पंचतंत्र : जगत में ज़िन्दा रहने का महामंत्र

एक सम्पन्न परिवार की लड़की जब जवान हुई तो उसके तीन स्तन उग आए। इससे वह अत्यंत वीभत्स और कुरूप दिखने लगी। अब इस त्रिस्तनी से कौन विवाह करे?

तो पिता ने एक अंधे भिखारी से उसका विवाह कर दिया। उसे खूब सारा धन देकर कहीं दूर चले जाने को कहा। अंधे का सखा, एक कुबड़ा भी था जो उसकी लाठी खींचता था। वह भी साथ हो लिया। किसी दूर देश में जाकर, वे सब रहने लगे।

इस त्रिस्तनी की वासना अत्यंत प्रबल थी जो वह कुबड़े से भी सम्बन्ध बना बैठी। धीरे धीरे, उसका मन अंधे से भर गया। कुबड़े और त्रिस्तनी ने मिलकर अंधे को मारने की योजना बनाई।

योजनानुसार कुबड़ा कहीं से एक जहरीला मृत सांप लाया और चूल्हे पर उसका साग चढ़ा दिया।
अंधे को कहा, “मछली पक रही है, उसमें चम्मच चलाते रहो, तब तक मैं और त्रिस्तनी पास वाले कमरे में दूसरा काम निबटाते हैं।”

अंधा मछली का शौकीन था। वह चम्मच चलाते हुए, सब्जी की सुगंध लेने लगा। भाप के साथ उठते विष ने दवाई का काम किया, और अंधे का मोतिया गल गया, जिससे वह देखने लगा!

बर्तन में पकते सर्प को देख वह तुरंत सारा खेल समझ गया। शक तो उसे था ही। अंधे की ही तरह
एक्टिंग करते हुए वह पास वाले कमरे में क्या देखता है कि कुबड़ा और त्रिस्तनी अपने काम में लगे हुए हैं।

गुस्से में आकर वह लूले कुबड़े की दोनों टाँगे पकड़कर उसे 10 बार जोर से चक्करघिन्नी बनाकर घुमाता है और त्रिस्तनी की छाती पर सोटे की भांति मार देता है।

इससे त्रिस्तनी का बीच वाला तीसरा स्तन गायब हो जाता है, वह ठीक हो जाती है। कुबड़े की कूबड़ भी ठीक हो जाती है! डेंट निकल जाने से पैर भी सही हो गए!! अंधा पहले ही ठीक हो गया था।
सभी दिव्यांग, टकाटक हो जाते हैं।

सेक्युलर्स+वामपंथी+जातिवादी के समाधान हेतु आप इस कथा को फिर से पढ़ो। नहीं समझ आए तो अगले लेख में समझना।

पंचतंत्र, यूँ ही महाग्रंथ नहीं बन गया। उसकी एक एक कहानी, अपने बच्चों को सुनाओ। पढ़ाओ मत, कार्टून या यूट्यूब भी नहीं, सामने बिठाकर सुनाओ। हाव भाव बनाकर सुनाओ। बच्चों की कल्पना शक्ति बड़ी चमत्कारी होती है। उनके मानस में बिम्ब बनने दीजिये।

पंचतंत्र मात्र कहानियां नहीं है। ये जगत में जिंदा रहने के महामंत्र हैं। आज, हरेक व्यक्ति के एक दो पुत्र ही हैं। लाड प्यार में पल रहे हैं। कुछ दशक बाद, जब आप नहीं रहोगे, वे इस खतरनाक जंगल में निपट अकेले होंगे।

माहौल ऐसा बन रहा है कि संसार में सर्वाइव करना अत्यंत कठिन हो जाएगा। जब बहुत भारी संकट होता है तो उसकी रक्षा या तो रक्तसम्बन्धी करते हैं (याद रखिये, विपत्ति में अपना खून ही आगे आता है), या उसका विवेक।

उसके ढेर सारे भाई बहिन बनाने की आपमें औकात नहीं, अंतड़ियां कटा हिंजड़े बन गए या सरकारी बहकावे में आ गए!

आज की शिक्षा विवेक समाप्त कर रही है। आप का बच्चा एक फुसफुस से ज्यादा कुछ नहीं होगा।
संकटों और धोखेबाजों से घिरा, वह आपको बहुत याद करेगा। तब आपका यही चेहरा, उसकी आँखों के सामने आएगा। हाव भाव युक्त, ये नीतिग्रंथ जीवंत हो उठेंगे।

आपके एक एक वाक्य को याद करते हुए, संसार से सताया, तन्हा बच्चा, अचानक उसके मस्तिष्क में ये कथाएं उसे जीना सिखा देंगी!

आपके प्रोजेक्ट, होमवर्क, डिजिटल गेम्स, जटिल फार्मूले सब धरे रहने वाले हैं, यदि 12 वर्ष की उम्र से पहले पहले, उसने हितोपदेश अथवा पंचतंत्र नहीं सुना है। पढ़ाओ मत सुनाओ.. जल्दी, कहीं देर न हो जाए।

अच्छे अभिभावक बनो।

पुनःश्च

पंचतंत्र के नाम से बहुत कचरा बिक रहा है। वामपंथियों ने सारे साहित्य की ऐसी तैसी कर रखी है। वह कचरा मत ले आना, वरना लेने के देने पड़ जायेंगे। मैंने cbd प्रकाशन की पंचतंत्र देखी है जिसमें लेखक ने पात्रों के नामकरण, मुस्लिम और ईसाई कर रखे हैं, शेरखान की तरह। उसे पढ़ाने के बजाय अपने बच्चे का गला घोंट देना!

असली पंचतंत्र, जो संस्कृत हिंदी अनुवाद सहित है, वह लेकर आना। पहले खुद पढें, फिर वही कहानी अपने बच्चों को सुनाएं।

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