प्रेम तो कोई अपराध नहीं होता जी, वो किया नहीं जाता, हो जाता है

श्रीमान ‘लोटा’ जी के गाने जब हम सुनते थे तो वे भजन कम ग़ज़ल अधिक लगते थे। मेरी न मानिये तो एक बार गुलाम अली को सुनिये फिर लोटा जी सुनिये आपको समझ में आ जायेगा।

ग़ज़ल और भजन में क्या अंतर है यह कोई भी व्यक्ति समझ सकता है जिसे संगीत का थोड़ा सा भी ज्ञान हो। लोटा जी की ग़ज़लें भजन का चोला ओढ़कर हमें इसलिए पसन्द आती थीं क्योंकि उनमें कुछ नया होता था। ये भजन गाने का नया अंदाज़ था जो हमें अच्छा लगता था।

भजन का अर्थ भजने से है, अर्थात् मगन हो जाना। कहते हैं न कि ‘राम नाम भजो’ या ‘भज गोविन्दम्’। हम सबने हनुमान जी या मीराबाई के चित्र देखे होंगे। उनके हाथ में सदैव झान-मंजीरा या करताल देखा होगा।

हम लोग भी आरती के समय थाल या घण्टी बजाते हैं। ये कोई परिष्कृत वाद्य यन्त्र नहीं होते। जब व्यक्ति प्रभु का नाम भजता है तो उसमें लीन और मगन हो जाता है उसे सुधबुध नहीं रहती ऐसे में वह जिस धुन में गाता है उसमें किसी परिष्कृत वाद्य यंत्र की आवश्यकता नहीं होती।

आप ॐ जय जगदीश हरे उस धुन में गाइये जो पूरब और पश्चिम फ़िल्म में थी तो आपको हारमोनियम की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी। इसके पीछे आशय यह है कि गाकर भगवान को प्रसन्न करने के लिये बहुत बड़ा संगीतकार होने की आवश्यकता नहीं है। ठुमरी चैती होरी की भाँति भजन भी एक भाव प्रधान शैली है और भजन का भाव भक्ति ही हो सकता है।

इसीलिए लोटा जी की आवाज में ग़ज़ल रूपी भजन सुनकर हम कभी मगन या लीन नहीं हुए। वो तो बस सुनने में अच्छा लगता था और हमने अपने घरों में भजन गाना बन्द कर दिया था इसलिए लोटा जी हिट हो गए। अतः मैंने लोटा जी को कभी भजन गायक माना ही नहीं।

भजन अथवा श्लोक के शब्दों को शास्त्रीय गायन में ऊँचा स्थान देने वाले अनेक संगीतज्ञ हुए हैं। शास्त्रीय गायन से इतर भजन गायिका के रूप में अनुराधा पौडवाल ने अधिक प्रभावित किया। स्वर्गीय जगजीत सिंह जी की आवाज भी ग़ज़ल के लिए ही बनी थी उनके गाये भजनों ने भी कभी मोहित नहीं किया।

वास्तव में हमारे समाज में संगीत कला इत्यादि के बोध का इतना पराभव हो चुका है कि हमें समझ में ही नहीं आता कि किस भाव से किस शैली में क्या गाना उचित होगा। आजकल लोग कुछ भी सुनकर मुण्डी हिलाने लगते हैं।

एक ताज़ा उदाहरण देखिये। इंडियन आइडल में एक लड़के ने शफकत अमानत अली का गाना गाया- ‘मोरा सइंया मोसे बोले ना…’ इस गाने में उसने इतनी ज्यादा उतार चढ़ाव की हरकतें कीं जितनी वांछित नहीं थीं। ‘मोरा सइंया मोसे बोले ना’ एक दुःख भरा गीत है इसको प्रसन्न होकर हँसते हुए उतार चढ़ाव की हरकतें हुए नहीं गाया जा सकता। यह बेवकूफी है।

लेकिन इंडियन आइडल के पगलेठ जज खड़े होकर ताली बजा रहे थे। देश में टैलेंट हंट की यह स्थिति है। ऐसे में बिना पेंदी के लोटा जी ग़ज़ल जैसा भजन सुनाकर इतने सालों तक ताली पिटवा लिए तो कोई आश्चर्य नहीं। बाकि प्रेम तो कोई अपराध नहीं होता जी… वो किया नहीं जाता… हो जाता है…

जानिये आखिर किसके दबाव में बंद हुआ था प्रसिद्ध टीवी सीरियल वीर शिवाजी!

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