यह एक अलग शास्त्र है, जो कम से कम फिज़िक्स के फार्मूलों से नहीं समझा जा सकता

मेरे एक शुभचिंतक हैं, जिनका लड़का महानगर में कोचिंग चलाता है, कम्पीटिशन में सलेक्ट हुआ नहीं, इंटेलिजेंट तो था ही, तिस पर फिज़िक्स घोट कर पी गया।

पहले उसी कोचिंग में पढ़ाया जहां स्वयं पढ़ा था, फिर खुद का खोल दिया। 5 लाख तक मासिक कमाता है। विवाह की उम्र निकली जा रही है। परिवार वाले जब भी पूछते हैं, मना कर देता है।
कहता है “मोदीजी की तरह बनूँगा!”

विवाह आदि न करके, आरएसएस का प्रचारक बनकर देश की सेवा करूँगा। पहले जरा कुछ कमा लूँ। कोचिंग जम ही गया है तो थोड़ा बैंक बैलेंस और प्रोपर्टी खडी कर दूँ।
विगत 5-6 वर्षों से भूत की तरह कमाई कर रहा है। यद्यपि, कभी शाखा नहीं गया, डॉक्टर हेडगेवार की जीवनी नहीं पढ़ी, प्रार्थना और उसका भावार्थ भी याद नहीं।
मीडिया से जो जानकारी मिल गई, उससे यह निष्कर्ष निकाला है। हालांकि बहुत अच्छा निष्कर्ष निकाला है।

ऐसे अनेक लोग हैं जो सोचते हैं विवाह नहीं करना, मतलब प्रचारकी है! वे इस खुशफहमी में भी है कि हम मोदीजी की राह पर चल रहे हैं। घर वाले और मित्र भी, उसे देख मोदी मोदी कहते होंगे।
क्या प्रचारक बनना सरल है? सन्यासियों से भी कठिन जीवन है। कोई डिग्री नहीं, कोई बैंक बैलेंस नहीं। झोला और पहने हुए कपड़े अपने हैं, बस। आज यहाँ, कल पता नहीं कहाँ?

परतंत्रता इतनी कि एक साधारण सूचना पर सब कुछ छोड़कर रवाना हो जाना पड़ता है। स्वतंत्रता इतनी कि आप जो कह रहे हैं, कर रहे हैं, वही शास्त्र बनता जाता है।
संगी-साथी ऐसे जो एक संकेत पर घर परिवार छोड़ कर, दुनिया की नजर में नितांत पागलपन दिखने वाले क्रियाकलापों में लग जाते हैं।
अकेलापन इतना कि, आंसू भी रजाई में छिपकर बहाना पड़ता है।

मन की कठोरता ऐसी कि अपने ही हाथों, अपनों की अर्थी सजाकर, दूसरों को सान्त्वना देनी पड़ती है!
कोमलता इतनी कि किसी घर के दारिद्र्य में झाँकने पर, आजीवन घी शक्कर त्याग दिया जाता है।

व्यस्तता इतनी कि एक ही समय में दस इवेंट पर एक साथ काम किया जा रहा होता है…
फुर्सत इतनी कि 15-20 दिनों के वर्ग में बैठकर सुनने के अलावा कोई काम ही नहीं।

ठसक इतनी कि बड़े बड़े अधिकारियों से अत्यंत कीमती विषयों पर बहस करके निर्णय करना होता है, ऋजुता इतनी कि बहुत छोटे बच्चों की जिज्ञासाओं में उलझकर अटकना पड़ता है।

इन सभी विरोधाभासों में भी, एक विशेषता ऐसी है जो सिर्फ प्रचारक के पास होती है, अपने आदर्श डॉ हेडगेवारजी जैसा बनना।
हेडगेवारजी की राह पर चलना नहीं!
उनके जैसा बनना।

पूज्य डॉक्टर साहब की जीवनी को वे इतना आत्मसात कर लेते हैं कि हर क्षण, यही सोचते हैं “यदि इस जगह डॉक्टर साहब होते तो क्या करते?”
बस… इस एक प्रेरणा के बल पर वे, हम सांसारिक जनों से भिन्न हो जाते हैं।
पग पग पर, उनका इतना प्रशिक्षण हो जाता है कि वे हर परिस्थिति में कहीं नहीं अटकते।

मेरे शुभचिंतक के पुत्र, फिज़िक्स टीचर, ऐसा सोचना कब शुरू करेंगे?
वे खुशफहमी में बहुत दूर जा रहे हैं।
कहीं देर न हो जाये!!

हालांकि जीवन के उत्थान की कोई निश्चित घड़ी या पड़ाव नहीं होता।
पर शुभस्य शीघ्रम्, यूँ ही नहीं कहा!!

पुनःश्च:
सर्वस्व समर्पण के पश्चात भी, हिन्दू समाज उनकी भरपूर परीक्षा लेगा।
दीनदयाल उपाध्याय को कब स्वीकृति मिली?
नानाजी देशमुख को आज कितने जानते हैं?
अटल जी के साथ 2004 में क्या हुआ?
संघ के किसी भी प्रचारक ने कभी वापस शिकायत की?
हिन्दू समाज को कभी उलाहना दिया?
वो छोड़ो, अपनों के ही आघात पर कभी उफ्फ तक की?
नहीं न।
यह एक अलग शास्त्र है जो कम से कम फिजिक्स के फार्मूलों से नहीं समझा जा सकता।

RSS : स्वयंसेवक होना ही उसका सबसे बड़ा अपराध था!

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