क्योंकि जहाज सिर्फ ख़रीदे ही नहीं जाने हैं, दशकों तक मेंटेन भी किये जाने हैं

मुझे राफेल सौदे में प्रधानमंत्री मोदी पर पूरा यकीन है कि इसमें कोई घोटाला नहीं है। और इसके निम्न आधार हैं :

राफेल सौदा दो सरकारों के बीच हुआ है। भारत और फ़्रांस। बोफोर्स, अगस्ता वेस्टलैंड ये प्राइवेट कम्पनीज़ थीं, सरकार सीधे कंपनियों से बात कर रही थी, सौदे कर रही थी।

और घोटालों के बारे में दाम सुनकर पता नहीं चला, बल्कि कोर्ट में दायर केसेस, ऑडिट रिपोर्ट्स से पता चला।

भारत सबसे ज्यादा हथियार रूस से खरीदता है और कोई भी सरकार हो, कभी भी रशिया से ख़रीदे जहाजों, हथियारों में दलाली के आरोप नहीं लगे। क्योंकि भारत रूस के बीच सौदे इंटर गवर्नमेंटल अग्रीमेंट होते हैं।

दलाली खानी हो, तो उसमें हिस्सेदार या गवाह कौन बढ़ाता है। मोदी सरकार को सीधे Dassault से डील करने में क्या दिक्कत थी, रिलायंस को भागीदार बनाने के लिए वैसे भी फ़्रांस सरकार क्या रोल निभाती।

अनिल अम्बानी की कंपनी राफेल सौदे से 10 दिन पहले नहीं बनी थी। जब मोदी सरकार सत्ता में आयी थी, अनिल अम्बानी ने घोषणा तभी कर दी थी।

15 मार्च, 2015 को ये कंपनी रजिस्टर्ड थी। 2016 में इसने पीपावाव शिपयार्ड को ख़रीदा था और उसका और अपना नाम बदला था। रिलायंस नेवल एन्ड इंजीनियरिंग लिमिटेड।

मोदी सरकार जब सत्ता में आयी थी, तब उसका विज़न बड़ा स्पष्ट था। डिफेन्स में तमाम विदेशी मुद्रा खर्च होती है। अधिकतर वैपन इम्पोर्ट होते हैं। मेक इन इंडिया के तहत सरकार का प्लान है कि वैपन देश में बनें, विदेशी कम्पनियाँ देशी कंपनियों के साथ गठबंधन करें।

जैसे आज सैमसंग के मोबाइल भारत में बनते हैं और एक्सपोर्ट हो रहे हैं। देश डिफेन्स में भी एक्सपोर्ट करे। इसलिए अनिल अम्बानी ही नहीं, तमाम कम्पनियाँ अवसर समझकर डिफेन्स में आईं। महिंद्रा, लार्सन टुब्रो, टाटा तमाम कम्पनियाँ। सरकार हथियार खरीद में वर्ल्ड में नंबर वन की अपनी पोजीशन को देशहित में इस्तेमाल कर रही थी।

HAL को कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के समय पूरा राफेल जहाज बनाना था। सौदे की शर्तो के मुताबिक राफेल जहाज भारत में बनने थे, और इसके लिए HAL को अधिकृत किया गया था।

लेकिन मोदी सरकार के सौदे में रिलायंस डिफेन्स को राफेल जहाज बनाकर नहीं देना था। बल्कि ऑफ़सेट क्लॉज़ के चलते उसे भारत में निर्माण करने के लिए कई टेक्नॉलजी मिलनी थी। जिसमे राफेल के कलपुर्जे, Dassault के बिज़नेस जेट फाल्कन के कलपुर्जे हैं।

अनिल अम्बानी की कंपनी को 6600 करोड़ या 21,000 करोड़ कैश नहीं मिलने हैं। इस मूल्य की टेक्नॉलजी मिलनी है, जिसके निर्माण, एक्सपोर्ट से उन्हें पैसा कमाना है। मेहनत भी है और समय भी लगेगा।

और ऑफसेट क्लॉज़ के तहत केवल अनिल अम्बानी की कंपनी नहीं है, ऐसी ढेरों कपनियाँ हैं जिन्हे अलग अलग टेक्नॉलजी मिल रही है। Dassault अगर राफेल दे रहा है तो अनेको कम्पनियाँ उसके साथ हथियार, राडार सिस्टम, इंजन दे रही हैं। ये कम्पनियाँ भी ऑफसेट क्लॉज़ के तहत भारत में ढेरो कंपनियों से गठबंधन कर रही हैं।

बहुत मुमकिन है अनिल अम्बानी की कंपनी को भारत सरकार ने आगे किया हो, लेकिन ये घोटाला नहीं है, फेवर है। ऐसा फेवर अनिल अम्बानी, लार्सन टुब्रो, महिंद्रा, भारत फोर्ज, सैमटेल, BEL, भारत डायनामिक्स को भी मिला है।

मुमकिन है राफेल की कीमत मोदी सरकार ने ज्यादा दी हो। क्योंकि राफेल, पुराना सौदा रद्द करके नए सौदे से लिया गया। इमरजेंसी क्लॉज़ के तहत लिया गया। जहाँ एक जहाज कई सौ करोड़ का हो, वहां संख्या इम्पोर्टेन्ट होती है। 36 बनाम 126 में कीमत में अच्छा अंतर आ सकता है।

फिर जहाज हथियारों के साथ ख़रीदे गए हैं। वारंटी की शर्तें अलग हैं। लाइफ सायकल कॉस्ट अलग तरह से कैलकुलेट की गयी है। क्योंकि जहाज ख़रीदे ही नहीं जाने हैं, दशकों तक मेंटेन भी किये जाने हैं।

जितना अब तक पढ़ा सुना, मुझे राफेल सौदे में कोई घोटाला नहीं दिखता। जिन्हें दिखता है, वो इसे अब तक का सबसे बड़ा घोटाला भी मानने को स्वतंत्र हैं, मुझे कोई उज्र नहीं।

सन्दर्भ :

1. Russia pitches defence contracts worth $10 billion to India

2. Reliance Defence is now Reliance Naval and Engineering

3. RELIANCE DEFENCE AND ENGINEERING LIMITED (RDEL) SIGNS CONTRACT FOR 14 NOS. FAST PATROL VESSELS (“FPV”)

4. Reliance Defence corners offset contracts worth Rs 21,000 crore on Rafale deal

राफ़ेल सौदे पर ओलांद, भ्रष्ट मीडिया, कांग्रेस व रूस का षडयंत्र

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