सत्येंद्र दूबे : भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में गंवाई थी जान

सत्येंद्र के. दूबे, इनका जन्म 1975 में बिहार के छोटे से गाँव – शाहपुर में हुआ था. शुरू से ही यह बेहद मेधावी छात्र रहे, जहाँ इन्होंने 10वीं तथा 12वीं के राज्य बोर्ड के परीक्षाओं में टॉप किया (आर्थिक तंगी के बावजूद) वहीं इन्होंने 1994 में आई. आई. टी. कानपुर से डिपार्टमेंट ऑफ सिविल इंजिनियरिंग में स्नातक और 1996 में एम. टेक भी किया आई. आई. टी. बी.एच.यु. से.

इतना सब होने पर भी बजाए निजी कंपनी में जाने का निर्णय छोड़ (जहाँ लाखों कमा सकते थे), सत्येंद्र ने भारत सरकार की इंडियन इंजिनियरिंग सर्विसेज़ को चुना, अपने देश के सेवा निहित. यहाँ सफलता पूर्वक इन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण कर, National Highways Authority of India (NHAI) में नियुक्त होकर, यह जुलाई 2002 – कोडरमा (बिहार) में, ‘Golden Quadrilateral Project’ के तहत बतौर Project Director काम करना शुरू किया जहाँ पर एक खंड इनके देखरेख में था. इस कार्य में बड़ी कंपनियाँ भी सहयोग में थीं.

अक्टूबर २००२ काम के वक़्त सत्येंद्र पाते हैं कि इनमें से कुछेक कंपनी अवैध तरीक़े से subcontracting में लिप्त है. इसमें स्थानीय ठेकेदार, कुछ इंजिनीयर, सत्येंद्र के अपने ही विभाग के इंजिनीयर आदि भी शामिल थे. पूरे साँठगाँठ के साथ यह भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितता काफ़ी बड़े पैमाने पर हो रही थी..

यह देखते हुए सत्येंद्र ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए कुछ को निलंबित किया तथा पत्राचार कर अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी भी दी गई किंतु सब कुछ अनदेखा किया गया. उल्टा इनका तबादला गया जिले में कर दिया गया.

समस्या इतनी गंभीर थी कि सत्येंद्र ने निश्चय किया इसकी जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय को देने का. इसके बाद इन्होंने उक्त जानकारी, सिलसिलेवार ढंग से, अपना नाम उजागर न करने के शर्त पर सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को भेजा. किंतु वहाँ के कुछ कर्मचारियों ने इनका नाम उजागर करते हुए, इनके नाम के साथ ही पत्र को अलग-अलग विभागों में आगे भेज दिया. इस तरह से सूचना लीक की गई.. कुछ समय पश्चात इधर माफिया वालों को पता लगने पर, 27 नवंबर 2003 को सत्येंद्र की गोली मार कर हत्या कर दी गई.

इस घटना में जहाँ सत्येंद्र अपनी जान गँवा बैठे वहीं दूसरी ओर देश में भ्रष्टाचार को लेकर थोड़ी जागरूकता आई, यह मामला मीडिया में काफ़ी उठा, केस CBI को सौंपी गई, सरकार कुछ नीतिगत फ़ैसले लेते हुए – WhistleBlowers Protection Act, 2011, इस Act में कुछ बदलाव किए जिसमें सबसे मुख्य – मुखबीर का नाम उजागर न होने से लेकर था..

कहीं न कहीं इस तरह के प्रावधान के अनुपस्थिति में सत्येंद्र आज हम सब के बीच नहीं हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने पर भी किसी ने नहीं सुनी, सरकार के कर्मचारियों ने नाम न उजागर करने के निवेदन पर ध्यान न दिया और अंततोगत्वा जिससे हम सभी कभी भी रु-ब-रु नहीं होना चाहते हैं, वह हुआ (अर्थात हत्या)..

यह एक विडंबना है कि “भ्रष्टाचार” एक ऐसा विचित्र और क्लिष्ट सामाजिक मुद्दा है जिस पर नकेल कसना काफ़ी कठिन है. क्योंकि पीढ़ी दर पीढ़ी यह चलता आया है.. कितनी बार हम सामने यह होता देख कर भी डरते हैं इसके विषय में कहने से.. कड़वी सच्चाई यही है.. और कितने ही बार लोग इसका सहारा भी लेते हैं कि ‘कौन झंझट में पड़े’..??

आख़िर इसका उपाय क्या हो सकता है, क्योंकि यह भी शायद हमें ही सोचना चाहिए.

किंतु समस्या यह भी है कि कमोबेश हम सभी इसमें कहीं न कहीं, छोटे तौर पर ही सही, लिप्त हैं दुर्भाग्यवश… एक दुष्चक्र है…!!!

– मीनाक्षी करण

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