क्या खुद को दोहराएगा इतिहास? तब अंग्रेज़ थे, और अब काँग्रेस!

1857 की घटनाओं पर लिखी पुस्तकों को पढ़ना रोचक होता है। हार के कारणों में सबसे बड़ा कारण था जब भारतीय आपस में बंट गए लेकिन अंग्रेज़ नहीं बंटे और अपने सेनानायक के नेतृत्व में उस पर विश्वास बनाए बिना टूटे लड़ते रहे।

मेरठ और बरेली ब्रिगेड ने दिल्ली पर कब्ज़ा किया तो इन्होंने खोज खोज के बहुत सारे अँगरेज़ मारे, कई बच कर भाग गए।

ऐसे ही एक बचकर भागा हुआ आदमी 17 दिन बाद अंग्रेज़ों के अम्बाला छावनी में पहुंचा तब वो सिर्फ कच्छे में था और शरीर पर अनगिनत घावों के निशान थे।

दो दिन बाद जब वो होश में आया तब लोगों को पता चला कि वो दिल्ली से भागा हुआ रास्ते भर लुटता, मारा खाता हुआ आया आदमी अँगरेज़ साम्राज्य के दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय का प्रमुख न्यायाधीश थिओ मेटकाफ है।

दो दिन के आराम के बाद थिओ मेटकाफ पुनः अँगरेज़ सेना के साथ लड़ने के लिए दिल्ली की और कूच कर गया। थिओ मेटकाफ कोई सैनिक नहीं था… बल्कि वो सिविल सेवा का आदमी था।

शहर में अधिकार जमाए 75 हज़ार से अधिक बागी सैनिकों का दो महीने तक सिर्फ 5000 अँगरेज़ सैनिकों ने सामना किया था। जिसमें केवल 100 के ऊपर गैर सैनिक अँगरेज़ थे और 17 अंग्रेज़ महिलाएँ भी थीं…

ये महिलाएँ सैनिक नहीं थीं बल्कि गृहणियाँ थीं… बड़े अफसरों की पत्नियाँ… युद्ध की रिपोर्ट में एक महिला का ज़िक्र आता है जो गर्भवती थी लेकिन वो बन्दूक लेकर बागियों से लड़ी थी।

जुलाई से अगस्त तक 2500 अँगरेज़ मारे गए थे और उनकी लाशें दफनाई नहीं जा सकी थीं, युद्ध के क्षेत्र में ही लाशें पड़ी थीं.. बारिश में लाशें गल चुकी थीं… बदबू आ रही थी लेकिन अँगरेज़ सैनिकों के साथ वो गर्भवती महिला सड़े, गले बदबू मारते शवों के बीच मोर्चा संभाले हुए थी…

कम से कम 500 अँगरेज़ तो बीमारियों से मारे गए थे… फिर भी जब तक निकलसन बड़ी सेना लेकर अम्बाला से नहीं पहुँचा इन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा और उस महिला ने बच्चे को भी युद्ध भूमि में ही जन्म दिया…

दिल्ली के किले के अंदर भारतीय पहले हिन्दू-मुसलमान में बंटे, बाहर रियासतों के सरदारों/ नवाबों और रजवाड़ों में बंटे, फिर जातियों में बंटे… मुसलमानों को एक बार फिर से दिल्ली से इस्लामी हुकूमत स्थापित करने का मौका दिखने लगा और उन्होंने पूरी नीमच ब्रिगेड को धोखे से मरवा डाला

[युद्ध अवश्यम्भावी है, ज़रा अपने गुस्से को पालो, भावनाओं को काबू में रखो]

गाय काटी जाने लगी और हिन्दुओं को इस्लामी फरमान सुनाया जाने लगा… फिर हिन्दू सैनिकों ने मुसलमानों को भरोसे में लेना बन्द कर दिया… ग्वालियर के सिंधिया को दिल्ली में नाना साहेब का राज होने का भय सताने लगा तो उन्होंने झाँसी में अंग्रेज़ों के पक्ष में दूसरा मोर्चा खोल दिया जिससे झाँसी को दो फ्रंट पर लड़ना पड़ा जिससे झाँसी नहीं, भारत हार गया।

अपने नेता नाना साहेब के प्लान पर विश्वास छोड़कर, उनके बताये समय की जगह उतावले भारतीयों ने लड़ाई माह भर पहले ही शुरू कर दी जिससे पूरी योजना चौपट हो गई।

हिन्दुओं में गूजरों को ये समय भागते अंगरेज़ों को लूटकर माल बनाने का मौका लगा… यादव और राजपूत ने ब्राह्मण को पल्टन का प्रमुख मानने को मना कर दिया… ब्राह्मणों ने इसके बदले जरूरत के समय उन सैनिकों के मदद की जगह अलग मोर्चे पर लड़ाई चालू कर दी।

कानपुर में कब्जे के बाद नाना साहेब ने 120 अँगरेज़ बंदी बना लिए थे और उनको हुसैनी खातून उर्फ़ हुसैनी बेगम के यहाँ रखा… उनका मानना था कि वो इन 120 की जान के बदले अंग्रेज़ों को इलाहबाद छोड़ने की डील कर लेंगे। लेकिन नाना साहेब जिस अजीमुल्लाह खान को अपना सबसे भरोसेमन्द सहायक मानते थे, उसने उन 120 अंग्रेज़ों को मरवा डाला।

हुसैनी बेगम ने अज़ीमुल्लाह खान की मदद की और खुद गोली चलाई। अँगरेज़ बच्चों को मारने के लिए कसाई बुला कर लाये थे ये दोनों। अंग्रेज़ों ने बाद में पता लगाया कि ये सब अवध के नवाबों के कहने पर किया जिससे नाना साहेब अंग्रेज़ों से डील न कर पाएं और लड़ाई हो तथा नाना साहब दिल्ली की गद्दी न पा सकें।

General Havelock की रिपोर्ट के अनुसार इस देश के लोगों ने ही अपनी विजय को पराजय में बदल दिया और उसने चन्द दिनों में ही कानपुर पर दुबारा कब्ज़ा जमा लिया।

दिल्ली पर वापस कब्जे की लड़ाई मई में शुरू होकर सितम्बर के अंत तक चली… थिओ मेटकाफ अम्बाला से वापस आकर पहले सैनिक के जैसे लड़ा और दिल्ली पर काबिज़ हुआ… बदले की आग में तपे थिओ मेटकाफ ने स्वयं कम से कम 1000 बागी सैनिक खुद मारे थे और जबकि न्यायाधीश के तौर पर 10,000 से ऊपर दिल्ली के लोगों को फांसी पर लटकाया था।

लड़ाई जीतने के बाद अँगरेज़ अफसर Russel के द्वारा जीजी को लिखी चिट्ठी (Available at: British Library Board, London) के अनुसार शुरू में उन्होंने खुद को भारत में हारा हुआ मान लिया था… लेकिन अपने अपने स्वार्थ में आकण्ठ डूबे भारतीयों ने खुद अपने हार का रास्ता बनाया तो हमें केवल उनको कीड़ों की तरह मसलना था, और अंत में इन गंदी नस्ल के लोगों को हमने मसला और युद्ध जीता…

फिर अंग्रेज़ों ने किसी को नहीं छोड़ा… जिस पर ज़रा भी शक हुआ उसको गोली मार दी या फांसी चढ़ा दिया… अंग्रेज़ों ने न ब्राह्मण देखे, न राजपूत, यादव, गूजर, मुसलमान, अमीर, गरीब, व्यापारी, भिश्ती, मोची, धर्म बदल कर बने हुए ईसाई से लेकर, बाद में पाला बदलकर वापस अंग्रेज़ों की तरफ से लड़े हुए सैनिक… अंग्रेज़ों ने दिल्ली को लाशों से पाटकर सबको सबक सिखाया।

अंग्रेज़ों ने खुद माना कि इस देश के लोगों ने ही अपनी जीत को हार में बदला

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