मोदी और कांग्रेस में अंतर, और मोदी की मजबूरियां

किसी भी लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र के चार स्तम्भ या हिस्से होते है ..

1. न्यायपालिका
2. कार्यपालिका
3. विधायिका
4. मीडिया

भारत की आज़ादी के बाद से ही काफी लम्बे समय तक देश में कांग्रेस या कांग्रेस से निकले समविचारधारा वाले राजनीतिक दलों का शासन रहा. इस लम्बे शासन के दौरान भारतीय लोकतंत्र के चारों हिस्से मक्कार लुटेरी भ्रष्ट. कांग्रेस और उसके साथी गिरोह की देशघाती कल्चर से बहुत गहराई तक प्रभावित तथा संक्रमित हुए.

इस बीच अपवादस्वरुप देश में जो गैर कांग्रेसी सरकारे बनी.उनमें भी कांग्रेस के तत्व परोक्ष या अपरोक्ष रूप से शामिल रहे और उन सरकारों में भी लोकतंत्र के चारो स्तंभों की मदद से कांग्रेस तथा नेहरु-गांधी परिवार ने अपने एजेंडे पूरे किये.

यहाँ तक कि अटल विहारी बाजपेयी की दो अल्पमत सरकारे भी कांग्रेस के इस प्रकोप का बहुत अच्छे से शिकार होती रही थी. देश में आज़ादी मिलने के बाद पहली बार वर्ष 2014 में पहली गैर कांग्रेसी सरकार आई जो अपने दम पर पूर्ण बहुमत लेकर आई थी.

अब इस माहौल में बहुत से छोटे स्तर के भाजपाई नेता, भाजपा के राजनीतिक तथा गैर राजनीतिक समर्थक, विश्व हिन्दू परिषद्, संघ, तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के बहुत से कार्यकर्ता तथा पदाधिकारी एवं सोशल मीडिया में राष्ट्रवादी तबके का एक हिस्सा मोदी की सरकार से उम्मीद करने लगा कि वह भी कांग्रेसी तरीको से ही अपने दुश्मनों का मर्दन करना शुरू करे.

लेकिन बहुत से अवसरों पर मोदी उनकी यह इच्छा इन्हीं लोगों के विचारों तथा तरीकों के अनुसार करते ऐसे लोगो को प्रतीत नहीं हुए. ऐसे उपरोक्त लोगों को भारत के वर्तमान हालातों का ज़रा भी संज्ञान नहीं है. कारण यह कि जब भी कांग्रेस या कांग्रेस +कांग्रेस समर्थक दलों की सरकारे रही है उस माहौल में, केंद्र सरकार को हमेशा ही विधायिका में रहते हुए लोकतंत्र के शेष तीन हिस्से का मजबूत सपोर्ट मिलता रहा है. और एक आध अपवाद को छोड़ कर अपरोक्ष तथा भीतरी सपोर्ट भी.

संसद के अन्दर लोकसभा के अतिरिक्त उच्च सदन राज्य सभा में हमेशा ही कांग्रेसी सेक्युलर दलों का बहुमत रहा. जिससे कांग्रेस बहुत से ऐसे काम अंजाम देने में सफल हुयी जो मोदी सरकार के वश में नहीं है.

विधायिका में रहते हुए कांग्रेस ने इसके भी विभिन्न हिस्सों को इतना ज़्यादा बिकाऊ और करप्ट कर दिया था कि आज मोदी को इसी में रहते हुए अपने राष्ट्रीय और समाजिक दायित्वों को अंजाम देना है.

समर्थक तो छोड़िये भाजपा के बहुत से छुटभैये नेता, विधायक, संघ के बहुत से पदाधिकारी और कार्यकर्ता, विश्व हिन्दू परिषद् तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के बहुत से कार्यकर्ता भी अक्सर इस समस्या पर ध्यान नहीं देते. ना ही खुद को अति ज्ञानी समझने वाला स्वर्ण समाज का एक हिस्सा इन तथ्यों को बारीकी को समझने का प्रयास करता है. इन सबको लगता है कि “अरे मोदी की पूर्ण बहुमत की सरकार है तो ये हर दुश्मन का कांग्रेसी तरीकों से मर्दन काहे नहीं कर रही?”

मीडिया, न्यायपालिका का अधिकांश हिस्सा तो सेक्युलर वामपंथी कांगी है ही, लेकिन देश को चलाने वाली कार्यपालिका में भी अधिकांश हिस्सा उसी भ्रष्ट और मक्कार तथा घाघ कांगी वामी सेक्युलर मानसिकता का है. देश के मतदताओं के एक छोटे हिस्से ने लोकसभा चुनाव में सिर्फ सरकार बदली है, देश भर में तैनात भ्रष्ट मानिसकता के स्वार्थी कर्मचारी तथा अधिकारी नहीं.

इस विशाल कार्यपालिका में सबको ना तो नौकरी से निकाला जा सकता है ना ही सबको स्थानान्तरण ही संभव है. ज़्यादा से ज़्यादा कुछ को इधर कुछ को उधर तैनाती दी जा सकती है और कुछ को बर्खास्त. लेकिन कोई भी सरकार कितनों को बर्खास्त करेगी और कितनों को ट्रांसफर? आखिर में ये मामले अक्सर कोर्ट की दहलीज पर ही पहुँचते हैं जहां कांग्रेस के एजेंट सरकार को मुंह चिढ़ा देते हैं.

ऐसे ही अत्यंत दुरूह तथा खतरनाक हाथों में मोदी ने बहुत से अच्छे निर्णय लिए, नियम बनाये तथा बड़े अपराधियों की जांच करा कर उन्हें कानून के कटघरे में खड़ा किया लेकिन न्यायपालिका ने मोदी सरकार के इन कामों पर पानी फेर दिया. उदाहरण के लिए सोनिया राहुल, चिदंबरम, कपिल सिब्बल, चिदंबरम के बेटे के मुकदमो में देश की न्यायपालिका ने अपराधियों को भरपूर सहुलियते उपलब्ध कराई. इसी प्रकार के अन्य बहुत से केस और भी हैं.

बहुत से लोग अक्सर अध्यादेश के जरिये कुछ विषयों का समाधान चाहते हैं. उन्हें जान लेना चाहिए कि राज्य सभा में कोई भी अध्यादेश या कानून तभी पास हो सकता है जब उसमें कांग्रेस तथा कांग्रेस के समर्थक दलों की सहमति शामिल हो. अब जिन विशेष मुद्दों पर कांग्रेस कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार का विरोध कर रही है उन्हीं मसलों पर अध्यादेश कांग्रेस और उनके समर्थक राजनीतिक दल राज्य सभा में कभी पास नहीं होने देंगे.

राष्ट्रवादी समाज से निवेदन है कि किसी भी समस्या या मुद्दे पर राय बनाते समय सबसे पहले भारत के वर्तमान राजनीतिक तथा जमीनी हालातों का बारीक तथा ज़मीनी सटीक आंकलन अवश्य कर लिया करें. लोकसभा, राज्य सभा, कानून तथा विधेयक पास होने के तरीके तथा नियम, लोकसभा तथा राज्य सभा की ताकत, राज्य सभा के अधिकार, संसदीय समितियों की ताकत, पक्ष विपक्ष जैसे सामान्य विषय छात्रों को हाई स्कूल के स्तर तक की पढ़ाई में सिविक्स नाम के अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ा दिए जाते हैं. कम से कम इस प्राथमिक जानकारी का ही हमें अवश्य संज्ञान लेना चाहिए ताकि विषयों को सटीकता के साथ समझा जा सके.

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