक रूप से ऐसे त्रुटिपूर्ण बयान दे देता है जिसे रोगात्मक-मिथ्या की संज्ञा दी जा सकती है, ‘pathological lie’ ?

राहुल गांधी के नाम खुला खत

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