Cloward Piven स्ट्रेटजी और हम

क्लोवर्ड-पिवेन स्ट्रेटजी क्या है, इस पर मंथन होना आवश्यक है क्योंकि आज समूचा विपक्ष जो भी किये जा रहा है, साफ दिखाई दे रहा है कि इसी स्ट्रेटजी के तहत किया जा रहा है।

कौन थे क्लोवर्ड-पिवेन?

रिचर्ड एंड्रू क्लोवर्ड (मृत्यु 2001) और फ़्रांसेस फॉक्स पिवेन (जीवित, वय 85) यह दंपति अमेरिका में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में अध्यापक रहे। वैसे देखने जाएं तो यह यूनिवर्सिटी उत्पाती वामपंथी विचारकों की पुरानी फ़ैक्टरी रही है। अस्तु, हम बात करते हैं क्लोवर्ड-पिवेन स्ट्रेटजी की। क्या है यह?

मई 1966 में इस दंपति ने यह स्ट्रेटजी प्रकाशित की। उसका निचोड़ यह था कि अमेरिका की पूंजीवादी सरकार को गिराने के लिए वहाँ के वेल्फेयर स्कीम में (बेरोजगार भत्ता) जितने हो सके उतने लोग भर्ती किए जाएँ। आज जितने लाभार्थी हैं उससे कई गुना अधिक लोग इसमें भर्ती किए जाएँ। तब व्यवस्था पर इतना लोड आयेगा कि वह चरमराकर ढह जाएगी। आर्थिक अराजकता की स्थिति पैदा होगी। उस आर्थिक अराजकता की स्थिति के लिए तत्कालीन लोकतान्त्रिक सरकार पर ठीकरा फोड़कर जनता की तथाकथित सहमति से वामपंथी सत्ता अधिग्रहित कर सकेंगे।

यह मूल लेखकों का तब का लिखा था, लेकिन चूंकि इसका उद्देश्य आर्थिक अराजकता लाना है, इस उद्देश्य के लिए अन्य मार्ग भी चुने जाते रहे हैं। वैसे इस स्ट्रेटजी का निचोड़, अमेरिकन दक्षिणपंथी विचारक डेविड होरोवित्ज़ के शब्दों में – The strategy of forcing political change through orchestrated crisis. The “Cloward-Piven Strategy” seeks to hasten the fall of capitalism by overloading the government bureaucracy with a flood of impossible demands, thus pushing society into crisis and economic collapse.

याने क्रायसिस = संकट की स्थिति जबर्दस्ती कैसे पैदा करें? पूंजीवाद (सरकार) को क्षमता से कई गुना बढ़कर मांगों से – impossible demands से – ओवर लोड करें ताकि समाज में संकट उत्पन्न हो और अर्थव्यवस्था ढह जाये।

अमेरिका हो या भारत, वामियों ने एक बात देख ली कि समूचा देश तो सशस्त्र क्रांति में साथ देने से रहा। भारत की बात करें तो मुफ्तखोरी को हक बताए जाने से वोट मिलते हैं, और मुफ्तखोरी बंद होने से सत्ता से बाहर फेंके जा सकते हैं।

मुफ्तखोरी की कीमत देश कैसे चुका सकता है इसकी किसी वामपंथी को परवाह नहीं है, कोई वामपंथी अर्थशास्त्री इसपर साफ बात नहीं करता कि पैसे कहाँ से आएंगे, कौन देगा कैसे देगा और क्यों देगा।

आज की तारीख में लफ्फाज़ी करेगा कि कमाने वालों को, उनसे जितना मांगा जाये, देना कर्तव्य है… लेकिन असलियत अलग होती है यह वो भी जानता है। बस अपना उल्लू सीधा करना है, उसे इतना ही लगता है कि ऐसा ही चलते रहेगा।

करदाता, मतदाता नहीं होता और ना ही उसकी संख्या उतनी रही है कि वो अपनी पसंद की सरकार लाये। करदाता मत देने भी नहीं जाता, मतदान के दिन छुट्टी है इसलिए बाहर पिकनिक को जाता है और वहाँ चिप्स खाते खाते बीयर पी पी कर सरकार को कोसता है।

अस्तु, क्लोवर्ड पिवेन स्ट्रेटजी की व्यापकता बड़ी है। बराक ओबामा ने अवैध इमिग्रंट्स को बढ़ावा दिया ताकि उनको बेरोजगार भत्ता दिलाया जा सके, उनको नागरिक बनाया जा सके, पार्टी के वोटर बनेंगे।

नियमों के तहत ओबामा दुबारा प्रेसिडेंट नहीं बन सकते तो क्या हुआ। वहाँ लोग उद्दिष्टों के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं, ऐसा नहीं सोचते कि हम तो नहीं आएंगे दुबारा तो हमें क्या करना है? अवैध इमिग्रंट्स की संख्या बढ़ाना भी आर्थिक अराजकता के प्रति एक कदम आगे ही है।

जैसे अपने यहाँ बंगलादेशी और अब रोहिंग्या के पास सभी ID आ जाती हैं।

तो ये रही संक्षेप में क्लोवर्ड पिवेन स्ट्रेटजी। किसी भी तरह से ऐसी मांगे रखते जाओ और अपने साथ भीड़ जुटाओ कि मांग पूरी करना असंभव हो, जिससे असंतोष बढ़े और सरकार चलाना संभव न हो। हर तरह से आर्थिक अराजकता पैदा हो ताकि नुकसान से आहत जनता सरकार को कोसे और वामपंथियों को तख़्ता पलट में आसानी हो जाये।

मेरी सब से यही विनती है कि Cloward Piven Strategy का अध्ययन करें और इसके उपाय सोचें। हर कोई विदेश नहीं भाग सकता, और अभी विदेशों में भी मंदी का आलम है, वे भारत में नौकरियाँ ढूंढ रहे हैं।

हाँ, उन्हें अगर अब लगने लगा है कि भारत रहने और करियर बनाने लायक देश है तो क्यों लगने लगा है इसपर भी तनिक सोचिए। जय हिन्द।

गारंटीड नेशनल इनकम : अराजकता में सत्ता का रास्ता खोजते वामपंथी

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY