2019 अस्तित्व का महासंग्राम है, महज आम चुनाव नहीं

तीन पोस्ट्स एकत्रित दे रहा हूँ, जो समझना है समझ लीजिये ।
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मोदी की देन

हम आप सभ्यता के युद्ध में हैं जिसके नियम एवं विधान आयातित हैं, आप के विरुद्ध हैं। आप प्राचीन पर्सिया की सीमा से घट कर बाघा तक एवं ब्रह्मा से बांग्ला तक रह गये हैं तथा दिन प्रतिदिन घट रहे हैं।

चौंकिये मत, भारत के भीतर ऐसे अनेक दार-उल-जाहिल स्थान हैं तथा बढ़ रहे हैं जहाँ भारतीय सेना को भी प्रवेश करने में एड़ी चोटी का बल लगाना पड़ेगा। बहन, बेटियों एवं बेटों को भी जो आप कहते हैं न, वहाँ न जाना या बच कर जाना, वही क्षेत्र।

शत्रु आप के रसोई तक पैठ रखते हैं एवं आप अच्छे दिखने की वासना से सिक्त हैं।
देश को जो अधिकारी वर्ग चलाता है, वह उस आरोपित तन्त्र की उपज है जिसमें विद्यार्थी का मस्तिष्क प्रक्षालन पहले होता है, मुण्डन जीवन पर्यन्त चलता है ।

ऐसे में मोदी आप को वास्तविक स्वतन्त्रता का आभास मात्र करा सके हैं जो 4 वर्षों की महती उपलब्धि कही जायेगी। उन्होंने वह पारिस्थितिक वातावरण बनाया है जिसमें आप ‘आगे की लड़ाई’ लड़ सकते हैं, वह आप हेतु लड़ने नहीं उतर सकते, वह कार्यपालिका प्रधान हैं, शपथ बद्ध हैं।

सन्तुष्ट नहीं हैं, होना भी नहीं चाहिये, तो अपना पक्ष निनाद के साथ प्रभावी ढंग से रखें। चेतायें किन्तु गालियाँ देने या अमर्ष में अपने ही पाँव काटने की मूर्खता न करें।

परिपक्व जनता की भाँति सोचें कि जो विकल्प हैं, क्या वे स्थिति इससे अच्छी कर देंगे?
मोदी अब तक के समस्त प्रधानों में अनूठे हैं किन्तु उनकी अपनी सीमायें हैं, वे खान-दानियों की भाँति निरङ्कुश नहीं हो सकते, कारण आप ही हैं।

बलवान से बलवान वीर की भुजाओं की भी शक्ति मांसपेशियों या अस्थियों में नहीं, उनकी संधियों में होती है। शक्ति नहीं दे सकते तो सन्धिवात उपाट कर उसका आत्मविश्वास न तोड़ें।
दुहरा दूँ कि सभ्यता का युद्ध 4-5 वर्ष में समाप्त नहीं होता, निरन्तर चलता है। मोदी मात्र संक्रमण काल की सच्चाई हैं, आगे आप के हाथों में है कि इजरायल होना चाहते हैं या पर्सिया।

हाँ, ऐसे जन भी मतदाता हैं जिनका मत मूल्य आप के समान ही है एवं आप भले पिकनिक मनाने जायें, उस दिन ये मतदान अवश्य करते हैं।

– सनातन कालयात्री गिरिजेश राव
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अपने ही इस पोस्ट के कमेन्ट में गिरिजेश जी कहते हैं – कभी कभी संयोग पर आश्चर्य होता है, मुझसे मात्र 7 मिनट पूर्व प्रदीप सिंह जी ने इसी भाव को भिन्न रूप में लिखा है अर्थात विविध पृष्ठभूमियों के लोग समान रूप से चिन्तित हैं, विचार कर रहे हैं ।

तो लीजिये, डॉ प्रदीप सिंह की उस पोस्ट को भी देखा जाये ।
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मोदी सरकार से, भाजपा से, संघ से मेरी तमाम असहमतियाँ हैं । गम्भीर असहमतियाँ हैं । शिक्षा, भाषा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, सांस्कृतिक समझ आदि आदि के मसलों पर ।

पर मैं अपनी ज़ुबान न खोलूँगा ।

इसलिए नहीं कि मैं वैचारिक काहिलियत का मारा हूँ या कि भ्रष्ट हूँ या कि अंधा हूँ । नहीं, मैं इनमें से कोई नहीं हूँ । मेरी आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, मैं भ्रष्ट भी नहीं हूँ, मेरी चेतना पूरी तरह जाग्रत है ।

मेरी चेतना जाग्रत है – इसलिए मैं कुछ नहीं कहूँगा । युद्ध का क्षेत्र कहने का नहीं, युद्ध का क्षेत्र है। युद्ध में जो सिपाही कहने में लगा, पीछे देखने लगा, वह मारा गया।

मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता जिससे गिद्धों को ताक़त मिले और मेरे देश की धरती नोची जाय।

मैं बुद्धिजीवी नहीं हूँ, मैं बैलेंस बिठाने के बेईमान बौद्धिक कौशल से अपरिचित हूँ। मेरी आँख सिर्फ सामने देख रही है । सामने – जहां रणक्षेत्र है ।

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तीसरी पोस्ट मेरी अपनी है, 7 जुलाई की

सेना में ऐसे लोग कदापि न होने चाहिए जो माने कि गुलामी ही सही, ज़िंदा तो बचेंगे। ये योद्धा कहलाने के लायक ही नहीं जो अपनी क्षमता तथा अपने नेता की क्षमता में विश्वास नहीं रखते और न अंत तक लड़ते रहने की हिम्मत रखते हैं। यही लोग युद्ध के पहले ही हार की संभावनाएं तलाशते हैं और खुद के लिए safe passage की तजवीज में रहते हैं।

मुसलमान और अंग्रेजों ने इनका खूब इस्तेमाल किया लेकिन मुसलमानों ने अक्सर अपना काम निकालने के बाद इनको ठिकाने लगा दिया। जगत सेठ ने मराठों को धन सहाय्य नहीं किया, मीर जफर को किया और मीर जफर के दामाद ने जगत सेठ के खानदान के सभी पुरुषों के सिर कलम किए और औरतों के साथ इस्लाम की आज्ञा का पालन किया।

सोशल मीडिया के कारण आज हर कोई सैनिक है और उनमें भी कई ऐसे हैं जो स्वयं को सेनापति ही मानते हैं । सरकार की आलोचना में प्रखरता से मुखर भी हैं । काश इतना समझते कि 2019 अस्तित्व का महासंग्राम है, महज आम चुनाव नहीं है।

जैसा कि कहता आया हूँ कि सरकार से कई शिकायतें मेरी भी हैं । लेकिन संग्राम की पहचान है और यह भली भांति समझता हूँ कि यह घड़ी अपने दल की आलोचना की नहीं बल्कि लामबंद होने की है। आवश्यकता अहंकार और असंतोष को परे रखकर अनुशासन से चलने की है अन्यथा पानीपत करोगे।

खैर, इन सभी को Sun Tzu की Art of War पढ़ने की विनती है। बहुत बड़ी पुस्तक नहीं, हालांकि सीख बहुत बड़ी देती है । नेट पर कई लेखकों द्वारा मुफ्त उपलब्ध है, सब से सरल और टू द पॉइंट रचना Gary Gagliardi की है । अन्य भाषांतर पुराने हैं, भाषा किंचित क्लिष्ट है ।
http://www.yama-dojo.ca/resources/Art_of_War.pdf

पंचतंत्र भी पढ़ लीजिये, वे बच्चों की कहानियाँ नहीं है बल्कि राजपुत्रों को राज्य चलाने का उपदेश है। “जिसे इसका ज्ञान होगा, इन्द्र भी उसका बाल बांका नहीं कर सकेगा” यह रचनाकार का दावा है ।

वैसे, anagram जो होता है उसमें अक्षरों के एक ही संच से अलग अलग अर्थ के शब्द बनते हैं । मु ख र से मूरख भी बन जाएगा, नहीं?

अस्तु, माँ काली सभी को सद्बुद्धि दे।

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