राजनीतिक हिंसा में वामपंथियों के आसपास भी नहीं टिकते हम

यह लंबा और वीभत्स संघर्ष होगा और हर किसी को इसकी कीमत चुकानी होगी। हाँ, जब आप एक महान लक्ष्य के लिए संघर्ष करते हैं तो इसकी कीमत के बारे में नहीं सोचते... पर ज़रा सोचिए... सिर्फ एक बार... अगर आपके महान लक्ष्य वाले पक्ष को हार का मुँह देखना पड़ा तो?

यह पोस्ट मूलतः अमेरिकी राजनीति के संदर्भ में दक्षिणपंथी और वामपंथी रणनीति पर लिखे एक लेख का भावानुवाद है। भारतीय संदर्भ में दक्षिणपंथ को शुद्ध रूप से अपना पक्ष समझने की भूल से बचें। हाँ, पश्चिम में दक्षिणपंथी राजनीति की जो समस्याएँ हैं वही लगभग हमारी भी हैं… अंग्रेज़ी लेख का हिन्दी में अनुवाद डॉ राजीव मिश्र ने किया है।

दक्षिणपंथी विश्वास करते हैं कि वे वामपंथियों को किसी संघर्ष में हमेशा पटखनी दे सकते हैं।

यह उनके रुख में हमेशा झलकता है, और उनकी मन:स्थिति में गहरे तक बैठा हुआ है… हमारे पास सत्ता है, सेना है, पुलिस है, हथियार हैं… जिस दिन ज़रूरत होगी, हम सब एकजुट होंगे और वामपंथियों को कुचल देंगे… ठीक है ना!

अमेरिकी गृहयुद्ध में दक्षिण के कंफेडरेट्स कुछ ऐसी ही सोच रखते थे, पर बात नहीं बनी…

एक सामान्य दक्षिणपंथी की यह सोच जानी पहचानी है… पर यह कुछ ऐसा ही है जैसे कि एक आदमी एक बंदूक खरीद कर रख लेता है कि किसी दिन काम आएगी…पर उसे लेकर कभी फायरिंग रेंज में नहीं जाता, उसे चलाना नहीं सीखता।

और ऐसे में जब रात के तीन बजे कोई आपका दरवाज़ा तोड़ रहा होगा तो आपको समझ में नहीं आएगा कि कौन सा बटन मैगज़ीन रिलीज़ का है और कौन सेफ्टी का. संगठन में समय, कम्युनिकेशन, नेटवर्किंग लगती है और दक्षिणपंथी इसमें कोई रुचि नहीं लेते…

इसके पीछे का एक कारण है मोहभंग। दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ अपने वोटरों और समर्थकों को वह कभी नहीं देते जिसकी माँग होती है। आश्चर्य की बात नहीं है कि सामान्य दक्षिणपंथी, सामान्यतः नया नया दक्षिणपंथी अपने आपको राजनीति से परे कर लेता है। उसे अपने लक्ष्य राजनीतिक सत्ता से पूरे होते नहीं दिखते।

उसे उम्मीद होती है कि एक दिन यह पूरी की पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी और इस निर्णायक क्षण में प्राकृतिक रूप से सामाजिक शक्तियाँ, अक्षम और अव्यवहारिक वाममार्ग को छोड़ कर दक्षिणपंथ को स्वयं ही चुन लेंगी।

पर यह आवश्यक नहीं है। व्यवस्था का ध्वंस और उसमें निहित राजनीतिक हिंसा मज़े की बात नहीं होगी। यह लंबा और वीभत्स संघर्ष होगा और हर किसी को इसकी कीमत चुकानी होगी।

हाँ, जब आप एक महान लक्ष्य के लिए संघर्ष करते हैं तो इसकी कीमत के बारे में नहीं सोचते… पर ज़रा सोचिए… सिर्फ एक बार… अगर आपके महान लक्ष्य वाले पक्ष को हार का मुँह देखना पड़ा तो?

सिडनी हैरिस का एक प्रसिद्ध कार्टून है। उसमें दो वैज्ञानिक शोधकर्ता एक ब्लैकबोर्ड पर बहुत से गणित के सूत्र लिख कर कुछ हल करने की कोशिश कर रहे हैं। और उस ब्लैकबोर्ड के बीच में लिखा है – “और चमत्कार हो गया…” तब एक वैज्ञानिक दूसरे से पूछता है – शायद यहाँ तुम्हें दूसरे स्टेप को थोड़ा और समझा कर लिखना चाहिए!

इस चमत्कार की आशा एक पुराना दक्षिणपंथी लालच है। हमें लगता है कि हमें कुछ भी बदलने की ज़रूरत नहीं है। एक दिन लोग हमें सुनने समझने लगेंगे और हमें स्वीकार करने लगेंगे और फिर सबकुछ बदल जायेगा।

सब कुछ बदल देने के लिए, एक नई दुनिया बनाने के लिए जो संगठन क्षमता चाहिए वह वही संगठन क्षमता है जिसे वामपंथी, सरकारों पर दबाव बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। उनका संगठन का अभ्यास है। तो कल एक निर्णायक क्षण में कौन बेहतर स्थिति में होगा? कौन अपने स्थानीय संपर्क सूत्रों से बेहतर संपर्क की स्थिति में होगा? हम तो नहीं!

शांतिप्रिय लोग कहते हैं – आंदोलनों से क्या होता है? कुछ भी तो नहीं… जी नहीं! आंदोलनों से प्रैक्टिस होती है। संपर्क साधने की प्रैक्टिस, जुटने, जमा होने की प्रैक्टिस, देखते देखते भीड़ जुटाने की प्रैक्टिस…

आपको अगर दस लोगों को एक डिनर पार्टी के लिए जुटाना हो तो जी का जंजाल हो जाएगा। वहीं वामपंथी बिना बात के यूँ ही एक विरोध प्रदर्शन के लिए ठीक ठाक भीड़ देखते देखते जुटा लेते हैं। सोचिए, अगर कल को एक संकट खड़ा हो जाये तो महीन और विस्तृत योजना की बात छोड़िए, बड़े बड़े संगठनों को भूल जाइए… पहले पाँच मिनट में आप किसे कॉल करेंगे… आपके साथ कौन कौन खड़ा होगा?

वामपंथियों को पता होता है। संख्या उनकी चाहे मुट्ठी भर ना हो, वे एक दूसरे के साथ खड़े ज़रूर होते हैं। अगर आप सोचते हैं कि हमारे लिए वामपंथियों से सीखने का कुछ भी नहीं है तो यह बिल्कुल गलत है। उनके सिद्धांत नहीं, पर उनकी टेक्निक बेशक सीखने की चीज़ है।

पहली चीज़ सीखने की है कि वामपंथियों को अपनी संस्थाएं खड़ी करने का अभ्यास बहुत बेहतर है… और पहले से बनी संस्थाओं पर नियंत्रण करने का भी। और वे अपने अनुभव एक दूसरे से शेयर करते हैं, साथ ही एक दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं।

अगर एक दक्षिणपंथी एक चर्च बनाना चाहेगा तो वह चर्च बनाएगा और उसमें पूजा करेगा। वहीं एक वामपंथी अगर एक चर्च बनाएगा तो वह यहीं नहीं रुकेगा…

वह एक किताब लिखेगा कि चर्च कैसे बनायें, लोगों को बताएगा कि चर्च बनाना क्यों सबसे जरूरी काम है, वर्कशॉप लगाएगा कि चर्च की फंडिंग कैसे करें, उनका रजिस्ट्रेशन कहाँ कराएँ, प्रचार कैसे करें, लोगों को चर्च में बुलाकर लाने के लिए क्या करें…

और उसके बाद अपने वक्ताओं को लाएगा जो वहाँ वामपंथी सोच का प्रचार करेंगे। दक्षिणपंथियों को एक दूसरे को सिखाने का और एक दूसरे से सीखने का काम बेहतर तरीके से करने की सख्त ज़रूरत है।

दूसरी बात जो सीखने की है कि वामपंथी कार्यपद्धति क्या है? दक्षिणपंथी संस्थाएं एक हायरार्की में काम करना पसंद करती हैं। उन्हें किसी कदम के लिए हमेशा एक केंद्रीय नेतृत्व से आदेश मिलने का इंतज़ार रहता है। जबकि वामपंथी संस्थाएं जहाँ एक दूसरे से समन्वय बना कर रखती हैं, वहीं एक दूसरे से काफी स्वतंत्र रूप में काम करती हैं।

उनमें लोकल ऑटोनोमी ज्यादा है। वे कार्यपद्धति की विविधता लेकर चलती हैं। इसीलिए जहाँ उनका एक झुंड शांति मार्च निकालने में सबसे आगे रहता है, वहीं दूसरा एक झुंड हिंसक करवाई करने से परहेज़ भी नहीं करता… और दोनों झुंड साथ होते हुए भी अलग अलग दिखाई देते हैं।

इसलिए जब इनका एक अंग कानूनी लफड़े में फंसता है और फरार होता है तो दूसरा उसे कानूनी मदद पहुंचाने के लिए और उनके सदस्यों को सुरक्षा, साधन, रोजगार मुहैया कराने के लिए मुक्त रहता है… जबकि दक्षिणपंथी कार्यकर्ता जब समस्या में फंसते हैं तो उनके साथ उनका पूरा तंत्र फँस जाता है और उन्हें कोई मदद नहीं पहुँचती।

दक्षिणपंथी अक्सर शिकायत करते हैं कि वामी पैसे खर्च करके भीड़ जुटाते हैं। यह आधा ही सच है। वे भीड़ जुटाने के लिए पैसे खर्च करते हैं… पर उनकी भीड़ पेशेवर नहीं होती, सिर्फ उनके आयोजक पेशेवर होते हैं। वे आयोजकों पर पैसा खर्च करते हैं, जनता पर नहीं।

उनके आयोजन, धरना, प्रदर्शन एक प्रोफेशनल बैंड के म्यूजिक कॉन्सर्ट की तरह होते हैं। बैंड, लाइट, टेंट पर खर्च होता है… पर पब्लिक खुद ही उठ कर आ जाती है। वामियों के संगठन एक प्रोफेशनल कंपनी की तरह होते हैं… उनके शीर्ष के संगठनकर्ता को काम का उचित पुरस्कार भी मिलता है। यही वजह है कि उनका संगठन अधिक व्यवस्थित और दक्ष दिखाई पड़ता है।

वामियों के संगठन केंद्रीयकृत और विकेन्द्रित व्यवस्थाओं के सम्मिलित रूप हैं। उनकी कुछ संस्थाएं ज्यादा संगठित हैं, वे लोगों को रिक्रूट करते हैं, संगठन को बड़ा करते हैं और वे वामपंथी आंदोलन का कोर खड़ा करते हैं। वहीं कुछ लोग छोटे छोटे ग्रुपों में काम करते हैं जिसमें ज्यादातर लोग करीबी व्यक्तिगत परिचय वाले होते हैं। उनमें बाहरी घुसपैठ करना संभव नहीं होता और अगर एक ग्रुप में घुसपैठ कर भी लें तो पूरा संगठन प्रभावित नहीं होता। ये सहयोगी संगठन या एफिनिटी ग्रुप कहलाते हैं।

वहीं दक्षिणपंथी लोग जब सक्रिय होते हैं तो वे एक ब्लॉग लिखते हैं, यू-ट्यूब चैनल बनाते हैं, अखबारों में लेख लिखते हैं… पर एक दूसरे से समन्वय नहीं बनाते। मैदान में नहीं उतरते। जो चलते भी हैं तो सभी अपनी अपनी लेन में चलते हैं…

अमेरिका में वामपंथियों को कम से कम चालीस साल की बढ़त है। उनका संगठन का अभ्यास, संपर्क साधने और सक्रिय होने का अभ्यास दक्षिणपंथियों से बहुत बेहतर है। अगर हमें उनसे निबटना है तो उनकी तकनीक को समझना, सीखना, अपनाना ही होगा।

Political Violence is a Game the Right Can’t Win

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