ये क्षेपण है ना लेपन है, यह स्पष्ट विरूपण है, कुरुपण है श्रीराम के निर्मल यश का

सनातन वांग्मय का एक विशिष्ट गुण है उनकी द्विविध चैतन्यता! हमें इस व्यवस्था में यह पूर्ण स्वतंत्रता है कि हम तटस्थ भाव से ‘जड़’ ज्ञान और ‘चैतन्य’ मेधा का समुचित संयोग करके घटनाओं को देखें, समझें और निर्णय करें।

यही वह मूलशक्ति है जिसके चलते इस धर्म ने कालकृत विकारों का श्रेष्ठ परिमार्जन किया और उत्तरोत्तर सत्य का अनुभव और प्रगाढ़ किया।

इसके विपरीत सेमेटिक धर्मो ने इस मूलभूत अंतर के चलते हुए विनाश को हम स्पष्ट देख सकते है। एक ओर जहां इस्लाम पूर्णतः ‘जड़’ (लिखित संहिता रूपी पुस्तक) पर आश्रित है, वहीं ईसाईयत दोनों के असंतुलित मिश्रण के चलते दिग्भ्रमित है।

चैतन्य मात्र के अति कुतर्को पर अत्यधिक आश्रित होने पर चार्वाककुलीन नास्तिकता और वामपंथ मानव कल्याण से ठीक उल्टी राह पर हैं ही।

आइये इसे उदाहरण सहित समझते हैं।

विचार कीजिये कि एक बलात्कार की शिकार स्त्री पर सनातन में क्या कोई व्यवस्था है?

नहीं?

संभवतः अधिकांश लोगों को यही ज्ञात होगा कि हमारे यहाँ एक धारणा प्रबल रही है कि सती (पतिव्रता स्त्री) का यदि सत वास्तव में अक्षुण्ण है तो उसके जीवन मे ऐसा प्रसंग कभी आ भी नहीं सकता।

यही ना! और मैं यदि कहूँ कि नहीं, ऐसा नहीं है बल्कि सनातन में इसके लिए बिल्कुल व्यवहारिक, साहसी और उचित व्यवस्था है तो आप क्या कहेंगे?

पढ़िये, क्या कहती है मनु स्मृति!

मनु जी का आदेश है कि “बलात्कार से किये गए सब कृत्य, न किये गए ही समझने चाहिए।” अर्थात वे अकृत्य ही माने जाए।

ये भी पढिये। अत्रि संहिता कहती है कि –

“परिस्थिति या अज्ञानवश, आपत्ति में पड़ने पर जो स्वयं भ्रष्ट हो गई हो या छल करके बहकाई गई हो, जिसके साथ बलात्कार किया गया हो, जो चोरी से निंदित अवस्था में भोगी गई हो (अपहरण), ऐसी स्त्री त्याज्य नहीं होती है, किन्तु उसके साथ तब तक संयोग ना करें जब तक कि वह पुनः रजस्वला ना हो जाये।”

“रजस्वला होने पर स्त्री गर्भ विज्ञान के अनुसार पूर्णतः शुद्ध हो जाती है।”

स्ववर्ण के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति के द्वारा बलात धर्मभ्रष्ट स्त्री के गर्भ रह जाय तो वह केवल तब तक अशुद्ध रहती है जब तक कि प्रसव ना हो जाये। प्रसव के पश्चात होने वाले ऋतुकाल के उपरांत स्त्री निर्मल होकर स्वर्ण सदृश्य शुद्ध हो जाती है।

अब कुछ ऐतिहासिक घटनाओं पर विचार कीजिये।

1. अहिल्या उद्धार

गौतम ऋषि की लावण्या पत्नी जिन्हें गौतम ऋषि का ही वेश बनाये इंद्र ने धोखे से भोगा और गौतम ऋषि ने उन्हें (अहिल्या को) पाषाणवत होने का श्राप दे दिया।

कालांतर मे भगवान राम द्वारा गौतम ऋषि के उसी आश्रम में अहिल्या का उद्धार हुआ।

इसे कुछ यूं समझिये कि इस घटना से क्रुद्ध गौतम ऋषि के तिरस्कार एवं धोखे से बलत्कृत होने के मानसिक आघात से त्रस्त अहिल्या पत्थर की तरह भावविहीन जीवन जीने लगीं, बिल्कुल वैसे जैसे कोई मूर्ति होती है।

क्या मात्र श्रीराम के दर्शन अथवा स्पर्श से वह मुक्त हो गई?

नही! वस्तुतः हुआ यह कि विष्णुअवतार श्रीराम जो कि अन्य विगत और भावी अवतारों की तरह वास्तविक क्रांतिकारी थे, ने अपनी विवेकपूर्ण वाणी से उनके एवं गौतम ऋषि के मन से वह अपराधबोध समाप्त किया जिसका आधार संभवतः वे ही शब्द रहे होंगे जिनका उल्लेख मैंने ऊपर किया है (मनु स्मृति, अत्रि संहिता)।

यही था वह ‘उद्धार’!

2. तारा

वानरराज बाली की पत्नी तारा ने बाली वध के पश्चात अपने देवर सुग्रीव से पुनर्विवाह कर लिया था।

हुआ यूं कि जब एक लंबे राक्षसी संघर्ष में बाली भूमिगत सुरंग से बाहर नहीं आया तब सुग्रीव गुफा के द्वार पर चट्टान रखकर लौट आये और यह मान बैठे कि बाली अब नहीं रहे , तो मंत्रियों के कहने पर राजा बन गए और उनकी कुल परंपरा /क्षेत्रीय प्रथा के चलते बाली की पत्नी तारा को भी पत्नी रूप में स्वीकार किया।

अब बाली कुछ समय बाद सुरक्षित लौट आया जो लगभग असंभव ही था, उसने सब कुछ देखा तो इसे सुग्रीव का षड्यंत्र समझ कर उसे उसके विश्वस्तों सहित देशनिकाला दे दिया और बलात उसकी पत्नी रूमा को अपनी पत्नी बना लिया।

फिर राम किष्किंधा पहुंचे, बाली को ‘अनुज वधू’ के मानभंग का दोषी पाया, उसका वध किया, और सुग्रीव को फिर से राजा बना दिया। फिर से प्रथानुसार तारा ने सुग्रीव को पति स्वीकार कर लिया और अंगद के युवराज़ होने का वचन भी।

अब इस घटना को बिना दुराग्रह के तटस्थ भाव से सनातन के श्रेष्ठतम सिद्धांत ‘देश, काल एवं परिस्थिति’ के प्रकाश में देखिये और विचार कीजिये।

 

तत्कालीन तुलनात्मक उन्नत अवधी मानवीय सभ्यता के अनुसार तो अग्रजवधू माता समान और अनुजवधू पुत्री समान होती है। मर्यादा का अतिक्रमण तो दोनों ने ही किया है। फिर क्या कारण है कि सुग्रीव निर्मल निकले, बाली मारा गया और इतने जटिल संबंधों के पश्चात भी तारा को अहिल्या के साथ पांच सतियों में गिना जाता है जो स्मरणमात्र से पाप नाशिनी कही जाती है?

इस पर तुर्रा यह कि वहां इन सभी घटनाओं के समय एकमात्र माननीय, सर्वमान्य निर्णायक व्यक्तित्व थे श्रीराम!

क्रांतिकारी राम ने उस जाति के जो कि पशुओं से सभ्य मानव के बीच की अवस्था में थी, विकासशील थी, अतः ‘वानर’ कही जाती थी, के तत्कालीन नियमों, प्रथाओं के साथ उनके उत्थान एवं विकास की दूरदृष्टि के साथ सामंजस्य बैठाते हुए ये उपरोक्त उचित निर्णय लिए।

लगभग यही रावण की मृत्यु के बाद विभीषण और मंदोदरी के विवाह में भी हुआ माना जाता है।

बहुत स्पष्ट है कि प्रकृति के अधिक निकट एवं आश्रित अवलंबित होने से ‘काम’ (सेक्स) के प्रति अत्यधिक आसक्ति के चलते वानर एवं राक्षसों के सामाजिक, पारिवारिक एवं दाम्पत्तिक नियम पूर्णतः अलग रहे होंगे, जिसमें राम ने विवेकानुसार सुधार के साथ उन्हें कालांतर में सभ्य मनुष्यता के पथ पर लाने के उद्देश्य से स्वीकार किये होंगे।

(काम के प्रति अत्यधिक आसक्ति के प्राकृतिक होने संबंधी विषय के लिए सुग्रीव -लक्ष्मण प्रसंग पढ़ें)

इन घटनाओं का गहराई से निरीक्षण करने पर यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि श्रीराम स्वयं नारियों के उचित अधिकारों, सुरक्षा एवं सम्मान को लेकर कई युगों आगे की दृष्टि वाले सच्चे क्रांतिकारी थे।

ऐसे में यह बात कैसे स्वीकार की जाए कि जगत भर की विषम स्थितियों में फंसी स्त्रियों को उचित स्थान दिलाने वाले श्रीराम अपनी ही परमप्रिय भार्या के साथ सरासर अन्याय करेंगे, वह भी केवल इसलिए कि कतिपय लोग क्या कहेंगे?

14 महीने जो व्यक्ति अपनी प्रिया से विलग रहने पर ठीक से सोया ना हो, जो लंका में प्रविष्ट होते ही हनुमान को अशोक वाटिका भेज दे यह संदेश देने कि उनका अभीष्ट सिद्ध हुआ, जो अपनी प्रिया के दर्शन मात्र को व्याकुल हो मार्ग को एकटक देखते रहे कि कब सेवक सीता को लेकर आएंगे वे श्रीराम चार श्लोक बाद अचानक वज्र के समान कठोर होकर कह उठे कि –

“अपना सतीत्व सिद्ध करो, 14 महीने इतने भीषण, मायावी राक्षस के अधीन रखकर भी भ्रष्ट ना हुई यह मानना सहज नहीं है, मैंने युद्ध मात्र इक्ष्वाकु वंश के सम्मान के रक्षार्थ किया था, अब तुम्हारी प्राप्ति कोई विषय नहीं है!”

ये क्षेपन है ना लेपन है, यह स्पष्ट विरूपण है, कुरुपण है मर्यादा पुरुषोत्तम के निर्मल यश का।

सज्जनों! क्या किसी पागल की गवाही किसी न्यायालय में मानी जाती है? नहीं ना!

तो कैसे एक कुंठित, व्यसनी एवं दुष्ट धोबी के लोकापवाद को प्रश्रय देकर रघुनंदन अपनी प्रिया को त्याग देते, जिसने 14 महीने प्रतिक्षण ‘अग्निपरीक्षा’ दी हो!

अपने परमप्रिय पति से विछोह को प्राप्त सीता प्रतिक्षण ‘विरहाग्नि’ में दग्ध होकर अग्निस्नान करती रहीं जिसे स्वयं श्रीराम के गुप्तचर हनुमान ने अपनी आंखों से देखा और शब्दशः रघुवर से कह सुनाया! उस वचन के साथ कि अब एक महीने के भीतर मुझे मुक्त नहीं करवाया तो मैं प्राण त्याग दूंगी!

राम ने कुछ भी नहीं सोचा होगा?

अच्छा, आखिर क्या करते होंगे राम के दरबार के उच्चकुलीन ब्राह्मण, कुलगुरु, मंत्री एवं धर्माचार्य? कैसे उन्होंने उत्साहपूर्वक, समारोहपूर्वक राजतिलक के उपरांत पुंसवन एवं सीता के गर्भधान संस्कार को सहमति दी होगी? मनु/ अत्रि स्मरण नहीं रहे होंगे क्या उन्हें?

स्पष्ट है कि सीता पर संशय का कोई हेतु ही नहीं था बल्कि सम्पूर्ण अधिकारसंपन्न सक्षम वरिष्ठजनों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त था।

तभी तो तुलसी स्पष्ट कहते है रामदरबार की स्तुति करते हुए कि, “नीलाम्बुज श्यामल कोमलांगम, सीता समारोपित वामभागम… नमामि रामम…”

समान रूप से आरोपित, राम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी महारानी सीता!

कैसा संशय!

एक बात और समझ लीजिए।

जनक नहीं आये थे सीता का विवाह प्रस्ताव लेकर अयोध्या।

राम गए थे सीता के ‘स्वयंवर’ का लाभार्थी बनने, धनुषभंग करके ‘पात्रता’ प्राप्त करके, खड़े रहे थे सीता द्वारा वरे जाने के निर्णय को लेकर।

सीता ने वरण किया था, सीता के पास अधिकार था वरण का, और इसीलिए त्याग का भी।

राम चाहते तो भी त्याग ना पाते कभी, अधिकार सीता को था।

रघुकुल रीति के रक्षक कभी ऐसी बातें विस्मृत नहीं कर सकते सज्जनों।

“रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाहि।”

अग्नि के समक्ष वेदमंत्रों के साक्ष्यभाव में दिए गए सप्तवचन क्या कभी तोड़ सकते हैं रघुकुलभूषण?

असंभव।

लव कुश गर्भाधान, राम के उत्तराधिकार से स्पष्ट था कि संशय/ आरोप/ त्याग जैसा कुछ भी नहीं हुआ था।

होता भी कैसे? सम्पूर्ण जीवन मे सीता ने केवल एक ‘गलती’ की थी, माया के प्रभाव में स्वर्ण मृग प्राप्ति की, जिसपर राम की अवज्ञा भी की और ज़िद भी की, उस गलती का विधानों से सहस्त्रों गुना अधिक दंड वे अशोक वाटिका में भोग चुकी थीं, और किस बात का दंड देते उन्हें ‘राजा’ राम?

यही सत्य है मित्रों! तुलसीदास जैसे महामर्मज्ञ ने लगभग योगस्थ होकर रामचरितमानस को राज्याभिषेक पर पूर्णाहूत कर दिया क्योंकि वे जानते थे कि वास्तविक रस यहीं तक था, आगे मानव मस्तिष्क कृत्रिम रस के लोभ में कहीं ना कहीं लक्ष्य से भटक जाएगा।

श्रीराम के समान नारी को सम्मान, सुरक्षा एवं अधिकार देने वाला यदि कोई हुआ है तो स्वयं उन्ही के पूर्णावतार श्रीकृष्ण, अन्य कोई उनके चरण पादुका की भी तुलना में नहीं है दूर-दूर तक।

इति शमः !!

।।श्रीजानकीवल्लभो विजयते।।

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