संघ को जानो भाग-1 : संघ क्यों?

1925, विजयादशमी और परम् पूज्यनीय डॉ साहब। संघ के बारे में ये तीन बातें हम सभी जानते हैं! पर जो नहीं जानते वो है संघ की ही आवश्यकता क्यों पड़ी! ‘संघ को जानो’ लेखमाला के इस प्रथम भाग में हम इसी पर चर्चा करेंगे।

भारत पर प्रथम आक्रमण लगभग 520 ईसा पूर्व हुआ। फिर उत्तरोत्तर आक्रांता आते रहे। कभी यौधेयों ने तो कभी कठों ने इन्हें पवित्र भारत भूमि से खदेड़ बाहर किया।

326 ईसा पूर्व में यहां अलेक्जेंडर का आक्रमण हुआ। उसको भी चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने सीमांत प्रदेशों के साथ मिल कर रोक लिया। दुनिया भर में उसने शासन किया पर यहां वो गंगाजी पार नहीं कर सका।

इसी तरह शक, हूण, कुषाण और मुस्लिम आक्रांता आते रहे पर भारतवंशियों ने किसी को भी इस पवित्र भू को अपवित्र नहीं करने दिया।

पर एक समय ऐसा भी आया जब गजनवी, नादिरशाह, बाबर जैसे लुटेरों ने भी हमारी मातृभूमि को आतंकित किया और हम उन्हें रोकने में असफल रहे। यहां तक कि गुलामों ने हम पर शासन किया।

ये लोग ऊंटों की सवारी करने वाले अनपढ़ जाहिल आये और हमारे साहित्य को आग लगा गये। कहते हैं नालंदा का पुस्तकालय लगातार 6 महीनों तक धू धू कर जलता रहा। अनेकानेक पुस्तकें हमेशा के लिये इतिहास हो गयीं।

हमारी महिलाओं के साथ इन्होंने बलात्कार किये। उन्हें अपने हरम में सजा कर रखा। हमारे बच्चों को गुलाम बनाया। और हम कुछ न कर सके।

पराभव का ये दौर पूरे हजार वर्ष तक चला। पहले मुस्लिम आक्रांता आये, फिर डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज। इन मुठ्ठी भर लोगों ने सालों साल हमें पददलित किया।

परम् पूज्यनीय डॉ. साहब ने इस पर चिंतन मनन किया! आखिर क्या कारण है कि जिन लोग ने दिमत्रीयस अलेक्जेंडर और सेल्युकस को खदेड़ दिया वो लोग गजनवी और बाबर जैसे टुटपुंजियों से हार गये?

क्या हम वीर नहीं? या हम कायर थे?

जिन लोगों की शिराओं में श्रीराम का रक्त बह रहा हो वो संतति कायर तो नहीं हो सकती! महाराणा प्रताप, वीर शिवा के वंशज हैं हम। वीरता पोर पोर में बसती है हमारे। फिर भी हम गुलाम बन गये। कैसे? क्यों?

इन प्रश्नों का एक ही उत्तर सामने आया। और वो था संगठन की कमी! हिंदुओं में एकता का न होना!

पहले हम एकत्रित थे। एक होकर हमने दुश्मनों का सामना किया और उन्हें खदेड़ दिया। पर बाद में विधर्मियों ने येन केन प्रकारेण हम भाइयों में फूट डलवाई और अपना सिंहासन सुरक्षित किया।

इस फूट को दूर कैसे किया जाये? सभी भाइयों को एक कैसे रखा जाये? विधर्मियों से अपनी मातृभूमि की रक्षा कैसे की जाये? अपने राष्ट्र को पुनः परम वैभवशाली कैसे बनाया जाये?

इसका एक ही जवाब था कि कोई ऐसा संगठन बनाया जाये जो बिना किसी भेदभाव के समस्त वर्गों को साथ लेकर चल सके।

हालांकि कांग्रेस भी एक विकल्प था किंतु तत्कालीन नेतृत्व वर्ग विशेष के तुष्टिकरण में इतना लीन था कि उसे राष्ट्र के हित अनहित की चिंता ही नहीं थी।

खिलाफत आंदोलन में भारत की शक्ति को झोंकना। वन्देमातरम का विरोध। विश्व युद्ध में ब्रिटेन की मदद। अहिंसा के खोखले प्रयोग। प्रचंड जनसमर्थन के बावजूद अपने सफल होते आंदोलन को वापस लेना। ये सब ऐसे मुद्दे हैं जहां उनकी अदूरदर्शिता दृष्टिगोचर होती है। इन सब से तो राष्ट्र पुनः गौरव प्राप्त करने से रहा।

अतः एक नये संगठन की नींव रखी गयी। जिसका एकमात्र उद्देश्य यहां के नागरिकों को एकत्रित करना और उन्हें देश की एकता व अखण्डता लिये समर्पित करना था। आज 93 वर्ष बाद भी संघ इसी के लिये कृतसंकल्पित है।

संघ का विस्तार कश्मीर से कन्याकुमारी तक, गुजरात से सुदूर पूर्वोत्तर तक फैला है। वहां मौजूद अलगाववादियों से हमारी लाठियां बात करती हैं। हज़ारों हज़ार स्वयंसेवक इस मातृभूमि की सेवा का बीड़ा उठाये हुये हैं। वो पौधा जो पूज्य डॉ साहब ने बोया था आज वट वृक्ष बन चुका है। मुझे गर्व है मैं इस वट वृक्ष की एक छोटी सी टहनी हूँ !

क्रमश:

स्वतंत्रता आन्दोलन में संघ का योगदान

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