हिन्दू के पतन का ज़िम्मेदार हिन्दू स्वयं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा दिल्ली के उद्बोधन में, कि हिन्दू के पतन का ज़िम्मेदार हिन्दू स्वयं है।

वे, हिन्दू हिंदुत्व की परिभाषा ठोककर बता चुके हैं। संघ की methodology भी।

भविष्य का भारत कार्यक्रम अंतर्गत आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के दूसरे दिन के शुरू में एक वीडियो दिखाया गया।

उस वीडियो में कह रहे थे, सवर्णों को ये बताना पड़ता है, दलितों को ये बताना पड़ता है। उनका डेटा बैंक हैं, पूरे देश में फैले हैं, भावनात्मक स्तर की रिपोर्ट ऊपर जाती है। एक की नहीं, कईयों की। भेद है, ये वर्तमान है। संघ उसके खिलाफ लगा है।

ये वर्तमान है, भूतकाल में क्या था, किन और कैसे कारणों से हम विकृत हुए, उसका मोल नहीं रह जाता, हाँ, वामपंथी विचार से लड़ने का साधन मात्र जरूर होता है। पर आप उस पुराने को पाएंगे कैसे? बातें करके?

मुझे उन बड़बोलों पर हंसी आती है जो संघ को निशाने पर लेते हैं। हिन्दू विद्वानों की बात कर रहा हूँ, कोई वामपंथी या भारत के बाहर उपजे मठाधीश की बात नहीं कर रहा।

पहले अपने वज़न और गहराई को नाप लीजिये। भारतवर्ष में और विदेशों में भी फैले संघ को उनके अनुभव को, उनकी रेंज को, उनके डेमोक्रेटिक यथार्थ को समझ लीजिए।

पूर्वकाल के भारत के बारे में जानना अच्छा है। बहुत अच्छा है। अगर चरित्र में भारतीय हैं तो वो लक्ष्य प्राप्त होगा ही।

पर आप संघ पर प्रश्न करते हैं जो चरित्र निर्माण के साथ किसी को छोटा बड़ा नहीं मानता, और किसी को विशेष भी नहीं मानता और ना ही अच्छा काम करने वालों का विशेष एडवर्टाइज़मेन्ट करने के पक्ष में रहता है क्योंकि हम बुलबुले हैं, मिट जाएंगे, पर भारत रहेगा, इस सोच को लेकर। चरित्र पहले, यही मार्ग है।

उस पर कुछ लोग एकेडमिक सहायता से उस पर प्रश्न उठाते हैं? ‘थारे से न होगा भाऊ’, साफ यही बात है। जो सामूहिक रूप से कर रहे है, उनका संसाधन और लक्ष्य अच्छा है।

अपना भूतकाल का एकेडमिक ज्ञान भी अपनी जेब में रखो। चरित्र पर बात कर लो। यथार्थ को वही रूप देगा। संघ वाले तो कर ही रहे हैं। तुमसे पूछ कर थोड़े न शुरू किए थे?

जय श्री राम।

हर प्राणी होता है शक्ति विशेष का वाहक

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