अब अपना रंग दिखाना शुरू कर रही है परीक्षा में नक़ल व्यवस्था

पिछले दिनों बनारस में एक मित्र जो विद्यालय चलाते हैं उनसे बात हो रही थी तो उनका दर्द था कि कक्षा 9वीं से 12वीं के लिए अच्छे अध्यापक नहीं मिल रहे… कक्षा 11-12वीं के अच्छे विज्ञान और गणित के अध्यापक की तो जैसे जबरदस्त कमी है।

हमने कहा कि आप क्या बात करते हैं? इतने हर साल M. Sc, M. Tech निकल रहे हैं!

उन्होंने कहा कि CBSE के नियम के अनुसार शिक्षकों के लिए B. Ed. या M. Ed. ज़रूरी है। टॉप संस्थान की Ph. D वाला भी हो लेकिन बिना B. Ed. सब बेकार हैं। डिग्री वाले खूब मिल रहे हैं, लेकिन पढ़ाने वाले काबिल नहीं मिल रहे हैं।

थक हारकर उन्होंने दूसरे राज्य जैसे बंगाल या दक्षिण भारत से अध्यापक बुलाए। इनको ज्यादा सैलरी के साथ रहने का घर और भोजन का खर्च अलग से देना पड़ रहा है… इसका फायदा ये रहा कि काफी हद तक टिकने और अच्छा पढ़ाने वाले मिल रहे हैं।

हू ब हू यही समस्या गोरखपुर के एक विद्यालय संचालक ने बताई और उन्होंने अध्यापक दूर North East से और यहाँ तक कि नेपाल से भी बुलाए…

इसके बाद पिछले दिनों मैंने कई अलग अलग विद्यालय संचालकों से इस पर चर्चा की तो यही समस्या निकला कर आ रही है कि डिग्रीधारी खूब मिल रहे हैं… नंबर भी अच्छे हैं… लेकिन दो-चार क्लास के बाद ही पता चल जाता है कि जानकारी और पढ़ने के नाम पर ये खुद शून्य बटा भेली हैं।

पटना में भी यही हाल है और गया में भी… नंबर तो गगरा भर के हैं इनके लेकिन विद्यालय गिलास भर भी नहीं…

सरकारी विद्यालयों में मेरिट पर भर्ती की व्यवस्था ने अधिक से अधिक नंबर लाने की होड़ मचाई… जगह B. Ed. या M. Ed. दिलाने के ठेके खुल गए… पैसा, नक़ल, सेटिंग सब कुछ सुचारु रूप से फ़ैल गया सरकारी भर्ती के लिए… इस सब के बीच विषय की जानकारी और अध्यापन दम तोड़ गया।

सरकारी विद्यालयों की जो ज़रूरत है उसके पूरा होने पर भी इन डिग्रीधारी लोगों की खेप बचती है लेकिन लोग इस काबिल नहीं कि अन्य विद्यालयों में पढ़ा सकें… जबकि कई प्राइवेट विद्यालय इन अध्यापकों को सरकारी शिक्षकों की अपेक्षा दुगुना भत्ता भी देने को तैयार बैठे हैं।

उप्र और बिहार जैसे राज्यों की नक़ल व्यवस्था अब अपना रंग दिखाना शुरू कर रही है… अध्यापन के क्षेत्र से लेकर अन्य क्षेत्रों में कार्य करने के लिए अब बाहर के राज्यों जैसे बंगाल, पूर्वोत्तर, दक्षिण आदि से दुगुने पैसे देकर कर्मचारी धीरे धीरे लाए जा रहे हैं।

नक़ल से पास होकर और सिर्फ डिग्री के लिए पढ़ने वाले ये डिग्रीधारी बाहर जाकर रिक्शा चलाने से लेकर माल ढोने का काम करेंगे। और फिर जब कभी सफाईकर्मी की सरकारी नौकरी निकलेगी तो कच्छे पहन के नाले में कूदेंगे। वो भी बस कुछ सालों तक… नई मशीन और तकनीकी एक न एक दिन आ ही जाएगी नाले गटर साफ़ करने को।

पढ़िए, क्योंकि पढ़ना ज़रूरी है

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY