‘धर्म निरपेक्षता’ का छद्म मुखौटा सही है अथवा पीड़ितों की भावनाओं की कद्रदानी?

आतंकवादियों द्वारा श्रीनगर दूरदर्शन के पूर्व निदेशक और मेरे सहयोगी व मित्र रहे लस्सा कौल की उनके घर (बेमना) के बाहर की गई निर्मम हत्या या फिर मेरे दूर-पास के सम्बन्धी रहे स्वर्गीय बालकृष्ण गंजू की अपनी जान बचाते हुए चावल के ड्रम में आतंकियों द्वारा बर्बरतापूर्वक की गई हत्या आदि, ऐसी जघन्य घटनाएं हैं जो जाने क्यों हमारे बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों को तनिक भी विचलित नहीं कर पाईं।

कश्मीरी पंडितों के साथ हुई ऐसी अनेक हृदय-विदारक घटनाओं को इन ‘बंधुओं’ ने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया। इन घटनाओं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं, प्रेस-क्लब में कोई विरोध-सभा नहीं,कोई कैंडल-मार्च नहीं, टीवी चैनल्स पर कोई डिबेट नहीं। विरोध स्वरूप-पुरस्कार/अवार्ड वापस भी नहीं।

कश्मीरी-पंडित-समुदाय को मीडिया के इस ‘द्वैत भाव’ की हमेशा खलिश/नाराज़गी रहेगी। मन पूछता है कि अख़लाक़ पर मीडिया ने जो जमीन-आसमान एक किया वह लस्सा कौल, टीकालाल टप्लू, सरला भट्ट, बालकृष्ण गंजू, सर्वानन्द कौल प्रेमी आदि की जघन्य हत्याओं पर क्यों नहीं?

बाल कृष्ण गंजू कश्मीर के दूरसंचार विभाग में काम करने वाले एक युवा इंजीनियर थे। इनकी 22 मार्च 1990 को जिहादी/आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। उन्हीं की याद में दिल्ली में बीएसएनएल कॉलोनी में पार्क बनाया गया है।

सुना है,जब इस पार्क और स्व० बालकृष्ण गंजू की मूर्ति के अनावरण के लिए आयोजकों ने तत्कालीन सत्ताधिकारियों से निवेदन किया, तो कोई भी नेता, मंत्री अथवा समाज-सेवी इस काम के लिए राज़ी नहीं हुआ। शायद उनकी “धर्मनिरपेक्षता” की छवि ऐसा करने से दांव पर लग जाती!

तारीफ़ करनी पड़ेगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी की, जो उस समय सांसद थे, जिन्होंने प्रसन्नतापूर्वक आयोजकों के अनुरोध को स्वीकार किया और पार्क/मूर्ति का उद्घाटन/अनावरण किया।

पूछा जा सकता है ‘धर्म निरपेक्षता’ का छद्म मुखौटा सही है अथवा पीड़ितों की भावनाओं की कद्रदानी?

ऐसे ही 14 सितम्बर को कश्मीरी-पंडित-समुदाय ने विश्वभर में बलिदान-दिवस मनाया। जगह-जगह पंडितों की कई सारी प्रमुख सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थाओं ने जनसभाएं आयोजित कीं। जुलूस और कैंडल-मार्च निकाले। कवियों, गायक-कलाकारों आदि ने इस अवसर पर अपनी बिरादरी के सैंकड़ों शहीदों की स्मृति में हिंदी, कश्मीरी, उर्दू और अंग्रेज़ी कविताएँ पढ़ीं और गीत गाए। रंगकर्मियों ने लघु-लोकनाट्य मंचित किए। सड़कों पर नुक्कड़ नाटक खेले गये। शहीदों की याद में दो मिनट का मौन भी रखा गया।

समुदाय के नेताओं ने शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कश्मीर के अलगाववादियों, जिहदियों, आतंकवादियों, छद्म बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारवादियों और वर्तमान सरकार सहित तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं को पंडितों के दुःख-दर्द की अनदेखी करने के लिए आड़े हाथों लिया।

दरअसल, पंडित-समुदाय की अपनी कुछ सीमाएं हैं। काश गुर्जरों, जाटों, राजपूतों आदि की तरह कश्मीरी पंडितों का भी अपना एक अलग वोट-बैंक होता! तब शायद ये हर साल के शोक दिवस, बलिदान दिवस आदि इस समुदाय को मनाने न पड़ते।

भावनाओं को उद्वेलित कर पंडितों के विस्थापन का मुद्दा वोट-प्राप्ति के लिए एक अच्छा जुगाड़ है अन्यथा न पहले वाली सरकारों को और न ही वर्तमान सरकार को पंडितों की कोई खास फिक्र है।

इधर, विस्थापन ने पंडितों को छितरा दिया, वोट-शक्ति भी कमज़ोर कर दी। कश्मीर के मूल बाशिंदे बिखर गए, चाहे किसी भी वजह से। आज़ादी चाहने वाले वहीं जमे हुए हैं, अपनी ज़मीन को मजबूती से थामे हुए। संख्याबल भी उनके साथ है। इसलिए कोई भी सरकार उनका कुछ बिगाड़ नहीं पा रही।

कहते हो कश्मीर तुम्हारा, तो फिर सरला किसकी बेटी थी?

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