अपने अपने राम को अपने अपने मन में बिठायें और स्वयं बन जाएँ श्रीराम

कभी कभी ही ऐसा होता है जब मुझे फेसबुक का पठन-पाठन सफल होता हुआ लगे और समय के सार्थक सदुपयोग का अहसास हो। उस पर से यह तो बहुत कम होता है जब किसी पोस्ट के तथ्य और तर्क मुझे समृद्ध भी करते चलें।

पिछले दिनों फेसबुक पर देवेंद्र सिकरवार और सर्वेश तिवारी श्रीमुख के बीच ‘सीता वनवास’ पर चले शास्त्रार्थ ने प्रभावित किया।

शास्त्रार्थ इसलिए कहूंगा कि इसमें कोई पक्ष या विपक्ष नहीं होता, ना ही इसे वाद-विवाद माना जाए, ना ही इसमें किसी की विजय और पराजय होती है। यह तो शास्त्र के अपने अपने अर्थ का प्रस्तुतिकरण है, जहां सब की जय है।

दोनों ने जिस शालीनता से शब्दों की गरिमा बनाते हुए अपनी अपनी बात रखी, वह विशेष है, जो प्रमाणित करती है कि सनातन संस्कृति के संस्कार अब भी इस देवभूमि के जन-जन के रक्त के कण-कण में जीवनधारा की तरह बह रहे हैं।

एक बात और नज़र आयी कि दोनों में अहंकार नजर नहीं आता। मैं इनसे निवेदन करूंगा कि आगे भी इससे बचें। वरना सोशल मीडिया में ऐसे अनेक हैं जो अपने अभिमान में इतने डूबे हैं कि श्रीराम के संदर्भ में कहते कहते स्वयं रावण बन जाते हैं।

कई तो ऐसे ‘मूर्ख बुद्धिमान’ हैं कि शब्दों का ऐसा मायाजाल बुनते हैं कि उसके भंवर में फंसकर खुद ही वैचारिक आत्महत्या कर लेते हैं। मैं उनका नाम नहीं लेता, ना कभी लूंगा, वे इस योग्य भी नहीं, ना उनकी कभी चर्चा करता हूँ, करनी भी नहीं चाहिए वरना हम उनका अभीष्ट अर्थात नकारात्मकता फैलाने में मदद करेंगे।

असल में ये लोग सूचना और ज्ञान का अन्तर करवाते हैं। सूचना अहंकार पैदा करती है जबकि ज्ञान विनम्र बनाता है। आज का युग सूचना का युग है और इसलिए यह पतन का युग है।

सूचना का बोझ जब अहंकार पैदा करता है तो वो फिर प्रत्येक का व्यक्तिगत अधर्म बन जाता है और यह अधर्म ही सर्वनाश का कारण बनता है। जबकि वेद कहते हैं कि ज्ञानमार्ग ईश्वर प्राप्ति का श्रेष्ठ मार्ग है।

वहीं ज्ञान के संदर्भ में वेद कहते हैं कि अंतिम कुछ भी नहीं। ईश्वर एक है सत्य एक है, बस उसकी प्रस्तुतिकरण भिन्न भिन्न है। सबकी अपनी अपनी अनुभूति है अपने अपने अनुभव, ऐसे में अंतिम कुछ भी नहीं, तभी तभी नेति नेति का ब्रह्म वाक्य दिया गया।

अंतिम कुछ भी नहीं, हो भी नहीं सकता। जो होता तो वो सनातन नहीं कहलाता। सनातन तो वो है जो निरंतर प्रवाहित है, ठीक उसी तरह से श्रीराम का नाम और उनकी कथा भी जन-जन को संचारित करती आयी है।

जैसे सनातन से अनेक धारा निकलीं ठीक उसी तरह से राम की भी अनेक कथाएं हैं! मगर सब में श्रीराम और सीता माता उसी तरह स्थापित हैं जिस तरह हर पंथ में सनातन के मूल मिल जाते हैं। फिर चाहे वो बौद्ध और जैन धर्म ही क्यों ना हों। सच तो यह है कि बौद्धों के भी अपने राम हैं।

जहां तक रही बात कि क्या सत्य है, तो इस पर इतना ही कहा जा सकता है कि जब कल की कोई घटना आज के समाचारपत्रों में अनेक शब्द ले लेती हैं जिसके शब्दार्थ शाम तक अनगिनत हो जाते हैं, ऐसे में हजारों वर्ष पुराने रामकथा के साथ क्या क्या हुआ हो सकता है उसे नकारा नहीं जा सकता।

और फिर मानवीय अवगुण कलयुग की ही पहचान नहीं, यह त्रेता में भी डंक मारने लगे थे। ऐसा ना होता तो कैकेयी का स्वार्थ नहीं उभरता। लेकिन इसमें भी विद्वान सकारत्मकता ढूंढते हुए यहां तक कहते हैं कि अगर माता कैकयी ना होतीं तो राम श्रीराम के रूप में स्थापित ना होते।

बहरहाल, अब तक के अपने छोटे से अध्ययन और अल्पबुद्धि से इतना ही समझ पाया हूँ कि पौराणिक कथाओं, विशेषकर लोककथाओं में कही ना कहीं कोई सत्य का बीज अवश्य होता है जो कालान्तर मे वृक्ष बन कर एक रूप लेता है जिसकी भी अनगिनत शाखाएं होती हैं।

ये वृक्ष हर कोण से भिन्न नजर आता है। अर्थात कोई ना कोई सत्यता होती है। जैसे कि त्रिवेणी संगम में तीन नदियों के संगम के लोकविश्वास में सत्यता है, अंतर सिर्फ इतना है कि कहा जाता है कि सरस्वती जमीन के नीचे बहती हैं जबकि हकीकत में वो यमुना की धारा में मिलकर प्रयाग तक पहुँचती हैं।

यह एक अति प्राचीन प्राकृतिक घटना थी जिसमे सरस्वती का प्रवाह अवरुद्ध हुआ और वो यमुना के रास्ते बहने लगी। हमारे पूर्वजों ने इस घटना को एक लोकविश्वास के माध्यम से ज़िंदा रखा जिसका मजाक वामपंथी उड़ाते रहे। इन्ही वामपंथियों ने आर्यों को बाहरी घोषित कर रखा है। जबकि यह कितना बड़ा झूठ है यह हम सब जानते और मानते हैं।

जब मैं अपनी अगली पुस्तक ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ के लिए अध्ययन कर रहा हूँ तो यह सोचकर भी हैरानी होती है कि कैसे षड्यंत्र के साथ सफलतापूर्वक उन्होंने इस सफेद झूठ को हमारे बीच ला खड़ा किया। फिर भी वे इस सत्य को नहीं नकार पाए कि आर्य महान थे, श्रेष्ठ थे।

ठीक इसी तरह रामकथा में क्या और कब, कितना जोड़ा, निकाला या बदला गया है, इसकी सम्भवना से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन क्या यह हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं? नहीं। हमारे लिए महत्व है श्रीराम के व्यक्तित्व का, जो किसी भी जोड़-घटाने से बिलकुल भी प्रभावित नहीं हुआ।

सच तो यह है कि श्री राम को समझना होगा, रामायण को नहीं। श्रीराम के आदर्श आज भी संदर्भित हैं। यहां तक कि जो राम को काल्पनिक मानते हैं वे भी श्रीराम के पुरुषोत्तम होने से इंकार नहीं कर पाते। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उनके जैसा आदर्श व मर्यादित पुरुष आज तक धरती पर पैदा नहीं हुआ।

मेरे एक और फेसबुक मित्र हैं ‘एस के त्रिपाठी’, वे मुझे श्रीराम की कथा के अंश प्रतिदिन व्हाट्सएप पर भेजते हैं। मैंने जब उन्हें नजदीक से देखा और जाना तो पाया कि वे अपने जीवन को भी श्रीराम के व्यक्तित्व से प्रभावित बनाये रखने के लिए प्रयासरत रहते हैं। यह अधिक महत्वपूर्ण है। क्यों ना हम सब अपने भीतर श्रीराम को स्थापित करें।

अपने अपने राम को अपने अपने मन में बिठायें और स्वयं श्रीराम बन जाएँ।

जय श्रीराम

ये क्षेपण है ना लेपन है, यह स्पष्ट विरूपण है, कुरुपण है श्रीराम के निर्मल यश का

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