सावधान! विष घोला जा रहा है आपके बच्चों के मस्तिष्क में पाठ्यक्रम के माध्यम से

यह छठी कक्षा की सिविक्स की किताब है। पहली मर्तबा सिविक्स से परिचय छठी में ही होता है। मेरा छोटा बेटा इसे पढ़ता है और मैंने आज इस किताब पर नज़र डाली है। मैं दंग रह गया हूँ।

दस साल की सोनिया सरकार ने हिन्दू समाज, जीवन, इतिहास पर मर्मान्तक प्रहार किए हैं। इसका पहला अध्याय है understanding diversity, जिसमें हिन्दू और मुसलमान समुदाय के दो बच्चे मिलते हैं। दोनों समीर हैं। हिन्दू समीर अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता है और मुसलमान समीर अखबार बेचता है। दोनों दोस्त बन जाते हैं फिर एकदिन मुसलमान समीर दुखी होकर कहता है कि मेरठ में दंगा फैल गया है। मेरे सारे रिश्तेदार वहीं रहते हैं। लोग मर रहे हैं। यानी, हिन्दू मुसलमानों को मार रहे हैं!

उसके बाद किताब जातिव्यवस्था पर ज्ञान देती है कि समाज ने काम के आधार पर जाति बांट दी और फिर वह नियमबद्ध हो गया। यानी कुम्हार का बेटा कुम्हार। मतलब यह कि हिन्दू समाज और धर्म बहुत रूढ़ है।

फिर पुस्तक विविधता की बात करती है। भौगोलिक विविधता का विवरण देते हुए लद्दाख और केरल का जिक्र किया गया है। लद्दाख की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की कोई चर्चा नहीं है। उसे फिलहाल चरवाहों की धरती माना गया है और केरल के बारे में कुछ इस तरह से विवरण दिया गया है कि वहां मसाले होते हैं। यहूदी और अरब यात्री पहले यहां आए। सेंट थामस दो हजार साल पहले आए और ईसाई धर्म शुरू किया। इब्नबतूता आए और लिखा कि वहां के मुसलमान बहुत सम्मानित लोग हैं। केरल में इसी विविध संस्कृति के कारण अलग अलग धर्मों के लोग रहते हैं जिसमें ईसाई, जुडाइज़्म और इस्लाम को पहले रखा गया है हिन्दू और बौद्ध नीचे हैं।

सेंट थामस और इब्नबतूता वास्कोडिगामा सबका जिक्र है। महान आदि शंकर के बारे में एक पंक्ति नहीं है। केरल स्कूल आफ मैथेमेटिक्स की चर्चा नहीं है। कैलकुलस के जनक माधव पर पुस्तक मौन है। सेंट थामस की चर्चा कर ये साबित किया गया है केरल के हिन्दू सदियों पहले ईसाई बने।

यूनिटी इन डायवर्सिटी की बात आगे बढ़ती है और वामपंथी संस्था इप्टा की एक दो टकिया कविता चेंप दी गई है।

दूसरा अध्याय डायवर्सिटी एंड डिस्क्रिमिनेशन है जिसमें भारतीय हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों के सिवा कुछ है ही नहीं। पुरुष महिला में विभेद, जातिगत विभेद, बार बार समीर का उदाहरण। अंबेडकर की कहानी है। इस देश की दूसरी महान विभूतियों पर एक शब्द नहीं है। अछूतोद्धार पर गांधी की विराट भूमिका का कोई उदाहरण नहीं है।

यानी, पूरे अध्याय में एक बच्चे का दिमाग धो डालने की सामग्री भर दी गई है। हिन्दू मतलब कुरीति, अन्याय, दंगाई, जातिवादी ही हो सकता है। प्राचीन भारत की नागरिक व्यवस्था पर एक शब्द नहीं है। कोई नैतिक शिक्षा नहीं। कोई उदात्त या महान गौरवशाली बात नहीं। यह किताब 2006 से पाठ्यक्रम में शामिल है। आप इस महाषड़यंत्र पर विचार कीजिए कि कांग्रेस ने दिया क्या है आपको। आपका बच्चा क्या पढ़ रहा है? निज धर्म निजराष्ट्र के प्रति क्या सोच रहा है?

आसान नहीं होता नरेन्द्र मोदी होना…

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