क्यों भ्रष्टाचार के चक्र से बाहर नहीं निकल पाते हम

कई बार भ्रष्टाचार के विषय पर लिख चुका हूँ, फिर भी, किसी ना किसी विषय के बहाने लोग भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते रहते हैं।

उठाना भी चाहिए, लेकिन उनके समाधान को पढ़कर दुःख होता है। वे सब मानते है कि बस एक कड़ा कानून बन जाए, नेताओ और IAS अफसर लॉबी का निर्यात कर दो, समस्या कुछ दिन में हल हो जाएगी।

एक मित्र आँखों देखी बतलाते हैं कि “लड़का कार चलाते हुए मोबाइल पर बात करते हुए जा रहा था… लेकिन मेरे ठेले से छुपकर खड़ी ट्रैफिक की तेज़-तर्रार महिला हवलदार की नजरों से बच नहीं पाया। मैड़म ने कार सड़क किनारे लगवाकर उसे चालान की धौंस दिखाते हुए ठेले के पीछे ले आई… बोली- रे छोरे तन्ने बेरा से कितणे का चालाण होवै से? बोल के चाहवे है रास्ता निकाड़ेगा या चालान बनाऊँ। लड़के ने बगैर टेंशन लिए 200 रूपए का नोट मैड़म को पकड़ाया और चलता बना… मैड़म मुझे देखकर मुस्कराते हुए कहा- के करें भाई रास्ता निकालना पड़ता है।”

कौन सा कड़ा कानून इस भ्रष्टाचार को मिटा देगा?

कौन लागू करवाएगा?

क्या गारंटी कि वह लागू करवाने वाला भी पुलिस से अपना हिस्सा लेकर मामला रफा-दफा करेगा?

क्या भ्रष्टाचार उस एक ‘कड़क आदमी और औरत’ या लोकपाल की कमी के कारण हो रहा है?

क्या ऐसी खबरें नहीं आई हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के माननीयों ने घूस ली? क्या गारंटी कि वह ‘कड़क आदमी या औरत’ और लोकपाल भी भ्रष्ट ना निकल जाए। अभी जहां 1000 रूपए की घूस का रेट है वहां लोकपाल का भी पैसा लग जाएगा और वह घूस बढ़कर 1500 रूपए हो जाएगी।

टॉप दस भ्रष्ट लोगों को हटाना तो पुराने जोक की तरह हो गया कि एक सर्वे में पाया गया कि ट्रेन का आखिरी डब्बा डिरेलमेंट में पटरी से उतर जाता है। तो क्यों ना हर ट्रेन का आखिरी डिब्बा निकाल दिया जाए।

हम लोग शायद कहीं ना कहीं अपने अंदर यह महसूस करते हैं कि भ्रष्टाचार हमारी नसों में घुस गया है। लेकिन हम उस तथ्य को स्वीकार करने से हिचकते हैं।

कोई भी नवयुवक और नवयुवती, जो सरकारी नौकरी में आना चाहते हैं, उनसे मेरा एक प्रश्न है। दिल पर हाथ रख कर बतलाएं कि उनके परिवार वाले और वह स्वयं सरकारी नौकरी क्यों ज्वाइन करना चाहते हैं? क्यों पीएचडी करे हुए लोग एक सफाई कर्मचारी या चपरासी की नौकरी के लिए भी मरने मिटने को तैयार है? क्या सिर्फ कुछ हज़ार के वेतन के लिए?

जिन देशों में भ्रष्टाचार के लिए कड़ी सजा है, यहां तक कि मृत्युदंड भी, क्या वहां भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है? क्या चीन, सऊदी अरेबिया, ईरान इत्यादि देशों में कोई भ्रष्टाचार नहीं है?

ऐसी क्या बात है कि पूर्व की सरकारों ने भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाए? क्योंकि भ्रष्टाचार के द्वारा जहां एक जूनियर कर्मचारी कुछ सौ रुपए कमाता है, वही उच्चाधिकारी और उनसे भी बढ़कर राजनीतिज्ञ और बड़े बड़े उद्योगपति अरबों कमा ले जाते हैं।

एक तरह से संस्थागत भ्रष्टाचार में सभी का हित निहित हो गया था। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए हम कोसेंगे, नारे देंगे, और जब उन नारों के द्वारा सरकारी नौकरी या सत्ता में आ जाएंगे तो स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाएंगे।

आखिर ऐसा क्यों होता है और क्यों हम भ्रष्टाचार के सर्किल या चक्र से बाहर नहीं निकल पाते?

हमारा अनुभव प्रतिदिन के व्यवहार से – जिसमें प्रत्यक्ष रूप से सरकारी तंत्र उपस्थित नहीं है – से निर्धारित होता है; सरकार तो बाद में आती है।

उदहारण के लिए, सब्जी-फल खरीदना, जिसमें काँटा मार दिया जाता है या सड़े-गले फल पकड़ा दिए जाएं, टैक्सी या ऑटो मीटर से ना चले, कुली चौगुने पैसे मांगे, प्राइवेट डॉक्टर जानबूझकर महंगा इलाज करे, दो वकील आपस में मिलकर क्लायंट को बेवक़ूफ़ बनाये, ज्वेलर 22 कैरट का कहकर 14 कैरट का सोना पकड़ाए, हलवाई मिठाई डब्बे के साथ तौल दे या मिठाई में रंग मिला दे, इत्यादि शामिल हैं. ऐसे अनेक उदहारण हैं, जिनमें सतही रूप से सरकार का कोई रोल नहीं है।

लेकिन फिर भी इन सभी भ्रष्टाचार में सरकार का ही रोल है जो अप्रत्यक्ष है, सामने दिखाई नहीं देता।

उदहारण के लिए, लखनऊ के गोमती नगर का विपुल खंड कमर्शियल है। केवल दुकान या ऑफिस की बिल्डिंग बनायी जा सकती है। लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) इन बिल्डिंग्स में बेसमेंट बनाने की अनुमति नहीं देता है, लेकिन फिर भी सभी प्लाट पर एक-एक कमर्शियल बिल्डिंग में बेसमेंट बना है जिसके लिए LDA को दो लाख रुपये की घूस दी गयी होगी। फिर हर वर्ष LDA का बाबू, बिजली और सेल्स टैक्स (अब GST) वाला उस गैरकानूनी बेसमेंट के लिए घूस मांगने आ जाता है, जो उन्हें देना पड़ता है।

अब बिज़नेसमैन को पता है कि बेसमेंट अवैध है, लेकिन वह तब भी कुछ अधिक लाभ के लालच में बनवाता है. और उस एक ग़ैरक़ानूनी हरकत के कारण उसे हर वर्ष घूस देनी पड़ती है जिसे वह ग्राहकों से बिना बिल और सरकार को बिना टैक्स दिए वसूलना चाहता है। उस ग़ैरक़ानूनी कार्य – बिना बिल के माल बेचने – की कीमत पुनः घूस देकर चुकानी होती है। लेकिन इस प्रक्रिया का लाभ ऑनलाइन वाले उद्यमी उठा ले जाते हैं क्योंकि उनका हर लेन-देन क़ानूनी होता है।

इलाहबाद के चौक, लखनऊ के अमीनाबाद, गोमती नगर इत्यादि में दुकानदार, सब्जी वाला इत्यादि पब्लिक स्पेस जैसे कि कॉरिडोर, फुटपाथ का अतिक्रमण – जैसे कि माल को दुकान की चौखट के आगे तक फैलाना – कर के बैठे है, जिसकी सज़ा उन्हें पुलिस, नगर निगम और टैक्स वालों को घूस देकर चुकानी पड़ती है।

परिणाम क्या होता है? हम सरकार को भ्रष्टाचार के लिए दोष देते है, भ्रष्टाचार समाप्त ना होने का रोना रोते है, लेकिन स्वयं अपने व्यवहार को सुधारने का प्रयास नहीं करते।

अगर किसी के साथ भी एन्टी करप्शन टीम कर दी जाए तो शाम तक वह व्यक्ति 100 भ्रष्टाचार पकड़वा देंगे। इसमें कोई संदेह नहीं।

लेकिन उसके बाद क्या होगा? अगले दिन यही व्यक्ति अपनी टीम के साथ स्वयं वसूली शुरू कर देगा।

क्या वह व्यक्ति अपनी टीम के साथ विपुल खंड के दुकानदारों को बोलेगा कि अपना बेसमेंट तुड़वाओ या उसमे सीमेंट भरवाओ? या दुकानदारों को अतिक्रमण हटाने की सलाह देगा?

सरकार को उसके काम-काज के लिए दोष दीजिये। लेकिन आप का उस भ्रष्टाचार में स्वयं क्या रोल है, कभी उस पर भी शांत मन से विचार कीजिये।

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