मोदी वो काम पूरा करने की कगार पर, जो 60 वर्ष में नहीं कर पाए काँग्रेसी

पिछले लेख गरीबों को पता है कि किसने किया है उनका कायाकल्प पर कुछ कमेंट आये जिनका निचोड़ यह है कि अगर गरीब चाह ले तो उसके लिए राह निकल ही आती है।

किसी कामवाली महिला का बेटा फर्नीचर पॉलिश और AC मैकेनिक के रूप काम कर रहा है। तथा, स्किल डेवलपमेन्ट सरकार के भरोसे नहीं हो सकता।

एक तरह से मैं अब मानने लगा हूँ कि अधिकाँश भारतीयों को भीषण गरीबी दिखाई ही नहीं देती। हालाँकि ऐसे लोग हमारी आँखों के सामने रहते हैं, काम करते हैं.

ऊपर से, निर्धनता के लिए हम गरीबों को ही जिम्मेवार ठहराते हैं क्योंकि अगर उनमें चाह या इच्छाशक्ति नहीं है, तो राह कैसे निकलेगी।

एक उदहारण लेते हैं – निर्धनों में चाह या इच्छाशक्ति होने या ना होने की।

आपने घर में नल खोला, निर्धारित समय में या छत पर स्थित पानी की टंकी से पानी आ गया। आपको यह भी पता है कि उस पानी को फ़िल्टर करके पीना है, नहीं तो प्रदूषित पानी से टॉयफॉयड, कॉलेरा, पेट में कीड़े, जॉन्डिस जैसी बीमारी हो सकती है। एक तरह से हमारे लिए स्वच्छ जल पीने की प्रक्रिया ऑटोमेटिक हो गयी है जिसमें कोई समय व्यर्थ नहीं होता। शौच गए, फ्लश कर दिया। सिंपल।

अब भीषण गरीबी में रहने वाला परिवार क्या करेगा? महिलाओं को अपनी बेटियों और बहुओ के साथ गांवों में पानी लाने के लिए कई किलोमीटर अभी भी चलना पड़ता है। स्वच्छ पानी के बारे में जानकारी नहीं है और यदि है, तो उसके पास समय और साधन, दोनों नहीं है कि इस ‘मामूली’ सी बात के बारे में सोचें। क्योंकि उन्हें पानी साफ़ करने के लिए उबालना होगा, जिसमें ईंधन लगेगा। फिर ठंडा करना होगा, जिसमें समय लगेगा। उनके पास ढेर सारे बर्तन नहीं है कि उसमें गर्म और ठन्डे पानी का चक्र बना के रखे।

यही स्वास्थ्य और शिक्षा के बारे में कहा जा सकता है। इस पानी के कारण उनकी लड़कियां स्कूल से वंचित रह जायेगी। एक कामवाली, रिक्शेवाले, सड़क पर काम करने वाली महिला के लिए बीमारी का मतलब एक दिन की रोजगारी गयी। उसके पास पेड लीव की सुविधा नहीं है। और कभी गंभीर बीमारी या चोट के कारण उन्हें महीने, दो महीने इलाज करवाना और काम से अनुपस्थित रहना पड़ सकता है। पैसा भी खर्च हुआ और पारिश्रमिक भी नहीं मिला।

निर्धन लोगों में बचपन और किशोरावस्था से ही या तो सही पोषण का अभाव है, या फिर गन्दगी से घिरे होने के कारण अच्छे भोजन के बावजूद बीमारी के बोझ – ध्यान दीजिये, बीमारी के बोझ (ना कि बीमारी) – के कारण वे लोग समय-समय पर अस्वस्थ रहते हैं और परिणामस्वरूप शरीर ठिगना रह गया।

अस्वच्छ वातावरण में ना सिर्फ अशुद्ध पानी शामिल है, बल्कि कूड़ा-कचरा और प्रदूषण भी। इस गन्दगी का बोझ ना केवल आम भारतीयों को बीमार रखता है, बल्कि उस बीमारी का बोझ शरीर को निचोड़ देता है।

बीमार व्यक्ति ना तो नौकरी पर जा पाता है, ना मजूरी या खेती या व्यवसाय कर सकता है। परिणामस्वरूप पारिश्रमिक ना मिलने या आय ना होने के कारण वह स्वयं और परिवार के लिए भोजन नहीं खरीद सकता जिससे वे सब कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। दुर्बल शरीर के कारण वह पूरी शक्ति से कार्य नहीं कर पाता जिससे कम आय के कारण उसे अन्न और खाद्य सामग्री खरीदने में कठिनाई आती है। एक तरह से वह गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाता है।

अमेरिका के विश्वविख्यात मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MIT) में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी और एस्थर दुफ्लो जीर्ण सी परचून की दुकानों में कई दिन बैठते हैं और हिसाब किताब लगाते हैं कि उन निर्धन मालिकों या उद्यमियों को कितना लाभ हुआ होगा।

उन्हें पता चलता है कि दिन भर अपने सीमित माल में से तेल, साबुन, चाय की पत्ती इत्यादि बेचने के बाद भी अगर उनका सामान चोरी हो जाए, कोई पैसा मार जाए, घर में कोई बीमार हो जाए या फिर पुलिस या म्युनिसिपेलिटी वाला घूस खा जाए, तो लाभ की जगह उन गरीबो को हानि हो जाती थी।

उन्हें अपना बिज़नस बढ़ाने के लिए बैंक से लोन नहीं मिलता था और साहूकार का लोन उन्हें ऊंचे ब्याज़ के कारण और गरीब बना देता था। एक तरह से वे poverty trap या गरीबी के मकड़जाल में फंस गए थे जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं था।

हर व्यक्ति में स्वतंत्र रूप से कार्य करने या अपना मार्ग प्रशस्त करने और अपनी इच्छा के अनुसार उन लक्ष्यों और मूल्यों को प्राप्त करने के बारे में निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए, जिन्हे वे महत्वपूर्ण मानते हैं। संयुक्त राष्ट्र इस क्षमता को human agency कहता है।

निर्धन पुरुष, महिलाओं, किशोर, किशोरियों में इस ह्यूमन एजेंसी का विकास नहीं हो पाता। क्योंकि उन्हें सुबह से रात तक पानी, एक समय का भोजन, शौच, महिला स्वास्थ्य, बीमारी, छोटे-मोटे लोन चुकाने से ही फुर्सत नहीं मिलती। ना ही उनका घर है, ना ही उस झोपड़ी में बिजली है, ना ही पानी, ना ही शौचालय।

एक आम मध्यम परिवार की तरह माता-पिता अपने बच्चों से यह नहीं पूछते कि आज स्कूल में क्या पढ़ाया गया या चलो होमवर्क में मदद कर दे। रोजमर्रा की आवश्यकताओं में फंसे रहने के बाद उनमें कुछ और चाहने की और ना ही कोई राह निकालने की क्षमता बचती है।

क्या हमने स्वयं सड़कों और गाँवों में भीषण गरीबी नहीं देखी? क्या यह अमानवीय नहीं है कि आज भी हमारे देश में करोड़ों लोगों को एक समय का भी भोजन मुश्किल से मिलता है? क्या 21वीं सदी में सरकार को भीषण गरीबी और भुखमरी समाप्त करने का एक सच्चा प्रयास नहीं करना चाहिए? और कैसे होगी वह गरीबी और भुखमरी दूर?

मेरे लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसलिये विशेष हैं कि ना केवल उन्हें निर्धनता के संरचनात्मक कारकों की गहरी समझ है, बल्कि उन्होंने उस निर्धनता को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाये हैं जिसके कारण भारत स्वतंत्रता के बाद अब गरीबी उन्मूलन के द्वार पर खड़ा है।

अब यह निश्चित है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले कार्यकाल में भारत में कोई निर्धन नहीं रहेगा। जो काम कांग्रेसी 60 वर्ष में नहीं कर पाए, वह मोदी जी दस वर्षो में पूरा कर देंगे। मेरे लिए यही राम राज्य है। उसी भगवान राम के प्रधानमंत्री मोदी सच्चे भक्त और सेवक है।

गरीबों को पता है कि किसने किया है उनका कायाकल्प

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