ये क्या किया… ये थोड़े न चाहिये था!

सन 2001 की दीवाली के समय का ये वाकया है तब मैं अपने एक मित्र की पेंट कॉन्ट्रेक्टिंग कंपनी के लिए प्रोजेक्ट मार्केटिंग किया करता था।

चूँकि कम्पनी दोस्त की ही थी तो कई बारी मुझे कुछ मुश्किल काम भी सौंपे जाते थे… मसलन कहीं पेमेंट अटक गया हो, कोई क्लाइंट ज़्यादा परेशान कर रहा हो या कोई सरकारी काम के लिए टेंडर डालना हो… मुझे नाम दिया गया था ‘क्राइसिस मैनेजर’।

2001 की दीवाली का पीक सीज़न, सब तरफ लेबर और काम की मारामारी, ऐसे में एक दिन मित्र के बड़े भाई का फोन आया, जो कि कम ही फोन करते थे।

वे बोले – यार हर्षल एक बहुत टेढ़ी पार्टी का काम ले लिया है… काम भी फिनिश नहीं करवा रहा है और पेमेंट भी नहीं दे रहा है… अब इसको तुम्हें हैंडल करना है… उसने एक रुपया भी नहीं दिया है और काम में भी रोज़ परेशान कर रहा है, मेरा भी झगड़ा हो गया है।

मैं साइट पर पहुँचा… सारा माजरा समझा… पार्टी से मेरा पहला परिचय था, थोड़ी ही देर में मैं उसको प्रभावित करने में कामयाब रहा।

मुझको एक सीनियर लेबर ने कहा – उस्ताद ये बहुत टेढ़ा आदमी है, अगर इससे तुमने पैसे निकाल लिए तो आज से तुमको गुरु मान लूँगा और यहीं साइट पर सबके सामने तुम्हारे पैर पडूंगा।

मैंने कहा, तुम तैयार रहो, मैं थोड़ी देर में आता हूँ।

उस बंदे ने मुझे तमाम तरह की खामियाँ बतानी शुरू कर दीं, तुम्हारे लोगों को अकल नहीं है… काम नहीं आता है… ऊपर से तुम्हारे बॉस भी एक नम्बर के बदतमीज़ हैं… मेरा काम जब तक सही तरीके से नहीं होगा मैं छोड़ने वाला नहीं हूँ।

मैंने कहा – जी बिल्कुल सर, आपका काम मनमाफ़िक न हो तब तक बिल्कुल नहीं छोड़ना है। मैं खुद खड़ा रहकर आपका काम कराऊंगा।

बंदे से मेरी ट्यूनिंग सेट हो चुकी थी… पेमेंट भी ले लिया और सीनियर लेबर ने वादे के मुताबिक लंच टाइम में मेरे पैर भी छू लिए।

उस क्लाइंट की ख़ासियत ये थी कि वो कलर रात में बनवाता था… जबकि सही कलर दिन की रोशनी में ही बनता है… लेकिन वो रात में बनवाता, अपने हिसाब से उसमें स्टेनर डलवाता फिर ओके करके चला जाता।

दूसरे दिन सुबह आता… अरे ये क्या कर दिया… ये तो पिंक हो गया… ये थोड़े न चाहिए था… फिर से कलर बनाओ… लेकिन कलर रात में ही बनवाता… फिर जब कलर कर दो तो अरे ये क्या कर दिया ये तो येलोईश हो गया… कभी ऑफ व्हाइट हो गया… कभी पीच कलर हो गया…

अब मेरे भी सब्र का बांध टूटने लगा था… लेकिन पेमेंट निकालना था और बनते कोशिश झगड़ा नहीं करना था… आखिरकार उससे इतना पेमेंट निकाल लिया था कि हम नो प्रॉफिट नो लॉस में आ चुके थे… उसके बाद काम बंद कर दिया फिर कभी उसका रुख नहीं किया।

कुछ इसी तरह बहुत से लोग इस सरकार के साथ भी कर रहे हैं… राम मंदिर तो बना ही नहीं… धारा 370 हटी ही नहीं… कश्मीर में हरेक आतंकी को तो मारा ही नहीं… ये नहीं किया वो नहीं किया…

हमने सिलिंडर बाँटने, मकान, शौचालय बनाने के लिए वोट थोड़े न दिया था… हमने विकास के लिए वोट थोड़े न दिया था… हमने तो हिंदुत्व के लिए वोट दिया था… मोदीजी तो बोहरा मुस्लिमों के साथ गलबहियां कर रहे हैं… मस्ज़िद जा रहे हैं…

इन लोगों की मानें तो एक एक मुसलमान को देश से बाहर कर दें… ये अलग बात है कि जब मुसलमानों जैसी एकता की बात आती है तो सबसे पहले सिर पर पैर रखकर भागने वाले यही होते हैं।

अगर मोदी ने धारा 370 हटा दी होती, कश्मीर समस्या पूरी तरह से ख़तम कर दी होती और सड़कें नहीं बनाई होती… गरीबों के लिए काम नहीं किया होता… इतने आतंकी नहीं मारे होते तो ये लोग इन सब मामलों को लेकर रोने बैठ जाते।

यानी कितना भी कर लो, कितना भी समझा लो… कलर रात में ही बनवाएंगे… खुद ही बनाएंगे और अगले दिन आकर कहेंगे… ये क्या किया ये थोड़े न चाहिये था…

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