बच्चों को इंसान जैसा बचा पाए तो ही विजय है

International Day of the Girl Child
International Day of the Girl Child

आज बिटिया स्कूल नहीं गई… क्योंकि मैं घर पर था तो कार से दौड़ लगाकर वापस मेरी गोद में चढ़ गई। पहले दिन स्कूल में हंसते हंसते गई थी दूसरे दिन से मना करने लगी, चार महीने पहले जब डे – केयर जाती थी तो ज़िद करती थी जाने के लिए।

कारण यही है कि स्कूल में उसको किसी ने बोध कराया होगा कि “तुमको नहीं आता…. फलाने को देखो उसको कितना अच्छा आता है”

डे – केयर में मौज होती है, सीखे तो बढ़िया, न सीखे तो और बढ़िया… खेलो कूदो मौज करो…

सवाल ये है कि डे – केयर में मौज क्यों और स्कूल में रोज रोज की नापतौल क्यों? क्योंकि स्कूल में मां बाप हिसाब जो लेते हैं, मेरी बच्ची ने कितनी कविताएं रटी, कितनी एबीसीडी उगली, कितनी गिनती पहाड़े चटकाए।

कुछ दिन पहले विश्व के सबसे खुश बच्चों के बारे में पढ़ रहा था, नीदरलैंड के बच्चों के बारे में, 8 साल की उम्र तक उनको गिनती विज्ञान और भाषा नहीं सिखाते। तब तक बच्चा, बच्चा रहकर अन्य बच्चों के साथ रहना सीखता है, अपना दैनिक कार्यक्रम जीना सीखता है। अपने आस पास को जानता है।

अरे प्यारे माँ बापों…. अपना बच्चा खुश चाहिए, तोता नहीं चाहिए, घर के पिंजरे में एबीसीडी गाने वाला खिलौना मत बनाओ बच्चे को…

मेरे बच्चे को आज से 20 साल बाद सारी दुनिया गंवार कह ले… लेकिन मेरा बच्चा खुश रहा तो बात बन जाएगी… और AIIMS आईआईटी हार्वर्ड पढ़ कर भी उसको दुःख घुस गया तो मेरा बाप होना व्यर्थ रहा।

स्कूल वालों, हमारे जैसे माँ बाप की भी सुनो। आज से बीस साल के बाद के व्यक्तित्व की नींव आप आज रख रहे हैं। बीस साल बाद आईआईएम आईआईटी को कोई नहीं पूछेगा। इनके काम रोबोट कर लेंगे। इंसान जैसा बचा पाए बच्चों को तो ही विजय है।

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