गरीबों को पता है कि किसने किया है उनका कायाकल्प

मेरे पिछले लेख स्वाधीनता उपरांत लगभग लगातार शासन करके काँग्रेसियों ने दी थी यह प्रगति! पर एक सार्थक प्रश्न पूछा गया कि बिना इनकम बढ़ाये किसी परिवार को गरीबी रेखा से बाहर कैसे लाया जा सकता है?

झुग्गी झोपड़ी वालों को, जिनकी इनकम 5000 रूपए महीना है उनको घर देकर उनकी आर्थिक उन्नति कैसे कर सकते हैं? मकान या गैस देकर कैसे किसी की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है?

चलिए, इस विषय पर विमर्श करते है कि स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी अधिकतर भारतीय poverty trap या गरीबी के मकड़जाल से क्यों नहीं निकल पाए। ऐसा क्यों हुआ, जबकि भारत पर लगभग 60 वर्ष “गरीबी हटाओ” वाले काँग्रेसियों ने कम्युनिस्टों की वाह-वाही के साथ शासन किया था?

अपनी आँखे बंद कीजिये और एक ऐसे परिवार – पति, पत्नी, दो लड़कियां, एक लड़का, सब बच्चे 12 वर्ष से कम आयु के है – के बारे में सोचिये जो गरीबी रेखा के नीचे हो, जिसके पास खेती के लिए कोई जमीन ना हो।

पति गाँव में किसी बाऊ जी के यहाँ खेती करता है, मवेशियों की देखभाल करता है। पत्नी कुछ घरों में झाड़ू-पोंछा, छोटे-मोटे काम करती है। या फिर, किसी सरकारी कंस्ट्रक्शन साइट पर ईंटे उठाती है।

गाँव में किसी सरकारी ज़मीन पर झोपड़ी में यह परिवार रहता है, जिसमें ना नल से पानी आता है, ना हैंडपंप है, ना बिजली है, ना टॉयलेट, और ना ही कुकिंग गैस है। जून 2014 में दोनों व्यक्ति की कुल आय 6000 हज़ार रुपये (पति की 4000 और पत्नी की 2000) महीना थी। यह भी तय है कि इन दोनों का कोई बैंक अकाउंट भी नहीं था।

प्रातः 4.30 बजे उठ कर पत्नी दोनों बच्चियों के साथ शौच के लिए जाती है। उसके बाद वे तीनों घर से दो किलोमीटर दूर तालाब से 6 बाल्टी पानी लाते हैं जिसमें एक से दो घंटा लग जाते हैं।

पत्नी और बच्चियां तालाब के किनारे खुले में स्नान भी कर लेती हैं। पत्नी घर आकर पूजा करती है, कम दूध की चाय बनाती है और सारा परिवार पिछले दिन बनी सूखी रोटी खा लेता है। फिर पति-पत्नी काम पर चले जाते हैं। मंझली लड़की, जो 10 वर्ष की है, तीन किलोमीटर दूर स्थित सरकारी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ाई करने चली जाती है।

यद्यपि सबसे बड़ी 12 वर्षीया लड़की भी स्कूल जाना चाहती है, लेकिन उसे बचपन – जैसे कि अब वह व्यस्क हो गयी हो – से ही घर के काम-काज और छोटे भाई-बहन की जिम्मेवारी सौंप दी जाती है।

उसे झोपड़ी के अंदर और बाहर सफाई करनी है, बहन को स्कूल भेजना है और चार वर्षीय छोटे भाई का ध्यान रखना है। इसके अलावा, उसे छोटे भाई के साथ सूखी टहनी और लकड़ी ढूंढने जाना है जिससे कि घर का चूल्हा जल सके।

वह कुछ आलू की सब्जी बनाती है और आटे की रोटी। फिर वह अपने माता-पिता को भोजन देने के लिए तीन किलोमीटर पैदल जाती है। हालांकि इस परिवार को 10 किलो आटा सब्सिडी पर मिलना चाहिए था, लेकिन मिला केवल 2 किलो। 8 किलो आटा उन्होंने बाजार भाव से खरीदा जिसकी सब्सिडी काँग्रेसियों ने मार ली।

उस सरकारी भूमि पर झोपड़ी बनाने के लिए स्थानीय पुलिस वाले हर महीने 1500 रूपए घूस ले लेते थे। खाने पीने, बर्तन, माचिस में परिवार के 3000 रुपए निकल जाते थे। 1000 से 1500 रूपए रात के समय घर में मिट्टी के तेल के दीए की रोशनी, स्वेटर-कपड़ा, चादर, बर्तन, बस, पत्नी का कुछ श्रृंगार, बाऊ जी की उधारी चुकाने, बच्ची की पढ़ाई में निकल जाता था। अगर सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहे तो जैसे तैसे गुजारा हो जाता था।

खेत में गन्दा पानी पीने से एक दिन पति को एकाएक तेज बुखार हो जाता है और वह एक सप्ताह काम पर नहीं जा पाता। बाऊ जी उन दिनों का पारिश्रमिक – 930 रुपये – उसको नहीं देते।

गाँव से कुछ किलोमीटर दूर स्थित प्राइवेट झोलाझाप डॉक्टर फ्री में देख तो लेता है, लेकिन फीस और दवा का खर्चा 300 रुपये लग जाता है। सीधे-सीधे 1230 रुपए का घाटा।

दया खाकर बाऊ जी ने पति को 1000 रूपए उधार दे दिए और यह हिदायत दी कि अगले महीने वह 1200 रूपए वापस कर देगा। यानी एक महीने में सीधे-सीधे 200 रूपए ब्याज। फिर भी पति ऐसा उधार देने के लिए बाऊ जी का बहुत आभारी था।

यद्यपि पत्नी को सरकारी काम करने के 5000 रूपए महीना मिलना चाहिए था, लेकिन ठेकेदार उसको केवल 2000 देता था, जबकि दस्तखत 5000 पर कराता था।

परिणामस्वरूप पारिश्रमिक ना मिलने या आय ना होने के कारण वह परिवार भोजन नहीं खरीद सकता जिससे वे सब कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। दुर्बल शरीर के कारण वह पूरी शक्ति से कार्य नहीं कर पाता जिससे कम आय के कारण उसे अन्न और खाद्य सामग्री खरीदने में कठिनाई आती है। एक तरह से वह गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाता है।

लेकिन एकाएक मई 2014 में मोदी सरकार आ गई। कुछ ही महीने में पति-पत्नी दोनों का जनधन खाता खुल गया। साथ ही दोनों को आधार कार्ड मिल गया और उस जनधन खाते को आधार से जोड़ दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने उस ठेकेदार को उनके काम का पैसा सीधे बैंक में ट्रांसफर करने का आदेश दिया है। अब पारिश्रमिक में कैश का खेल ख़त्म।

रातों-रात उस निर्धन परिवार की कमाई 6000 रूपए से बढ़कर 9000 हो गई। कुछ ही महीनों में उस परिवार को उज्ज्वला योजना के तहत फ्री का सिलेंडर मिल गया जिससे बच्चों को ईधन की खोज में कड़ी धूप या ठण्ड में बाहर नहीं जाना पड़ता था।

वर्ष 2015 के समाप्त होने तक उस परिवार को एक फ्री का घर, साथ में नल वाला पानी और शौचालय भी नरेंद्र मोदी ने दे दिया। वर्ष 2016 में उनके गांव में पहली बार बिजली आ गई और एकाएक घर में बिजली का कनेक्शन और एलईडी बल्ब भी सरकार ने दे दिया।

उस परिवार के अहोभाग्य कि नवंबर 2016 में बाऊ जी ने दोनों पति-पत्नी को अपने घर बुलाया और कहा कि यह लो दो लाख रुपये और इसे जाकर अपने जनधन अकाउंट में जमा करा दो। बाऊ जी ने यह भी कहा कि तुम लोग हमें 1 लाख 40 हज़ार रुपये नए नोटों में वापस कर देना बदले में 60 हज़ार रूपए रख लेना। साथ ही यह हिदायत दी कि किसी को कुछ भी मत बोलना।

जनवरी 2017 में बाऊ जी ने पति को बुलाया और कहा कि आज से वह पति का पारिश्रमिक दुगना करके 8000 रूपए कर दे रहे हैं। हालांकि पति की समझ में नहीं आया कि बाऊ जी इतने मेहरबान क्यों हो रहे हैं। लेकिन बाऊ जी को पता चल गया था कि गांव के बगल से 6 लेन का नेशनल हाईवे बनने वाला है जिसमें उस गरीब व्यक्ति को बाऊ जी के खेत में काम करने से कहीं अधिक पारिश्रमिक मिलेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के 3 वर्ष के अंदर ही उस गरीब परिवार की आय 6000 रूपए से बढ़कर 13000 रूपए हो गई. अब उनको ना तो 1500 रूपए घूस देनी पड़ती थी, क्यों उनका घर अब क़ानूनी था, ना ही लकड़ी खोजने के लिए बच्चों को जगह जगह भटकना पड़ता था और ना ही पति-पत्नी की आय कोई मार सकता था।

घर में तथा आस पड़ोस में शौचालय बनने के कारण सभी घरों में पानी, गंदगी और मच्छरों से होने वाली बीमारियों में भारी कमी आ गई। इससे काम से अनुपस्थित होने के दिनों में भी कमी आई जो हर गरीब व्यक्ति के लिए एक्स्ट्रा इनकम थी। चूंकि घर में उज्जवला गैस लग गई थी अतः अब तीनों बच्चे स्कूल जा सकते थे।

एक तरह से नरेंद्र मोदी सरकार के पहले टर्म के समाप्त होने तक यह परिवार गरीबी रेखा से बाहर आ जाएगा। लेकिन गरीबी रेखा से बाहर आने से भी बढ़कर उस परिवार को यह लगता था कि उन्हें अब किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना है। उनका बैंक अकाउंट था और वह जब चाहे बैंक से ओवरड्राफ्ट ले सकते थे। एक तरफ से उनका आत्म सम्मान धीरे-धीरे वापिस आने लगा था। इस परिवार को पता है कि किसने उनका कायाकल्प किया है।

स्वाधीनता उपरांत लगभग लगातार शासन करके काँग्रेसियों ने दी थी यह प्रगति!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY