NPA : फैसला कैसे हो कि कौन सही, कौन गलत?

मोदी जी कह रहे हैं कि बैंको में जो NPA इकठ्ठा हुआ है वह मनमोहन सरकार की देन है। लेकिन कांग्रेस कहती है NPA मोदी सरकार की विफलता है।

कांग्रेस के समय NPA ढाई लाख करोड़ थे अब 12 लाख करोड़ हैं। ये सब मोदी सरकार की नीतियों की असफलता है।

फैसला कैसे हो कि कौन सही, कौन गलत?

मेरा बहुत पुराना हिसाब है। बयान नहीं, नीतियां देखो सरकार की।

NPA आये कहां से?

अधिकतर NPA या फंसे हुए लोन सरकारी बैंको के हैं। NPA यानी वो लोन जिनसे बैंक को ब्याज भी नहीं मिल रहा और मूल की वापसी की उम्मीद भी नहीं। वो लोन जो डूबने के कगार पर हैं।

NPA का अगला चरण bad debt और अंत में बैंक द्वारा लोन को writeoff किया जाता है।

सरकारी बैंक बिना सिक्योरिटी के लोन नहीं देते। जमीन, सोना, फैक्ट्री, फिक्स्ड डिपॉजिट कुछ न कुछ गिरवी रखवा कर ही लोन देते हैं। फिर लोन डूबने पर सरकारी बैंक क्यों परेशान हैं?

लोन डूबा है, उनका पैसा तो गिरवी रखी प्रॉपर्टी, सोना के आधार पर सिक्योर होना चाहिए!

पर बैंक तो रुआंसे खड़े हैं। क्या उन्होंने गिरवी कुछ नहीं रखा?

नहीं रखा है। लोन की शर्तें पूरी हुई हैं। सरकारी कागज का पेट भरे बगैर काम नहीं होता।

फिर गिरवी में क्या रखा गया?

सुप्रीम कोर्ट में जब 2G घोटाले की सुनवाई चल रही थी, तब यूनिटेक कंपनी के खिलाफ SBI बैंक ने लोन रिकवरी का मामला दायर किया हुआ था। उसी से सम्बंधित खबर में छपा था –

SBI ने यूनिटेक को 7000 करोड़ का लोन दिया था और गिरवी में यूनिटेक को सरकार से आवंटित हुआ स्पेक्ट्रम रखा था।

तब मनमोहन सरकार 2G स्पेक्ट्रम को पहले आओ पहले पाओ पर बाँट रही थी। यूनिटेक ने निर्धारित फीस पर स्पेक्ट्रम लिया। अब फीस कैसे चुकाई जाये।

जब बैंक हैं तो अपना पैसा कैसे लगाया जाये? बैंक गए लोन माँगा। बैंक ने ज़मानत के तौर पर कुछ माँगा। जो अपना पैसा था वो रियल एस्टेट में पहले ही लगा था और कहाँ से लाएं?

तो मिलजुल कर तरीका निकाला गया। सरकार से मिले स्पेक्ट्रम का वैल्यूएशन किया गया। उसे यूनिटेक का एसेट माना गया और उसे गिरवी रखकर उसके बदले लोन दिया गया।

जब यूनिटेक घोटाले में फँसी, स्पेक्ट्रम कैंसिल हुए… तो SBI क्या करे? बैंक गुहार लेकर अदालत पहुंची। आखिर जो चीज गिरवी थी अब वो मिट्टी थी।

ऐसे ही विजय माल्या ने IDBI बैंक से 1000 करोड़ का लोन लेते समय अपनी कंपनी की गुडविल गिरवी रखी थी। विजय माल्या विदेश में हैं और लोन देने वाले बैंक के अधिकारी अब अदालत के चक्कर काट रहे हैं।

हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और काँग्रेस नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा पर एक केस चल रहा है। दिल्ली बॉर्डर के पास कुंडली जमीन घोटाले का। उसी घोटाले में एक दिलचस्प खबर थी।

ऐसे तो कोई बैंक जमीन खरीदने के लिए लोन नहीं देता। जमीन पर घर, फैक्ट्री या ऑफिस बनाने के लिए लोन मिलता है और अक्सर जमीन को बैंक गिरवी रख लेता है।

हरियाणा में लोगों ने ऑफिस, फैक्ट्री बनाने के लिए सरकार को अप्लाई किया। उन्हें जमीन एलॉट हुई। और सरकार ने जमीन का पैसा माँगा। लोगों ने सरकारी एलॉटमेंट का लेटर बैंक में गिरवी रखा और बैंक ने लोन दे दिया। उस पैसे से सरकार से जमीन ली गयी। बिना पैसा इन्वेस्ट किये।

कांग्रेस सरकार के समय इसी तरह पावर प्रोजेक्ट एलॉट हुए। सड़क निर्माण के टेंडर एलॉट हुए।

आज जो सरकारी बैंकों के NPA हैं उनमे 80% यही इंफ़्रास्ट्रक्चर कम्पनियाँ हैं। इन सबके एलॉटमेंट लेटर बैंकों के पास गिरवी हैं और बैंकों के पैसे इन कंपनियों के पास बंधक।

मोदी सरकार जब सत्ता में आयी तो उसने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के साथ मिलकर NPA को चिह्नित करने की नीति बदली।

पहले तो बैंक ऐसे लोन जो ब्याज देना बंदकर NPA होने लगते थे, उनके लोन को रिस्ट्रक्चर कर देते थे। साधारण शब्दों में लोन की क़िस्त चुकाने के लिए लोन दे देते थे। जिसे बैंकिंग पारलेंस में कहा जाता है Throwing good money after bad money.

मोदी सरकार ने ये रिस्ट्रक्चरिंग बंद कराई और बैंकों से RBI के जरिये कहा ऐसे सभी लोन जो ब्याज दे पाने में देरी कर रहे हैं उन्हें NPA में डालिये, उस पर डूबने जा रहे पैसे को अपनी अपनी बैलेंस शीट में चिह्नित कीजिये।

सरल शब्दों में दुनिया को अपनी बीमारी के बारे में बताइये। निवेशकों और जमाकर्ताओं को बैंक की सेहत के बारे में जानने का हक़ है।

और जब ये बीमारी सामने आयी तो बढ़ती गयी, तीन सालों में बैंकों ने बताया कि ये ढाई लाख करोड़ नहीं, पांच लाख, फिर 7 और अब 12 लाख करोड़ का आंकड़ा पहुँच रहा है।

स्पेशलिस्ट कहते हैं 15 लाख करोड़ पर जाकर थमेगा।

दो साल पहले जब बैंकों ने 7 लाख करोड़ NPA बताया था, सरकार की आलोचना हो रही थी। कांग्रेस और दलाल बुद्धिजीवी सरकार पर बैंकों का पैसा खाने का आरोप लगा रहे थे तब मैं और मेरा हिन्दू अख़बार ख़ुशी से नाच रहा था। हम दोनों जान रहे थे कि अच्छे दिन आने वाले हैं।

भला हो हिन्दू अख़बार का, कांग्रेस और तमाम दलालों के दुष्प्रचार से मुझे बचाये रखता है।

क्या बैंक इतने बड़े नुकसान को सह पाएंगे?

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