मित्रता ईश्वर के दूत से

देवताओं के समूह ने उसे चुना
इसलिए कि वह चुनी जाए
और चुनकर कष्ट पाए

ये कष्ट सामान्य भौतिक कष्टों की तरह नहीं होते,
जहाँ प्राप्य की आकांक्षा में प्राप्त के आनंद को बिसरा
त्वचा की उत्तेजनाओं के शमन में ही
सुख अनुभव होता है,
सुख अनुभव होता है
देह को अधिक से अधिक इन्द्रियाधीन करने में…
और ऐसा न होने पर कष्ट हो…

उसके जीवन के लिए योजना बनाई जाती है
एक विशेष कष्ट की
यह वही कष्ट होता है
जो मीरा ने विष का प्याला पीते पाया था
जो अहिल्या ने शिला हो जाने में पाया था
सीता ने अग्नि परीक्षा में सहा
राधा ने कृष्ण के विरह में पाया

इस कष्ट से ही
कृष्ण और राम के ईश्वरीय स्वरूप में
जीवन-लीलाएं निर्मित हुईं
प्रेम, भक्ति और समर्पण की
परिभाषाएं अवतरित हुईं

पात्रता अर्जित करना होती है
कष्ट भोगने के लिए भी
जो कई जन्मों की तपस्या के बाद
निःसृत होती है जीवन के प्रपंचों में
और प्राण दिये की बाती की तरह
कंपकपाते हुए भी
प्रकाश देने के अपने धर्म से नहीं चूकते

कुछ ऐसा ही जीवन वह जीती है
और ईश्वर से मित्रता के वचन के साथ
प्रवेश करता है उसके जीवन में ईश्वर का दूत

यह सन्देश देता हुआ कि
मार्ग समाज सुलभ नहीं है
परन्तु अध्यात्म के रहस्यमय मार्ग
यहीं पर मिलते हैं
जीवन के प्रपंचों पर सवार
ईश्वरीय मार्ग पर चलने
बहुत कष्ट भोगना होते हैं

वह ईश्वर की तरफ देखकर मुस्कुराती है
और चंचल मुस्कान के साथ गुरु को
प्रणाम करती है कि
मर्म अब समझ आया
क्यों आपने ‘जीवन’ नाम दिया

ईश्वर का दूत मार्ग में आगे है
उसे लग रहा है
वो उसे राह दिखा रहा है
और वो जानती है
ईश्वर से मित्रता के लिए
कभी मार्ग भी बनना पड़ता है
कष्ट भी भोगना पड़ता है
पीछे भी चलना पड़ता है

और प्रतीक्षा कर रही है
भूमिकाएं बदल जाने की…
जब वह उसे बता सकेगी कि

मैं ही तुम्हारी प्रकृति हूँ
जो पैदा करती है प्रतिकूल परिस्थिति
तुम्हारे परमात्मीय पथ को
परिष्कृत करने के लिए

मैं ही तुम्हारे दर्शन की दृष्टि हूँ,
भौतिकता का दृश्य भी मैं ही हूँ
ताकि तुम दैदीप्यमान कर सको दीप
दारुण जगत के अँधेरे दरवाज़ों पर

मैं ही तुम्हारे अदृश्य जगत में रचती हूँ माया
मैं ही दृश्य जगत में फिरती हूँ बनकर छाया
परस्पर अनुकूल-प्रतिकूल, साधक-बाधक रूप में
मानव जगत में प्रकट होती बनकर महामाया

मैं चिति बन पराशक्ति रूप में आत्मस्फुरित हूँ
जिसके बहि:प्रसरण से तुम्हारा संसार करती हूँ
और मैं ही स्थावर-जंगमात्मक जगत में
परमशिव के तीसरे नेत्र पर तांडव करती हूँ

मैं ही वो नागमणि भी हूँ
जो भोले की गर्दन पर श्रृंगारित है
मैं ही उसके डमरू से उठता नाद हूँ
जिससे तुम्हारा संगीत जगत आह्लादित है

तुम्हारे मूल से उठती वो कुण्डलिनी हूँ
जो मस्तक के सहस्त्रदल कमल पर
विराजित होकर ख़त्म करेगी जन्मों का फेरा
यूं तो मैं तुम्हारे जीवन का रंगमंच हूँ
लेकिन मैं ही तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा का प्रपंच हूँ

– माँ जीवन शैफाली (एक पुरानी कविता नए आयामों में प्रवेश करती हुई)

मैं तुम्हारे जीवन का रंगमंच हूँ, मैं ही तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा का प्रपंच हूँ

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