तुरंत पकड़ में आ जाएगा आयुष्मान भारत योजना में होने वाला भ्रष्टाचार

कई बार मेरे लेखों की प्रतिक्रिया में मित्र लिखते हैं कि मनरेगा में घपला कैसे होता है, दुगुने का इस्टीमेट रखा जाता है। फिर अगर दस मज़दूर पांच दिन काम में रहते हैं तो उनकी दस दिन की मज़दूरी का बिल बनता है और उनके खाते में भुगतान होने पर अतिरिक्त भुगतान उनसे वापस कैश ले लिया जाता है।

मस्टर रोल में उनका नाम भर कर उनके खाते में हुए भुगतान में से कुछ धनराशि उन्हें दी जाती है।

या फिर, आयुष्मान भारत पर लोग कयास लगा रहे हैं कि भ्रष्टाचार की संभावना व तरीके क्या होंगे।

आप यह मानकर चलिए कि मोदी सरकार को डाटा माइनिंग के द्वारा सारे भ्रष्टाचार की खबर है। अगर सरकार एक्शन नहीं ले रही है, तो इसका कारण यह है कि चुनाव सर पर हैं और वह ‘बड़े’ लोगों को लपेटना चाहती है और वहीं अपनी ऊर्जा लगाना चाहती है।

हालाँकि मैं एक वर्ष पूर्व डाटा माइनिंग के बारे में लिख चुका हूँ, लेकिन एक बार उसे फिर से कॉपी कर रहा हूँ।

Data-mining को एक तरह से हम आंकड़ों को खोद कर निकालना कह सकते है। सन 2012 में न्यू यॉर्क टाइम्स की संडे मैगज़ीन में एक विस्तृत फीचर छपा था, जिसमें एक अमेरिकी परिवार के घर में पोस्ट से एकाएक नवजात शिशु और गर्भवती महिला के उत्पादों के बारे में विज्ञापन और डिस्काउंट कूपन आने लगे।

सारे विज्ञापन अमेरिका के टारगेट सुपरमार्केट से आ रहे थे। उस घर के मुखिया उलझन में पड़ गए क्योकि उनकी पत्नी अब माँ नहीं बन सकती थी (अमेरिका में कई लोग विवाह 40 वर्ष के बाद करते हैं) और बच्चे अभी किशोर थे।

भिनभिनाते हुए वे नजदीकी टारगेट सुपरमार्केट गए और मैनेजर से मिलने की मांग की। अंततः मैनेजर से उनकी मुलाकात हुई जिसमें उन्होंने अपनी नाराज़गी बयान की। मैनेजर ने उनके घर का पता कंप्यूटर में फीड किया और जो जानकारी आयी, उससे वह दुविधा में पड़ गया।

उन सज्जन के कुरेदने पर मैनेजर ने कहा कि यद्यपि वह ग्राहक की निजी और व्यावसायिक जानकारी किसी के साथ भी शेयर नहीं कर सकता, लेकिन चूँकि उन सज्जन के बच्चे नाबालिग है, वह उनको जानकारी दे देगा।

मैनेजर ने बताया कि उन सज्जन की पुत्री, जो अभी 16 वर्ष की नहीं हुई थी, उस सुपरमार्केट में कई बार नवजात शिशु के लिए कपड़े, शैम्पू, डायपर इत्यादि और गर्भवती महिला के कपड़े, दवाएं, पुस्तकें, डीवीडी इत्यादि खरीद चुकी थी।

चूंकि यह शॉपिंग एक ही क्रेडिट कार्ड से की गयी थी, कंप्यूटर ने अनुमान लगाया कि उस घर में एक शिशु आने वाला है और उसने मार्केटिंग विभाग को यह जानकारी भेज दी। इसीलिए उन सज्जन के घर में इन उत्पादों के विज्ञापन और सम्बंधित डिस्काउंट के कूपन आ रहे थे।

उन सज्जन को विश्वास नहीं हुआ और वे मैनेजर को भला-बुरा कहके घर आ गए और पत्नी को बताया। पत्नी उनको लेकर तुरंत लड़की – जो स्कूल में थी – के बैडरूम में गए जहाँ उसकी अलमारी को ऐसे सामानों से भरा हुआ पाया।

पुत्री ने घर आने के बाद पूछताछ के दौरान बताया कि उसे एक लड़के से प्यार है और वह उसके बच्चे की माँ बनने वाली है। वह अपने माता-पिता को तब बतलाती जब उसका पेट निकल आता जिससे वे उसका गर्भपात ना करा पाएं। माता-पिता इस जानकारी से सन्न रह गए। बाद में वह सज्जन टारगेट गए और मैनेजर से माफी मांगी।

Wu Youyou, Michal Kosinski और David Stillwell ने एक रिसर्च पेपर लिखा जिसके अनुसार फेसबुक आपके 10 लाइक्स के पैटर्न को पकड़कर आपके सहयोगियों की तुलना में ज्यादा अच्छी तरह से आपकी पसंद बता सकता है। 150 लाइक्स में वह आपके परिवार को मात दे देगा. और आपके पति या पत्नी को मात देने में फेसबुक को सिर्फ 300 लाइक्स चाहिए।

भारत में हर पोस्ट या कमेंट को पढ़ने के बाद लाइक करने की परंपरा है। लेकिन फेसबुक ने यह समझ लिया होगा और वह इसपर ध्यान देगा कि आप किस वीडियो और उत्पाद को लाइक करते हैं, किस लिंक को ओपन करते हैं। और वह उन्हें ऐसे ही विज्ञापन दिखाता है।

तभी तो कई लोग शिकायत करते हैं कि उन्हें भद्दे विज्ञापन दिखाई देते हैं। एक तरह से फेसबुक आपको आइना दिखा रहा है, या फिर यह बता रहा है कि आपके कंप्यूटर को प्रयोग करने वाला कुछ और देख रहा है।

अगर आप एक वेबसाइट अपने कार्यालय के कंप्यूटर में, दूसरा घर में और तीसरा सेल फ़ोन पर देखते हैं, या फिर आप incognito या अदृश्य बनकर भी वेब देखते हैं, तब भी वेबसाइट कृत्रिम बुद्धि के द्वारा यह पता कर लेती है कि यह एक ही व्यक्ति है।

जब हम किसी क्यूट वीडियो को लाइक करते है तो हम उन वीडियो कंपनी – जो बड़ी तकनीकी कंपनी से मिली होती है – को अपने फेसबुक अकाउंट की जानकारी एकत्र करने की अनुमति अनजाने में, फ्री में, दे देते हैं।

तो लब्बो-लुआब यह कि इस सदी में हमारा व्यक्तिगत डेटा ही सबसे मूल्यवान संसाधन है, जिसे हम विशाल तकनीकी कंपनी और बैंकों को क्यूट कैट वीडियो लाइक करके दे देते है।

तो हमारा मूल विषय क्या था? प्रधानमंत्री मोदी कैसे data-mining के द्वारा भ्रष्टाचार की जानकारी निकाल लेंगे?

अरे भाई, जब आप ट्रैन या प्लेन टिकेट के लिए क्रेडिट कार्ड प्रयोग करते हैं, जब आप अस्पताल में आयुष्मान भारत के तहत इलाज करवाते हैं, जब सरकार यह पता करती है कि आप निर्धन है और आपको सब्सिडी चाहिए, जब आप सब्सिडी का बेनिफिट अपने बैंक अकाउंट में लेते हैं, जब आप नेट या सेल फ़ोन से पेमेंट करते हैं, जब आप बैंक अकाउंट खोलते समय पैन नंबर या आधार कार्ड देते हैं, जब आप फेसबुक में अपनी छुट्टियों की फोटो, महंगे होटल और रेस्टोरेंट की फोटो डालते हैं, जब आप किसी विवाह की फोटो, नई कार, अपने घर, बच्चों के स्कूल, गृहप्रवेश इत्यादि की फोटो शेयर करते हैं, तो उन फोटो को केवल आपके नज़दीकी ही नहीं देखते… कोई और भी देख रहा है और उन सब ‘आंकड़ों’ की माइनिंग कर रहा है, एकत्र कर रहा है। एक और एक को जोड़कर ग्यारह की फिगर पर पहुँच रहा है।

आयुष्मान भारत योजना में होने वाला भ्रष्टाचार तुरंत पकड़ में आ जाएगा।

गरीबों को पता है कि किसने किया है उनका कायाकल्प

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