हां, मैं भक्त हूं!

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विनम्रता और ज्ञान कितने सुंदर आभूषण हैं। मुझमें ये दोनों ही नहीं हैं। विनम्रता यूं नहीं कि मोदी विरोध में खड़े लोगों, खासकर विपक्ष के नेताओं को तुच्छ मानता हूँ।

ज्ञान मुझमें है नहीं। हो भी नहीं सकता। ज्ञान तो मोदीविरोध का प्रथम पर्व है। जो मोदी समर्थक हैं वे संघी, मूर्ख, भक्त और बौद्धिक समाज से बहिष्कृत हैं। होना भी चाहिए।

इन चार वर्षों में कई महान चिंतक, अद्वितीय रचनाकार, राष्ट्रवादी, अंतरराष्ट्रीयवादी, हिन्दू, अहिन्दू, मानवतावादी, वामपंथी, सार्त्रवादी, सौम्यवादी सभी मिले। सबने अपने बौद्धिक होने की निजता को बचाकर मोदी का समर्थन और विरोध किया। वे लेखक बने रहे। मैं नष्ट हो गया। मैं मोदीवादी रहा। हूँ, और रहूँगा। कोई मोदीवादी लेखक नहीं हो सकता ! ऐसा हमारे समय के चिंतक कहते हैं। स्टालिनवादी शानदार लेखक हो सकते हैं ! यह भी चिंतक चुपचाप कह गए हैं !

इन्हीं दिनों मैंने एक से बढ़कर एक महान विद्वानों को पढ़ा। कुछ लोग जो पहले मोदी समर्थक थे, बाद में अंध विरोधी हुए। आजकल निरंतर जड़ खोद रहे हैं। अर्थ, राजनीति, देशनीति, ज्ञान, विज्ञान, कूटनीति सबके धुरंधर विद्वान हैं। कई तो इस्लाम के विशेषज्ञ हैं, कई हिन्दू दर्शन के प्रकांड पंडित वाल्मीकि रामायण पर भाष्य लिख रहे हैं।

कई अपने इलाके के, अपनी जात के नेता बाराती की तस्वीर चिपकाने में व्यस्त रहते हैं। वहां नमनोत्सव चलता रहता है। वो सभी मोदी को फेंकू कहकर महान पत्रकार कहलाते हैं। उन्हें मोदीजी की प्रशंसा में कुछ लिखते नहीं देखा। मोदी कहां उस स्तर तक पहुंच पाए!! मोदी को अपना टाइटिल बदलना होगा! थोड़ा लोदी सा लगता है! कहीं कोई सिंह, शुक्ला, सिन्हा तो हो!

कई मां पिता के चित्र लगाकर कविताएं लिखते हैं। मां तुझे प्रणाम! मैं नहीं लिख पाता! कई महाकवियों पर पोस्ट लिखते हैं। मैं हिम्मत नहीं कर पाता। अक्ल भी अकालपीड़ित है। एकबार, गुरुदेव ने कह दिया, गीत की रोटी विस्मृति से गीली हो गई है! हिम्मत ने हाथ खड़े कर दिए। जिस कवि को घोका, उन पर भी चार शब्द अपना कुछ लिख दूं, ऐसी प्रज्ञा कहाँ से लाऊं!

ना ही मुलायम जी जैसा समाजवाद पा सका। न लालू जी जैसी उद्धारी आत्मा। न माया जैसा दलितप्रेम। न टेढ़ी नाक का सीधा समाजवाद। न लालटेन का तेज। और ना ही हजारे बाबा का झाड़फूंक कर सका। मुसलमान तो खैर दूर ही रहे। मेरी छाया भी छू लें तो वजू करना पड़ जाय।

मैं एक निपट मूर्ख भक्त हूँ। मुझे राजनीतिक विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार कहलाने से कोफ़्त है। मैं बस इतना ही देख पा रहा हूँ कि पिछले साठ सत्तर वर्षों से पटरी से उतर चुका देश पटरी पर लौटने के प्रयास में है। बल्कि छटपटाहट में है और कोई सहारा दे रहा है। सहारे के प्लेटफार्म सुधर रहे हैं। दफ्तर की दुनिया बदल रही है। गरीबों के घर रौशनी जा रही। चोरों का चिराग बुझ रहा। नॉर्थ ब्लॉक के पास एटैची वाले अब नहीं घूमते। जिन्होंने बरसों से कर नहीं दिए वो करोड़ों में कर दे रहे हैं। देश में धमाके नहीं हो रहे। सारी गरमी सीमा पर भारत को अस्थिर करने में उतर रही है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार हो रहे हैं। सड़कें बन रही हैं। हवाईअड्डे बिछ रहे हैं और कोई घोटाला नहीं हो रहा। माफ़ कीजिए, राफ़ेल घोटाले की हवा निकल चुकी है।

फिलहाल मैं यहीं हूँ। मुझे इसी लकीर पर चलना है। इससे अधिक देख नहीं पा रहा। दार्शनिक तो हूँ नहीं। पत्रकार हूँ जो होना नहीं था। भक्त हूँ जो होने की प्रतीक्षा में जीवन के न जाने कितने बरस खप गए। अब भक्ति ही करनी है।

‘भक्त’ होने पर होइये गौरवान्वित

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