घुन हैं ये, घुन… चाटे जा रहे हैं देश को

सुनने में आ रहा है कि सरकारी बाबू लोग भी सरकार से नाराज़ हैं। इनमें से उत्तर प्रदेश के बहुत ज्यादा हैं। कह रहे हैं कि मायावती से लेकर अखिलेश सरकार तक मज़े थे… उन्होंने खूब मौज कराई

कैसे करे मज़े ये हाल देखिए…

इधर सारे खातों और सरकारी खर्चों की जांच चल रही है। जोर शोर से CAG भी लगा हुआ है।

CAG ने बताया है कि मायावती से लेकर अखिलेश सरकार ने जबर return gift दिया है इन कर्मचारियों को… और ये return gift अब यूपी में योगी सरकार के गले में पड़ने जा रहा है…

मामला कुछ यूँ है…

दिसम्बर 2003 – जनवरी 2004 में नई पेंशन स्कीम को लागू करने की योजना आई और मार्च 2005 में UPA सरकार लाई देश में नई पेंशन व्यवस्था…

UPA सरकार को SP और BSP का समर्थन प्राप्त था। 2005 में मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुखिया थे और 2007 में मायावती आईं, 2012 में अखिलेश आए…

नई व्यवस्था के तहत कर्मचारियों को अपनी बेसिक सेलरी और महंगाई भत्ते का दस प्रतिशत अंश देना पड़ता है। इतनी ही धनराशि राज्य सरकार भी देती है। इस प्रकार कर्मचारी और सरकार दोनों के अंश को नेशनल सिक्योरिटीज़ डिपोज़िटरी लिमिटेड (NSDL) खाते में रखने की व्यवस्था है।

जांच में सामने आया कि नई पेंशन योजना के तहत उत्तर प्रदेश में कर्मचारियों के वेतन से 2005 से 2008 तक हुई कटौती की धनराशि का ब्यौरा ही उपलब्ध ही नहीं है!

कैग ने वर्ष 2018 की रिपोर्ट नंबर एक में कहा है कि यह पता ही नहीं चल सका है कि कितनी धनराशि सरकार ने काटी और कितना अंशदान सरकार ने किया। ब्यौरा उपलब्ध न होने से यह भी पता चला कि अगर कटौती हुई तो उससे अर्जित धन एनएसडीएल में भी नहीं मिल रहा है।

नई स्कीम के तहत कर्मचारियों के वेतन से हुई कटौती और राज्यांश का निवेश करने की बात है। कर्मचारियों के रिटायरमेंट पर मार्केट में शेयर की कीमत के हिसाब से लाभ मिलना है। मगर वर्ष 2005 से 2008 के बीच कितनी धनराशि का निवेश हुआ यह भी नहीं पता चल सका।

कैग की पड़ताल में पता चला कि वर्ष 2008-09 के बीच सरकारी कर्मचारियों की पेंशन के लिए वेतन से 2830 करोड़ रुपये की कटौती हुई। इसके बदले में सिर्फ 2247 करोड़ रुपये राज्य सरकार ने अंशदान किया। बाकी कहाँ गया पता ही नहीं…

खास बात है कि कर्मचारी और सरकारी अंश मिलाकर 2008-09 से लेकर 2016-17 के बीच कुल 5660 करोड़ रुपये जुटे। इसमें से सिर्फ 5001.71 करोड़ रुपये ही सरकार ने पेंशन वाले खाते में भेजे। 545.68 करोड़ रुपये भेजा ही नहीं गया। बाकी कहाँ गया, पता ही नहीं…

कैग ने रिपोर्ट में कहा कि सबसे गंभीर बात रही कि 2015-16 में कर्मचारियों का अंश 636.51 करोड़ था, लेकिन 2016-17 में खाते में 199.24 करोड़ ही गया… तो लगभग 450 करोड़ कहाँ गए… पता ही नहीं… जबकि न इतने कर्मचारी निकले, न मरे, न रिटायर हुए…

मायावती सरकार ने तो सरकारी अंश दबाया था… लेकिन अखिलेश यादव सरकार ने तो कर्मचारियों का अंश भी दबा दिया…

इससे पता चलता है कि जबर का return गिफ्ट दिया है बुआ और बबुआ की सरकारों ने… और हाँ, ये मामला बिना सरकारी कर्मचारियों के मिली भगत के हुआ हो ऐसा सम्भव हो नहीं सकता, क्योंकि कलम और फाइल इनको ही चलानी है…

कुल मिला के मामला ये है कि 2005 से 2017 तक की सरकार के नेताओं और कर्मचारियों ने पेंशन के पैसे खा लिए मिल बांटकर… इनको मालूम है कि जब भी कोई सरकार आएगी धरना-प्रदर्शन, रोना-धोना करके, वोट न देने की धमकी देकर कैसे भी पेंशन बनवा लेंगे… तो अंशदान तो लूटा ही, और आगे हल्ला मचा के एक्स्ट्रा भी लूटेंगे।

घुन हैं ये, घुन… चाटे जा रहे हैं देश को… कोई धरना प्रदर्शन करते हों इस मामले को लेकर, तो पब्लिक को मिलकर इनको कूटना चाहिए…

सोचें, कौन होगा अरबों रुपयों के इस खेल को चलाने वाला बुद्धिमान और शक्तिशाली आदमी

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