सरसंघचालक भागवत का उदबोधन और ‘Rashomon’ का सत्य

मै समझता हूँ कि आरएसएस के सरसंघचालक पूजनीय मोहन भागवत जी द्वारा पिछले तीन दिनों में कही बातों पर जितनी चिंतनीय, आलोचनात्मक किंतु पठनीय प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर उपस्थित अग्रज संघियों, भाल पर हिंदुत्व दमकाये चक्रवर्तियों और इस्लाम के बाल की खाल निकालने वाले अध्येताओं की आई हैं, उतनी आरएसएस के विरोधियों की तरफ नहीं आई है।

इसका कारण शायद यही है कि आरएसएस के विरोधियों को यह स्पष्ट है कि भागवत जी ने ‘वाकई’ क्या कहा है और इनको किस ‘संघ’ से अपने अस्तित्व को भविष्य में बचाना है।

वहीं पर आरएसएस या उसकी विचारधारा के समर्थक के रूप में पहचाने जाने वालों को बदले सुर व ताल में यह स्पष्ट नहीं है कि भागवत जी ने वाकई क्या और क्यों कहा है।

जहां तक मेरे समझने की बात है तो मुझे लगता है कि मैं व्यक्तिगत रूप से इस सब से संतुष्ट हूँ। मैं यहां कोई भी बात पूर्ण स्पष्टता से नहीं करूँगा और न ही प्रश्नों के कोई उत्तर दूंगा लेकिन अपनी बात समझाने के लिये एक लंबी कहानी सुनाता हूँ और मेरा मानना है कि सारे प्रश्न व उत्तर इसी में छिपे है।

जापान के विश्वविख्यात फ़िल्म निर्देशक अकीरा कुरोसावा की 1950 में एक फ़िल्म रेशोमॉन (Rashomon) आयी थी जिसको विश्व की महानतम फिल्मों में गिना जाता है। यह फ़िल्म एक ऐसी कहानी कहती है जिसमें एक हत्या की घटना के तीन भागी अपने अपने, अलग अलग सत्य को बताते है लेकिन उसके बाद भी सत्य कहीं और होता है।

फ़िल्म की शुरुआत रेशोमॉन शहर के दरवाज़े से होती है, जहां बारिश से बचने के लिये, ओट लिये, एक लकड़हारा किकोरी और एक पुरोहित ताबि होशी बैठे है और वहीं पर एक अन्य आदमी भी बारिश से बचने के लिये आ जाता है।

उस आदमी को लकड़हारा बताता है कि तीन दिन पहले उसने जंगल में एक समुराई(जापानी सैन्य वर्ग) की लाश देखी थी, जिसकी सूचना उसने शहर के अधिकारियों को दे दी थी।

पुरोहित बताता है कि जिस दिन हत्या हुई थी, उसी दिन उसने समुराई और उसकी पत्नी को उस दिशा में जाते हुये देखा था।

पुलिस उस समुराई की हत्या के आरोप में तजोमरु नाम के एक लुटेरे को गिरफ्तार करती है जो यह तो स्वीकारता है कि उसकी समुराई से भिड़ंत हुई थी लेकिन उसने उसको छोड़ दिया था।

पुलिस लकड़हारे और पुरोहित को गवाही देने के लिये अदालत में बुलाती है।

वहां लुटेरा तजोमरु बताता है कि प्राचीन तलवारों के लालच में समुराई को उसने धोखे से पेड़ में बांध दिया था। फिर उसने समुराई की पत्नी का बलात्कार करने का प्रयास किया लेकिन उसने एक कटार से अपनी आत्मरक्षा की थी।

अंत में वो (लुटेरा) उसको लुभाने में सफल हो गया और उसके साथ संसर्ग किया। संसर्ग के उपरांत लज्जा का अनुभव कर रही समुराई की पत्नी ने उससे अनुनय की, कि वो उसके पति को बंधन से मुक्त कर दे और पति से मृत्यु तक द्वंद करे ताकि वो दो व्यक्तियों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने की हीनता से मुक्त होकर, विजेता की स्त्री बन सके।

उसने फिर सम्मान के लिये, समुराई को बंधन मुक्त कर के द्वंद किया जिसके अंत में वो विजित हुआ था। लेकिन जब वह जीता तब समुराई की पत्नी वहां से भाग गयी।

अदालत तजोमरु से पूछती है कि समुराई की पत्नी के पास जो कीमती कटार थी वह कहां है? तो वो बताता है कि समुराई की पत्नी को ढूंढने के प्रयास में उसको उस कटार का ध्यान ही नही रहा और उसको उस कीमती कटार के गुम हो जाने का दुख है।

इसके बाद समुराई की पत्नी को गवाही के लिये बुलाया जाता है और वो एक दूसरी कहानी बताती है। वो बताती है कि लुटेरा तजोमरु ने उसके साथ बलात्कार किया और उसके बाद वह वहां से चला गया था।

उसने अपने पेड़ से बंधे समुराई पति से लुटेरे के द्वारा जबरदस्ती किये गये संसर्ग के लिये क्षमा मांगी लेकिन पति उसकी तरफ वितृष्णा की दृष्टि से ही देखता रहा। उसने अपने पति को बंधन से मुक्त किया और बारबार उनसे विनती की कि वो (समुराई) उसको मार डाले ताकि उसको शांति मिल सके।

इसके बाद भी उसके पति की आंखों में उसके लिये घृणा के ही भाव रहे जिसको वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और कटार को हाथ में ही लिये हुये बेहोश हो गयी थी। जब उसको होश आया तो उसने अपने समुराई पति को मरा पाया और उसकी छाती में वह कटार घुसी हुई थी। उसके बाद उसने कई बार आत्महत्या की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हो पायी।

इन दोनों की गवाही के बाद एक माध्यम के द्वारा उस समुराई की आत्मा को बुलाया जाता है और अदालत उससे सत्य पूछती है। समुराई की आत्मा बताती है कि लुटेरे तजोमरु ने उसकी पत्नी का बलात्कार किया, फिर उसको (पत्नी को) उसके साथ चलने को कहा था।

उसकी पत्नी ने लुटेरे के इस निवेदन को स्वीकार करते हुये यह शर्त रखी कि लुटेरा तजोमरु पहले उसके समुराई पति की हत्या करे ताकि वह दो पुरुषों की स्त्री के होने के अपराधबोध से मुक्त हो जाये।

समुराई की आत्मा आगे कहती है कि उसकी पत्नी की बात सुनकर तजोमरु को झटका लगा और उसने मेरी पत्नी को जकड़ कर, मुझसे या तो पत्नी को जाने देने को कहा या फिर उसकी हत्या करने के लिये कहा।

मैं तजोमरु के इस कथन पर ही उसके सभी अपराधों के लिये क्षमा करता हूँ। लेकिन मेरी पत्नी, पकड़ छुड़ा कर भाग निकली और तजोमरु उसको पकड़ने के लिये उसके पीछे भाग गया। उसके बाद मैंने अपनी पत्नी की छोड़ी गई कटार को अपने सीने में मार कर आत्महत्या कर ली लेकिन फिर बाद में कोई मेरी लाश से कटार निकाल कर ले गया था।

इस कहानी को सुनने के बाद वह नवांगतुक आदमी बोलता है कि तीनों ही दिये गये साक्ष्य असत्य लगते हैं। इस पर लकड़हारा कहता है कि वह इस बलात्कार व हत्या की घटना का प्रत्यक्षदर्शी था लेकिन कानूनी झंझट से बचने के लिये इस पर मौन रहा था।

अब लकड़हारा आंखों देखी बताते हुये कहता है कि यह सही है कि लुटेरे तजोमरु ने समुराई की पत्नी से विवाह करने की विनती की थी लेकिन पत्नी ने उसकी अनसुनी कर के द्वंद के लिये अपने पति को बंधन मुक्त किया था।

समुराई शुरू में अपनी शीलभंग हुई पत्नी के लिये जान जोखिम में नही डालना चाहता था और उसने तजोमरु से लड़ने को भी मना कर दिया था। इस पर पत्नी ने दोनों को उलाहना दिया कि समुराई और तजोमरु दोनों ही यथार्थ में पुरुष ही नहीं है, यदि इनमें पुरुषत्व होता तो वे अपनी स्त्री के लिये द्वंद करते।

उसकी बात सुनकर समुराई और तजोमरु दोनों ने वार करने लिये अपनी तलवारें उठा ली जिसे देख, पत्नी ने डर के मारे अपना मुंह छुपा लिया था। वे दोनों प्राणों के लिये डरे हुये, बचते बचाते हुये द्वंद करने लगे।

भाग्य से इस द्वंद को तजोमरु जीता और फिर हिचकिचाते हुये ज़मीन पर गिरे समुराई को, जो अपने प्राणों की भीख मांग रहा था, मार डाला। यह देख कर पत्नी भाग गयी और तजोमरु उस को नहीं पकड़ पाया। अंत में तजोमरु समुराई की तलवार लेकर वहां से चला गया था।

लकड़हारा, पुरोहित और वह नवांगतुक बात ही कर रहे थे कि उन्हें एक बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई देती है। उन्हें झाड़ी में, एक डलिया में नवजात शिशु मिलता है जिसके साथ एक किमोनो (जापानी परम्परागत पहनावा) और एक तावीज रखा हुआ था।

नवांगतुक नज़रे बचा कर जब इन सामानों को उठाता है तो लकड़हारा उसको चोरी के लिए लताड़ता है।

इस पर वो लकड़हारे से कहता है कि एक चोर दूसरे को चोर कह रहा है? मैं जान गया हूँ कि क्यों तुमने अदालत को नहीं बताया कि घटना के तुम प्रत्यक्षदर्शी हो। सत्य यह है कि समुराई की पत्नी की जिस कीमती कटार के गुम होने की बात हो रही है, वह तुमने तजोमरु के जाने के बाद, वहां से चुरा ली थी।

फिर वहां से जाते हुये कहता है कि यह कोई नई बात नही है हर व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिये ही प्रेरित होता है।

इतना छल, झूठ और कपटता को देख और सुनकर पुरोहित का मानवता के प्रति विश्वास उठ जाता है और उसकी आस्था डगमगा जाती है। तभी लकड़हारा, पुरोहित से वह बच्चा मांगता है और कहता है कि वह इस त्यागे हुये बच्चे को, अपने अन्य छह बच्चों के साथ पुत्रवत पालना चाहता है।

अब पुरोहित, लकड़हारे की कही कहानी व उस कीमती कटार की चोरी को एक नये प्रकाश में देखने लगता है। वो बच्चे को लकड़हारे को देते हुये कहता है कि ‘लकड़हारे, तुमने मुझमें आशा का संचार किया है। मेरा विश्वास व आस्था दोनो ही सुदृढ़ हुये हैं’।

यहां मेरे लिये प्रश्न था कि जो सुनाया और समझा गया है क्या वही सत्य है? या फिर हम सबने अपने अपने सत्य को समझाया है?

मैं पुरोहित को देख रहा हूँ। उसकी तरह मैंने भी जो सुना व समझा उसको नये प्रकाश में न सिर्फ देख रहा हूँ, बल्कि अपने विश्वास और आस्था को लेकर और सुदृढ़ हो गया हूँ।

ऐसे मुसलमान अच्छे या हिन्दू नामधारी वामी!

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